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Supreme Court: निजी संपत्तियों के अधिग्रहण को लेकर सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला, कहा- सरकार इन्हें नहीं ले सकती

Tue, 05 Nov 2024 11:19 AM IST
कीर्तिवर्धन मिश्र न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: कीर्तिवर्धन मिश्र Updated Tue, 05 Nov 2024 11:19 AM IST
सार

चीफ जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ की अध्यक्षता वाली बेंच ने कहा कि हर निजी संपत्ति को संविधान के अनुच्छेद 39(बी) के तहत सामुदायिक संपत्ति का हिस्सा नहीं माना जा सकता। 

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Supreme Court verdict on Private Property Material Resources Community Government acquirement news and updates
सुप्रीम कोर्ट - फोटो : Amar Ujala

विस्तार

सुप्रीम कोर्ट की नौ जजों की संविधान पीठ ने ऐतिहासिक फैसले में कहा कि सामुदायिक संसाधन बताकर हर निजी संपत्ति का अधिग्रहण नहीं किया जा सकता। इसके लिए संपत्ति की स्थिति, सार्वजनिक हित में उसकी जरूरत और कमी जैसे सवालों पर विचार जरूरी है। शीर्ष अदालत ने 7-2 के बहुमत से दिए निर्णय में 41 साल पुराने अपने ही फैसले को पलट दिया।

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मुख्य न्यायाधीश जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ की अध्यक्षता वाली संविधान पीठ ने मंगलवार को दिए फैसले के जरिये जस्टिस वी कृष्ण अय्यर के पूर्व में दिए फैसले को पलटा, जिसमें जस्टिस अय्यर ने कहा था कि राज्य को संविधान के अनुच्छेद 39(बी) के तहत जनहित में बंटवारा करने के लिए निजी स्वामित्व वाली सभी संपत्तियों के अधिग्रहण का अधिकार है। संविधान पीठ ने बहुमत से माना, जस्टिस अय्यर का फैसला विशेष आर्थिक और समाजवादी सोच से प्रेरित था। जबकि संविधान हठधर्मिता को खारिज करता है और आर्थिक लोकतंत्र की अनुमति देता है।
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फैसले में कहा गया है, इस पीठ के सामने यह सवाल था कि क्या संविधान के अनुच्छेद 39(बी) में प्रयुक्त वाक्यांश ‘समुदाय के भौतिक संसाधन’ में निजी स्वामित्व वाले संसाधन भी शामिल हैं। सैद्धांतिक रूप से इसका उत्तर हां है, वाक्यांश में निजी स्वामित्व वाले संसाधन शामिल हो सकते हैं। हालांकि यह न्यायालय कर्नाटक राज्य सरकार बनाम रंगनाथ रेड्डी (1977) मामले में जस्टिस कृष्ण अय्यर की ओर से लिखित अल्पमत के फैसले के व्यापक दृष्टिकोण को स्वीकार करने में असमर्थ है, जिस पर संजीव कोक मैन्युफैक्चरिंग कंपनी बनाम भारत कोकिंग कोल लि. (1983) मामले में शीर्ष कोर्ट की संविधान पीठ ने मुहर लगाई थी। बहुमत जस्टिस अय्यर के इस दर्शन से सहमत नहीं है कि निजी व्यक्तियों की संपत्ति सहित हर संपत्ति को सामुदायिक संसाधन कहा जा सकता है। किसी व्यक्ति के स्वामित्व वाले हर संसाधन को सिर्फ इसलिए समुदाय का भौतिक संसाधन नहीं माना जा सकता क्योंकि वह भौतिक जरूरतों की योग्यता को पूरा करता है।
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जस्टिस चंद्रचूड़ ने खुद और जस्टिस हृषिकेश रॉय, जस्टिस जेबी पारदीवाला, जस्टिस मनोज मिश्रा, जस्टिस राजेश बिंदल, जस्टिस सतीशचंद्र शर्मा और जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह के लिए बहुमत का फैसला लिखा। वहीं पीठ में शामिल जस्टिस बीवी नागरत्ना ने बहुमत वाले फैसले से आंशिक रूप से असहमति जताई, जबकि जस्टिस सुधांशु धूलिया फैसले से पूरी तरह असहमत रहे।  

इससे तो संविधान के मूल सिद्धांत कमजोर होंगे
बहुमत के फैसले में कहा है, यह मानना गलत है कि सभी निजी संपत्तियां सामुदायिक संसाधन होंगी। जस्टिस अय्यर का निर्णय विशेष आर्थिक विचारधारा पर आधारित था, जबकि इस कोर्ट की भूमिका आर्थिक नीति निर्धारित करना नहीं है। लोग सरकार के लिए मतदान करते हैं जो विभिन्न आर्थिक नीतियां तय करती है। यदि सभी निजी संसाधनों को समुदाय का भौतिक संसाधन मान लिया जाए, तो यह संविधान के मूल सिद्धांत को कमजोर करेगा।

इनका अधिग्रहण संभव
पीठ ने कहा, समुदाय के भौतिक संसाधन की श्रेणी के लिए संपत्ति की प्रकृति, चरित्र व प्रभाव ऐसा होने चाहिए, जिससे समाज-कल्याण सुनिश्चित होता हो। वन, तालाब, संवेदनशील क्षेत्र, आर्द्रभूमि व प्राकृतिक संसाधन-युक्त भूमि पर निजी स्वामित्व हो सकता है। स्पेक्ट्रम, वायु तरंगें, प्राकृतिक गैस, खदानें व खनिज जैसे संसाधन, जो दुर्लभ व सीमित हैं, भी निजी नियंत्रण में हो सकते हैं। मगर ये समुदाय के भौतिक संसाधन के दायरे में आते हैं, इनका अधिग्रहण संभव है।

गतिशील आर्थिक नीति से भारत सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था
कोर्ट ने कहा, 1960 और 70 के दशक में आर्थिक नीतियां समाजवादी अर्थव्यवस्था पर आधारित थी। 1990 के दशक से बाजार-उन्मुख आर्थिकी पर फोकस हुआ। अर्थव्यवस्था की वक्रीय रेखा किसी खास सोच की आर्थिकी से दूर है, पर इसका मकसद विकासशील देश की चुनौतियों का सामना करना है। बीते 30 वर्षों में गतिशील आर्थिक नीति अपनाने से भारत सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था बना है।

संपत्ति के वितरण का व्यापक अर्थ
सार्वजनिक भलाई के लिए निजी संपत्ति के वितरण पर पीठ ने कहा, वितरण का व्यापक अर्थ है क्योंकि राज्य द्वारा अपनाए जा सकने वाले वितरण के विभिन्न रूपों को विस्तृत नहीं बताया जा सकता। हालांकि, संसाधनों को राज्य में निहित करना या राष्ट्रीयकरण करना, इसके अर्थ में शामिल हो सकता है। विशिष्ट मामलों में, कोर्ट को तय करना चाहिए कि वितरण सार्वजनिक भलाई के लिए है या नहीं।

अनुच्छेद 31सी, अनुच्छेद 39(बी) और (सी) में क्या?
अनुच्छेद 31सी, अनुच्छेद 39(बी) और (सी) के तहत बनाए गए कानून की रक्षा करता है, जो सरकार को आम भलाई के वास्ते वितरण के लिए निजी संपत्तियों सहित समुदाय के भौतिक संसाधनों को अपने कब्जे में लेने का अधिकार देता है।


16 याचिकाओं पर सुनवाई
शीर्ष अदालत ने 16 याचिकाओं पर सुनवाई की, जिनमें 1992 में मुंबई स्थित प्रॉपर्टी ओनर्स एसोसिएशन (पीओए) द्वारा दायर मुख्य याचिका भी शामिल थी। पीओए ने महाराष्ट्र आवास और क्षेत्र विकास प्राधिकरण (म्हाडा) अधिनियम के अध्याय 8-ए का विरोध किया है। 1986 में जोड़ा गया यह अध्याय सरकारी प्राधिकारियों को उपकरित भवनों और उस भूमि का अधिग्रहण करने का अधिकार देता है जिस पर वे बने हैं, यदि वहां रहने वाले 70 प्रतिशत लोग पुनर्स्थापन उद्देश्यों के लिए ऐसा अनुरोध करते हैं।

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