SC Updates: ट्रांसजेंडर कानून में अभी नहीं होगा बदलाव; केंद्र से मांगा जवाब, तीन जजों की बेंच करेगी सुनवाई
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सुप्रीम कोर्ट ने ट्रांसजेंडर समुदाय के अधिकारों से जुड़े संशोधित कानून की सांविधानिक वैधता को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर केंद्र सरकार, सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों से जवाब मांगा है। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमल्या बागची की पीठ ने याचिकाओं पर सुनवाई के लिए सहमति जताते हुए नोटिस जारी किया। अदालत ने स्पष्ट किया कि फिलहाल किसी अंतरिम राहत का सवाल नहीं उठता।
पीठ ने यह भी कहा कि मामले की आगे की सुनवाई के लिए इसे तीन जजों की बेंच के सामने रखा जाएगा, जिसका गठन सीजेआई करेंगे। अदालत ने इस मामले को छह हफ्ते बाद सुनवाई के लिए सूचीबद्ध किया है। गौरतलब है कि संसद ने 25 मार्च को ट्रांसजेंडर व्यक्तियों के संरक्षण और अधिकारों से जुड़े कानून में संशोधन विधेयक पारित किया था, जिसे 30 मार्च को राष्ट्रपति की मंजूरी मिल गई। इस संशोधन में 'सामाजिक अभिविन्यास' को कानून के दायरे से बाहर रखा गया है। संशोधित कानून में ट्रांसजेंडर व्यक्तियों के खिलाफ अपराधों के लिए नुकसान की गंभीरता के आधार पर अलग-अलग सजा का प्रावधान भी किया गया है।
आर्म्ड फोर्सेज ट्रिब्यूनल में खाली पदों पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, केंद्र से मांगा जवाब
सुप्रीम कोर्ट ने आर्म्ड फोर्सेज ट्रिब्यूनल (AFT) में बढ़ती रिक्तियों पर गंभीर चिंता जताते हुए केंद्र सरकार और अन्य पक्षों से जवाब तलब किया है। अदालत ने समयबद्ध तरीके से खाली पदों को भरने की मांग वाली याचिका पर सुनवाई के लिए सहमति जताई है। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमल्या बागची की पीठ ने इस मामले में अटॉर्नी जनरल आर वेंकटरमणी से भी सहयोग करने को कहा। साथ ही याचिकाकर्ता आर्म्ड फोर्सेज ट्रिब्यूनल बार एसोसिएशन के वकील को निर्देश दिया गया कि वे याचिका की प्रति अटॉर्नी जनरल के कार्यालय को सौंपें।
अदालत ने मामले की अगली सुनवाई दो सप्ताह बाद तय की है। याचिकाकर्ता की ओर से अदालत को बताया गया कि AFT की 11 पीठों में से यदि जल्द नियुक्तियां नहीं की गईं तो साल के अंत तक केवल तीन ही पीठें कार्यरत रह जाएंगी, जिससे सैन्य मामलों से जुड़े मामलों की सुनवाई पर गंभीर असर पड़ेगा।
याचिका में मांग की गई है कि केंद्र सरकार को आर्म्ड फोर्सेज ट्रिब्यूनल अधिनियम, 2007 की धारा 5 के तहत ट्रिब्यूनल की संरचना के अनुरूप रिक्त पदों को समयबद्ध तरीके से भरने का निर्देश दिया जाए। इसके साथ ही यह भी अनुरोध किया गया है कि जब तक नई नियुक्तियां नहीं हो जातीं, तब तक मौजूदा न्यायिक और प्रशासनिक सदस्यों को उनकी सहमति के आधार पर पद पर बने रहने की अनुमति दी जाए, ताकि ट्रिब्यूनल का कामकाज बाधित न हो।
आधार नियमों में सख्ती की मांग पर सुप्रीम कोर्ट का इनकार, सरकार के पास जाने की सलाह
सुप्रीम कोर्ट ने आधार कार्ड से जुड़े नियमों में सख्ती की मांग वाली जनहित याचिका पर सुनवाई से इनकार कर दिया। अदालत ने याचिकाकर्ता को सुझाव दिया कि वह अपनी मांग सरकार के समक्ष रखे। यह याचिका वकील अश्विनी उपाध्याय द्वारा दायर की गई थी, जिसमें आधार कार्ड जारी करने की प्रक्रिया में बड़े बदलाव की मांग की गई थी। याचिका में कहा गया था कि आधार कार्ड केवल 6 साल तक के बच्चों को ही जारी किया जाए और इसके बाद वयस्कों के लिए सख्त और तय प्रक्रिया लागू की जाए।
याचिका में प्रस्ताव रखा गया था कि छह साल से अधिक उम्र के लोगों को आधार कार्ड तभी जारी किया जाए, जब उन्हें सब-डिवीजनल मजिस्ट्रेट या तहसीलदार कार्यालय से अनुमति मिले। इसका उद्देश्य प्रक्रिया में पारदर्शिता और कड़ाई लाना बताया गया। अश्विनी उपाध्याय ने कोर्ट में कहा कि देश में करीब 144 करोड़ आधार कार्ड धारक हैं और लगभग 99 प्रतिशत आबादी इसके दायरे में है। उन्होंने यह भी बताया कि करीब 55 करोड़ जनधन खाते आधार से जुड़े हुए हैं। उनके मुताबिक, मौजूदा प्रणाली में ढील के कारण फर्जीवाड़ा और घुसपैठ की आशंका बढ़ रही है। उन्होंने दावा किया कि कई मामलों में केवल किराये के पते या सामान्य दस्तावेजों के आधार पर भी आधार कार्ड बन जाता है, जिससे आगे अन्य जरूरी दस्तावेज बनाना आसान हो जाता है और सिस्टम में गड़बड़ियां पैदा होती हैं।
पश्चिम बंगाल हिंसा आशंका पर सुप्रीम कोर्ट का इनकार, पहले कलकत्ता हाईकोर्ट जाने को कहा
सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को पश्चिम बंगाल में चुनाव परिणामों के बाद संभावित हिंसा रोकने के लिए केंद्रीय सुरक्षा बलों की तैनाती की मांग वाली याचिका पर तत्काल सुनवाई से इनकार कर दिया। अदालत ने याचिकाकर्ता को पहले कलकत्ता हाई कोर्ट जाने की सलाह दी।
संस्था की ओर से पेश वरिष्ठ वकील वी. गिरि ने दलील दी कि 2021 के विधानसभा चुनावों के बाद राज्य में व्यापक हिंसा देखने को मिली थी और इस बार भी चुनाव परिणामों के बाद वैसी स्थिति बनने की आशंका है। ऐसे में पहले से ही केंद्रीय सुरक्षा बलों की तैनाती और कड़ी निगरानी जरूरी है। याचिकाकर्ता ने सुप्रीम कोर्ट से यह भी अनुरोध किया कि पूरे घटनाक्रम पर नजर रखने के लिए किसी पूर्व न्यायाधीश की अध्यक्षता में एक निगरानी समिति गठित की जाए, ताकि किसी भी संभावित हिंसा को समय रहते रोका जा सके। हालांकि अदालत ने इन दलीलों से सहमति नहीं जताई और कहा कि इस तरह के मामलों में पहले संबंधित हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाना चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को दुबई में फंसे एक भारतीय नागरिक की याचिका पर राहत देने से इनकार कर दिया। याचिकाकर्ता आसिफ आजाद, जो केरल के निवासी हैं, ने स्थानीय अधिकारियों पर उत्पीड़न और गलत तरीके से ट्रैवल बैन लगाने का आरोप लगाया था।
मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की पीठ ने मामले की सुनवाई की। आज़ाद ने दुबई के एक मॉल से वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए अपनी बात रखी। अदालत ने उनके आरोपों पर संदेह जताते हुए कहा कि वह इस रूप में कहानी स्वीकार करने को तैयार नहीं है और उन्हें भारतीय दूतावास से संपर्क करने का निर्देश दिया।
सुनवाई के दौरान अदालत ने कहा कि दूतावास लगभग 20 किलोमीटर दूर है और वहां पहुंचने के लिए सार्वजनिक परिवहन उपलब्ध है। हालांकि, याचिकाकर्ता ने आशंका जताई कि दूतावास जाने पर उसे गिरफ्तार किया जा सकता है।
सुप्रीम कोर्ट ने दूरगामी परिणाम वाले अहम फैसले में कहा कि मेडिकल लापरवाही के मामले में डॉक्टर की मृत्यु के बाद भी उनके कानूनी वारिसों पर मुकदमा चलाया जा सकता है। शीर्ष अदालत ने साफ किया कि डॉक्टर की लापरवाही से होने वाले नुकसान के लिए मुआवजे की वारिसों की जवाबदेही मृतक से विरासत में मिली संपत्ति तक ही सीमित होगी।
जस्टिस जेके माहेश्वरी और जस्टिस एएस चांदुरकर की पीठ ने तीन दशक से भी अधिक पुराने मामले में कानून से जुड़े सवाल का जवाब दिया। इस मामले में अब दिवंगत हो चुके डॉक्टर ने शिकायतकर्ता की पत्नी का ऑपरेशन किया था। इसके बाद उनकी आंखों की रोशनी चली गई थी। इसे असाधारण मामला बताते हुए शीर्ष कोर्ट को मुद्दे को सुलझाने के लिए पुराने कानूनी प्रावधानों को खंगालना पड़ा। अदालत ने कहा कि वह केवल लागू कानून की व्याख्या से जुड़े सवाल का जवाब दे रही है। वह इस पर कोई राय नहीं दे रही है कि लागू कानून के तहत अपनाई गई नीति सही है या उसमें बदलाव की जरूरत है।
पुराने कानूनों का किया जिक्र
पीठ ने कहा कि 1986 के उपभोक्ता संरक्षण कानून और 2019 के उपभोक्ता संरक्षण कानून में दिए कानूनी फ्रेमवर्क को देखते हुए, हम इस नतीजे पर पहुंचते हैं कि मेडिकल लापरवाही वाले डॉक्टर की मौत पर उसके कानूनी वारिसों को आरोपी बनाया जा सकता है और रिकॉर्ड पर लाया जा सकता है। कार्यवाही पूरी होने पर कानूनी वारिसों की यह जवाबदेही होगी कि वे मृतक की ओर से छोड़ी गई संपत्ति में से उस राशि का भुगतान करें, जो अदालत ने तय की हो।
पत्नी-बेटे को पक्षकार बनाने की थी मांग : यह विवाद उपभोक्ता मंचों के समक्ष डॉक्टर के खिलाफ दायर मेडिकल लापरवाही की शिकायत से जुड़ा है। राज्य उपभोक्ता आयोग ने डॉक्टर के पक्ष में फैसले से असंतुष्ट मरीज ने राष्ट्रीय उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग के समक्ष याचिका दी। इस दौरान, डॉक्टर का निधन हो गया। तब अर्जी दायर कर डॉक्टर के स्थान पर कानूनी वारिसों पत्नी व बेटे को पक्षकार बनाने की मांग की गई।
मुकदमे का हक यानी राहत पाने का अधिकार
पीठ ने कहा कि यह समझना होगा कि मेडिकल लापरवाही बरतने वाले डॉक्टर की मृत्यु हो जाने पर, उसके विरुद्ध मुकदमा करने का अधिकार बना रहता है या नहीं। मुकदमा करने के अधिकार का अर्थ है, कानूनी कार्यवाही के जरिये राहत पाने का हक। बचाव करने का अधिकार, मुकदमा चलाने के अधिकार से आंतरिक रूप से जुड़ा है और उसी से उत्पन्न होता है।
सुप्रीम कोर्ट ने ओडिशा की अदालतों की ओर से जमानत के बदले आरोपियों से पुलिस थानों की सफाई कराने जैसी शर्तें लगाने पर कड़ी फटकार लगाई है। शीर्ष अदालत ने कहा कि इस तरह की शर्त बेहद आपत्तिजनक है और इसमें स्पष्ट रूप से जातिगत पूर्वाग्रह झलकता है। अदालत ने पूछा कि ऐसी सजा अमीरों को तो नहीं सुनाई जाती। पीठ ने गहरी निराशा जताते हुए अदालतों से जारी इस तरह के आदेशों पर रोक लगा दी।
मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) जस्टिस सूर्यकांत की पीठ ने उड़ीसा हाईकोर्ट व वहां की जिला अदालतों की लगाई जमानत शर्तों का स्वतः संज्ञान लिया था। इसमें आदिवासी और दलित समुदायों के सदस्यों को कॉर्पोरेट संस्था की ओर से भूमि अधिग्रहण के खिलाफ विरोध प्रदर्शन करने के बाद हिरासत में लिया गया था। पीठ ने स्पष्ट किया कि आरोपी को जमानत दी जाएगी, लेकिन इस तरह की शर्तों पर रोक रहेगी। पीठ ने कहा, ऐसी शर्तें न्यायिक व्यवस्था की गरिमा के विपरीत हैं और समाज में अनावश्यक तनाव पैदा कर सकती हैं। अदालत ने स्पष्ट रूप से कहा कि किसी भी राज्य की न्यायपालिका को ऐसी शर्तें नहीं लगानी चाहिए, जिनमें जाति का रंग हो। इन शर्तों को अमान्य घोषित करते हुए पीठ ने कहा कि ये मानवाधिकारों का उल्लंघन हैं और आरोपी की गरिमा पर सीधा आघात करती हैं। कोर्ट ने इस दलील पर भी गौर किया कि जो लोग आर्थिक रूप से संपन्न हैं, उन्हें जमानत देते समय ऐसी शर्तें नहीं लगाई जातीं। कोर्ट ने कहा कि इन शर्तों की प्रकृति इतनी क्रूर और घृणित है कि ये ओडिशा की न्यायपालिका को जाति-भेदभाव वाली न्यायपालिका के तौर पर पेश कर सकती हैं।
न्यायपालिका का कर्तव्य नागरिकों के मौलिक अधिकारों की रक्षा करना
पीठ ने कहा, न्यायपालिका का कर्तव्य नागरिकों के मौलिक अधिकारों की रक्षा करना है। पिछले 75 वर्षों में न्यायपालिका ने यह सुनिश्चित किया है कि सरकार की शक्ति नागरिकों के अधिकारों को कमजोर न कर सके। ऐसे में इस तरह के आदेश न्यायिक मूल्यों के खिलाफ हैं। अदालत ने प्रभावित आरोपियों को हाईकोर्ट जाने की स्वतंत्रता दी, ताकि वे इन शर्तों को हटवा सकें।
पीठ ने कहा, याचिकाकर्ता उड़ीसा हाईकोर्ट से संपर्क करें और इन शर्तों को तत्काल हटवाएं। इन शर्तों की जगह कोई अन्य मिलती-जुलती शर्त न लगाई जाए। आरोपी जमानत पर ही बने रहेंगे।
ऐसी शर्तें हाशिये पर पड़े समुदायों के साथ भेदभाव
पीठ ने कहा, आरोपी हाशिये पर पड़े समुदाय से आते हैं, और इसलिए उन्हें ऐसी शर्तों का पालन करने के लिए मजबूर करना अनुचित है। ऐसे आदेश हाशिये पर पड़े समुदायों के प्रति जाति आधारित भेदभाव को उजागर करते हैं। पीठ ने कहा, अदालतों को ऐसी शर्तें लगाने से बचना चाहिए, जिनसे समाज में टकराव पैदा होने की आशंका हो।
देशभर के हाईकोर्ट को भेजें आदेश की प्रति : सुप्रीम कोर्ट ने रजिस्ट्री को देशभर के सभी हाईकोर्ट को आदेश की प्रति भेजने का निर्देश दिया। पीठ ने कहा, प्रत्येक हाईकोर्ट यह सुनिश्चित करेगा कि आदेश की प्रति हर न्यायिक अधिकारी को भेजी जाए। यह सूचना भी भेजी जाए कि जमानत देते समय ऐसी शर्तें नहीं लगाई जाएंगी।
सुप्रीम कोर्ट ने अगस्ता वेस्टलैंड वीवीआईपी हेलिकॉप्टर घोटाले के आरोपी क्रिश्चियन मिशेल जेम्स की याचिका पर नोटिस जारी किया है। याचिका में भारत-यूएई प्रत्यर्पण संधि के अनुच्छेद 17 को चुनौती दी गई है, जो प्रत्यर्पण के बाद जुड़े हुए अन्य अपराधों में भी अभियोजन की अनुमति देता है। जस्टिस विक्रम नाथ की अध्यक्षता वाली पीठ के समक्ष सुनवाई के दौरान मिशेल के वकील ने दलील दी कि दिल्ली हाईकोर्ट ने यह मान लिया कि संधि संसद के कानून से ऊपर है, जबकि प्रत्यर्पण अधिनियम की धारा 21 केवल उन्हीं अपराधों में मुकदमा चलाने की अनुमति देती है जिनके लिए प्रत्यर्पण हुआ है। याचिका में कहा गया कि अनुच्छेद 17 संविधान के प्रावधानों के विपरीत है। सीबीआई के अनुसार, वीवीआईपी हेलिकॉप्टर सौदे में ऊंचाई मानक 6000 मीटर से घटाकर 4500 मीटर किया गया और रिश्वत दी गई। एजेंसी ने करीब 2666 करोड़ के नुकसान का आरोप लगाया है।
अभिनेता दर्शन के खिलाफ ट्रायल की रिपोर्ट मांगी
सुप्रीम कोर्ट ने कन्नड़ अभिनेता दर्शन से जुड़े रेणुकास्वामी हत्याकांड में ट्रायल की प्रगति पर बंगलूरू की अदालत से विस्तृत स्थिति रिपोर्ट मांगी है। अदालत ने पूछा कि अब तक कितने गवाहों के बयान दर्ज हुए और कितने शेष हैं। कोर्ट ने यह भी जानना चाहा है कि मुकदमे को पूरा होने में कितना समय लगेगा। जस्टिस जेबी पारदीवाला की अध्यक्षता वाली पीठ ने दर्शन की जमानत याचिका पर सुनवाई करते हुए कर्नाटक सरकार को नोटिस जारी किया और एक सप्ताह में रिपोर्ट पेश करने का निर्देश दिया। वरिष्ठ अधिवक्ता मुकुल रोहतगी ने अदालत को बताया कि अगस्त 2025 में जमानत रद्द होने के बाद से अभिनेता से जेल में हैं। रोहतगी ने आरोप लगाया कि जेल में अभिनेता सामान्य बंदियों को मिलने वाली बुनियादी सुविधाएं भी नहीं दी जा रहीं और उन्हें अलग सेल में रखा गया है। इस मामले में कुल 262 गवाह हैं, जिनमें से केवल 10 के बयान ही दर्ज हो पाए हैं।
मुख्य न्यायाधीश ने याची से कहा... केरलम में बदले माहौल का लें लाभ
सुप्रीम कोर्ट में सोमवार को सुनवाई के दौरान चीफ जस्टिस सूर्यकांत की विधानसभा चुनाव नतीजों के बाद केरलम में बदले माहौल संबंधी टिप्पणी ने सबका ध्यान खींचा। शीर्ष कोर्ट ने दुबई में रह रहे भारतीय नागरिक आसिफ आजाद को राहत देने से इन्कार कर दिया। याचिका खारिज करते हुए चीफ जस्टिस की अध्यक्षता वाली पीठ ने आसिफ को संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) में भारतीय दूतावास से संपर्क करने की सलाह दी। आसिफ वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिये दुबई के एक मॉल से जुड़ा था।
याचिकाकर्ता ने दावा किया कि वह ड्रग माफिया की साजिश का शिकार हुआ है और उसके खिलाफ झूठा केस दर्ज कर केरल में यात्रा प्रतिबंध लगाया गया है। आसिफ ने यह भी आरोप लगाया कि केरलम के कुछ विधायक उसके खिलाफ हैं। इस पर चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने मजाकिया लहजे में कहा कि अब जैसा आप टीवी पर देख रहे हैं, केरलम में कुछ बदलाव हो रहा है। आपको इसका फायदा उठाना चाहिए। अदालत ने कहा कि प्रस्तुत तथ्यों के आधार पर याचिकाकर्ता की कहानी स्वीकार करने योग्य नहीं है और उसे दूतावास से सहायता लेनी चाहिए।
सुनवाई के दौरान चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने यह भी पूछा कि दूतावास कितनी दूरी पर है। जब आसिफ ने करीब 20 किलोमीटर बताया, तो अदालत ने कहा कि वहां सार्वजनिक परिवहन से जाया जा सकता है।
याचिकाकर्ता ने अपने साथ मारपीट और मानवाधिकार उल्लंघन का आरोप लगाते हुए अनुच्छेद 21 के तहत सुरक्षा की मांग की थी। हालांकि, अदालत ने इस मामले में हस्तक्षेप से इन्कार कर दिया।
बंगाल में केंद्रीय बलों की तैनाती जारी रखने की मांग पर तत्काल सुनवाई से सुप्रीम इन्कार
सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव के बाद हिंसा पर अंकुश लगाने के लिए पश्चिम बंगाल में चुनाव के बाद भी केंद्रीय बलों की तैनाती जारी रखने की मांग वाली याचिका पर तत्काल सुनवाई से इन्कार कर दिया। कोर्ट ने कहा कि ऐसे फैसले कार्यपालिका को लेने होते हैं।
सीजेआई जस्टिस सूर्यकांत व जस्टिस जॉयमाल्या बागची की पीठ के समक्ष याचिकाकर्ताओं में से एक की ओर से पेश वी गिरि ने आग्रह किया कि 2021 में राज्य में हुई बड़े पैमाने पर चुनाव के बाद की हिंसा को ध्यान में रखते हुए केंद्रीय बलों को राज्य में रहने की अनुमति दी जानी चाहिए। चुनाव आयोग के वकील ने कहा कि चुनाव समाप्त होने के बाद उसकी भूमिका समाप्त हो जाती है। पीठ ने तत्काल सुनवाई से इन्कार करते हुए कहा, राजनीतिक कार्यपालिका निर्णय लेगी। राज्य का संचालन राजनीतिक कार्यपालिका की ओर से होना चाहिए, न कि अदालत की ओर से। हालांकि, पीठ ने कहा कि वह 11 मई को इस याचिका पर विचार कर सकती है, जब एसआईआर से संबंधित अन्य याचिकाओं पर विचार किया जाएगा।
एसिड अटैक की बढ़ती वारदातों पर सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र से ऐसे अपराधों के लिए सजा बढ़ाने पर विचार करने को कहा। शीर्ष अदालत ने सरकार को बेगुनाही साबित करने का भार आरोपी पर डालने का भी सुझाव दिया। आपराधिक न्यायशास्त्र के तहत, जब तक कानून में अन्य प्रावधान नहीं हों, आरोपी के खिलाफ दोष साबित करने का भार अभियोजन पक्ष पर होता है।
सुप्रीम कोर्ट ने निर्देश दिया कि उपयुक्त संशोधन होने तक, जिन व्यक्तियों को जबरन तेजाब पिलाया गया हो या जिन्हें बाहरी विकृति के बिना आंतरिक चोटें आई हों, वे विकलांग व्यक्तियों के अधिकार अधिनियम, 2016 के अंतर्गत तेजाब हमले के पीड़ितों की श्रेणी में आएंगे। सीजेआई जस्टिस सूर्यकांत व जस्टिस जॉयमाल्या बागची की पीठ ने कहा कि यह स्पष्टीकरण 2016 के अधिनियम के लागू होने के समय से ही शामिल माना जाएगा। पीठ ने कहा, बेहतर होगा कि संबंधित मंत्रालय औपचारिक रूप से प्रस्तावित संशोधन को अधिसूचित कर दे। सुप्रीम कोर्ट ने यह आदेश एसिड अटैक पीड़िता शाहीन मलिक की जनहित याचिका की सुनवाई करते हुए पारित किया। इसमें मांग की गई है कि ऐसे पीड़ितों को विकलांग व्यक्तियों की श्रेणी में रखा जाए ताकि कल्याणकारी योजनाओं तक उनकी पहुंच सुनिश्चित हो सके।
सीजेआई ने कहा, एसिड हमलों के लिए निर्धारित सजा प्रभावी साबित नहीं हो रही है। 2013 से ऐसे मामलों में चिंताजनक वृद्धि हुई है। बर्बर और क्रूर एसिड हमले हुए हैं। क्या आपको नहीं लगता कि सजा और कड़ी होनी चाहिए? पीठ ने यह भी सुझाव दिया कि ऐसे जघन्य मामलों में दोषी ठहराए गए लोगों की संपत्ति जब्त करके एसिड हमलों के पीड़ितों को मुआवजा दिया जाए। पीठ ने बाजार में एसिड की बिक्री पर नियंत्रण रखने की आवश्यकता पर भी जोर दिया। सीजेआई ने कहा कि एसिड हमले के अपराध से अत्यंत सख्ती से निपटा जाना चाहिए। इस मामले में अगली सुनवाई दो हफ्ते बाद होगी।
ट्रांसजेंडर अधिनियम के खिलाफ याचिका पर होगी सुप्रीम सुनवाई
सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को केंद्र, सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों से ट्रांसजेंडर व्यक्तियों (अधिकारों का संरक्षण) संशोधन अधिनियम, 2026 की सांविधानिक वैधता को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर जवाब मांगा। देश के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की पीठ ने याचिकाओं पर सुनवाई करने पर सहमति जताई और उन पर नोटिस जारी किया। पीठ ने कहा कि यह मामला तीन न्यायाधीशों की पीठ के समक्ष रखा जाएगा, जिसका गठन सीजेआई जस्टिस सूर्यकांत करेंगे। पीठ ने कहा, अंतरिम आदेश देने का कोई सवाल ही नहीं उठता। न्यायालय ने मामले की सुनवाई छह सप्ताह बाद के लिए निर्धारित की। संसद ने 25 मार्च को ट्रांसजेंडर व्यक्तियों के संरक्षण और अधिकारों से संबंधित कानून में संशोधन करने वाला विधेयक पारित किया था। इसे 30 मार्च को राष्ट्रपति की मंजूरी मिल गई थी।
छह वर्ष तक की आयु वालोंं का आधार जारी करने के लिए विधायी हस्तक्षेप की जरूरत
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि सिर्फ छह वर्ष तक की आयु के नागरिकों को नए आधार कार्ड जारी करने के लिए विधायी हस्तक्षेप और मौजूदा कानूनी ढांचे में उचित संशोधन की जरूरत है। सीजेआई जस्टिस सूर्यकांत व जस्टिस जॉयमाल्या बागची की पीठ एक जनहित याचिका पर सुनवाई कर रही थी, जिसमें भारतीय विशिष्ट पहचान प्राधिकरण (यूआईडीएआई) को सिर्फ छह वर्ष तक की आयु के नागरिकों को नए आधार कार्ड जारी करने का निर्देश देने की मांग की गई थी। पीठ ने कहा, याचिकाकर्ता के लिए उचित उपाय यह होगा कि वह इन सभी मुद्दों को राज्य और अन्य हितधारकों के संज्ञान में लाए ताकि वे इन पर ध्यान दे सकें। पीठ ने याचिका का निपटारा करते हुए निर्देश दिया कि इसे याचिकाकर्ता की ओर से एक अभ्यावेदन के रूप में माना जाए। याचिका में यह भी मांग की गई थी कि किशोरों और वयस्कों को आधार कार्ड जारी करने के लिए सख्त दिशा-निर्देश बनाए जाएं ताकि घुसपैठियों को रोका जा सके। इसमें अधिकारियों को सामान्य सेवा केंद्रों पर डिस्प्ले बोर्ड लगाने का निर्देश देने की मांग की गई थी, जिसमें यह बताया गया हो कि 12 अंकों का विशिष्ट पहचान नंबर सिर्फ पहचान का प्रमाण है, न कि नागरिकता, पता या जन्मतिथि का प्रमाण। पीठ ने कहा, राहतों की प्रकृति से स्पष्ट है कि इनमें से अधिकतर के लिए विधायी हस्तक्षेप और मौजूदा कानूनी ढांचे में उचित संशोधन की आवश्यकता है।
यह घुसपैठियों को आधार कार्ड हासिल करने से रोकने के लिए
याचिकाकर्ता ने कहा कि यह कोई प्रतिपक्षी मुकदमा नहीं है और याचिका घुसपैठियों को आधार कार्ड प्राप्त करने से रोकने के लिए है। उन्होंने फर्जी दस्तावेजों के मुद्दे का जिक्र करते हुए कहा कि रेंट एग्रीमेंट रखने वाले किसी भी व्यक्ति को आधार कार्ड मिल सकता है। पीठ ने कहा, आप अपनी शिकायतें केंद्र के समक्ष रखें। पीठ ने मामले की खूबियों पर कोई राय व्यक्त किए बिना याचिका का निपटारा करते हुए निर्देश दिया कि इसे याचिकाकर्ता की ओर से एक निवेदन के रूप में माना जाए।
आरपीएससी के लिए न्यूनतम योग्यता आवेदन की अंतिम तिथि तक जरूरी, परीक्षा के दिन नहीं
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि राजस्थान लोक सेवा आयोग (आरपीएससी) की भर्ती प्रक्रियाओं में उम्मीदवारों के पास न्यूनतम योग्यता आवेदन जमा करने की अंतिम तिथि तक होनी चाहिए, परीक्षा के दिन तक नहीं। जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने राजस्थान हाईकोर्ट के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें अंतिम वर्ष के विधि छात्रों को सहायक अभियोजन अधिकारी (एपीओ) की भर्ती प्रक्रिया में भाग लेने की अनुमति दी गई थी।
आरपीएससी की अपील स्वीकार करते हुए, जस्टिस नाथ ने कहा, वैसे भी, प्रतिवादियों के इस तर्क को स्वीकार करना कि साक्षात्कार से पहले किसी भी स्तर पर योग्यता प्राप्त करने वाले उम्मीदवारों को पात्र माना जाना चाहिए, चयन प्रक्रिया में अनिश्चितता पैदा करेगा। साथ ही बाद में प्राप्त योग्यताओं पर नजर रखने के लिए अपीलकर्ता-आरपीएससी पर अनावश्यक प्रशासनिक बोझ डालेगा। पीठ इस मुद्दे पर विचार कर रही थी कि न्यूनतम आवश्यक योग्यता प्राप्त करने की प्रासंगिक तिथि विज्ञापन के अनुसार आवेदन जमा करने की तिथि है, या साक्षात्कार प्रक्रिया शुरू होने से पहले का कोई भी समय।
पीठ ने कहा कि वह हाईकोर्ट के इस तर्क से सहमत नहीं है कि जहां दिशा-निर्देशों की दो व्याख्याएं संभव हों, वहां उम्मीदवारों के हित में वाली व्याख्या को अपनाया जाना चाहिए। उम्मीदवारों की संख्या बढ़ाने या प्रतिस्पर्धा को बढ़ावा देने के आधार पर ऐसा दृष्टिकोण तब नहीं अपनाया जा सकता जब विज्ञापन की भाषा से केवल एक ही स्पष्ट और असंदिग्ध व्याख्या संभव हो। पीठ ने आगे कहा कि निर्धारित पात्रता शर्त में स्पष्ट रूप से संबंधित समय पर डिग्री का होना अनिवार्य है।
नाबालिग की 30 हफ्ते की गर्भावस्था मामले में सुप्रीम कोर्ट ने बंद की अवमानना कार्यवाही
नाबालिग की 30 सप्ताह की गर्भावस्था समाप्त करने से जुड़े मामले में सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को केंद्र सरकार और अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) के खिलाफ चल रही अवमानना कार्यवाही को समाप्त कर दिया। अदालत ने कहा कि उसके 24 अप्रैल के आदेश का पालन किया जा चुका है, इसलिए आगे सुनवाई की आवश्यकता नहीं है। जस्टिस बीवी नागरत्ना और जस्टिस उज्जल भुइयां की पीठ को अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल ऐश्वर्या भाटी ने जानकारी दी कि कोर्ट के निर्देशों का पूरी तरह पालन किया गया है। इसके बाद अदालत ने कहा कि अब इस अवमानना याचिका पर आगे विचार करने का कोई कारण नहीं है। सुनवाई के दौरान जस्टिस नागरत्ना ने कहा कि ऐसे मामलों में फैसला लेना आसान नहीं होता, लेकिन अदालत को भावनाओं से ऊपर उठकर निर्णय करना पड़ता है। उन्होंने यह भी चिंता जताई कि यदि एम्स जैसे संस्थान जिम्मेदारी नहीं लेते, तो महिलाओं को असुरक्षित विकल्पों की ओर जाना पड़ सकता है, जिससे उनकी जान को खतरा हो सकता है। शीर्ष अदालत ने समाज में बढ़ती अवांछित गर्भधारण की घटनाओं पर भी चिंता जताई और कहा कि देरी से निर्णय लेने के कारण स्थिति जटिल हो जाती है। अदालत ने पहले 15 वर्षीय पीड़िता को 30 सप्ताह की गर्भावस्था समाप्त करने की अनुमति दी थी।
आवेदक के वैधानिक विकल्पों का इस्तेमाल किए बिना एफआईआर का निर्देश नहीं दे हाईकोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि याचिकाकर्ता की ओर से कानून में दिए गए वैधानिक विकल्पों का उपयोग किए बिना हाईकोर्ट एफआईआर दर्ज करने का निर्देश नहीं दे सकते। शीर्ष अदालत ने कहा कि हाईकोर्ट किसी वैधानिक प्राधिकरण के खिलाफ निष्क्रियता या लापरवाही का मामला साबित होने मात्र से रिट याचिका पर सुनवाई करने के लिए बाध्य नहीं हैं।
जस्टिस संजय करोल व जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की पीठ ने कहा कि यूं तो संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत हाईकोर्ट का क्षेत्राधिकार व्यापक है, फिर भी यह क्षेत्राधिकार असाधारण, विवेकाधीन और कुछ स्व-लगाए गए प्रतिबंधों के अधीन है। अनुच्छेद 226 हाईकोर्ट को कुछ रिट जारी करने की शक्ति प्रदान करता है। कानून की उपरोक्त व्याख्या को ध्यान में रखते हुए, हम पाते हैं कि भारत के संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत असाधारण क्षेत्राधिकार का प्रयोग तब नहीं किया जाना चाहिए था जब वैकल्पिक तौर पर समान रूप से प्रभावी वैधानिक उपाय उपलब्ध थे। पीठ ने कहा, यदि किसी व्यक्ति को यह शिकायत है कि पुलिस उसकी एफआईआर दर्ज नहीं कर रही या दर्ज होने के बाद उचित जांच नहीं की जा रही है, तो आमतौर पर इसका उपाय प्रथम दृष्ट्या रिट याचिका का सहारा लेना नहीं होता है। बल्कि वैधानिक ढांचे का सहारा लेना होता है, जब तक कि परिस्थितियों की तात्कालिकता अन्यथा आवश्यक न हो। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता , 2023, आपराधिक अभियोजन शुरू करने के लिए एक संरचित क्रमबद्ध तंत्र प्रदान करती है। कानूनी ढांचे के अनुसार, संज्ञेय अपराध के घटित होने से संबंधित सूचना सर्वप्रथम पुलिस स्टेशन के प्रभारी अधिकारी के समक्ष रखी जाती है और बीएनएसएस की धारा 173(1) के तहत एफआईआर दर्ज की जाती है।