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Supreme Court: हिरासत में नाबालिग को यातना, सुनवाई से 'सुप्रीम' इनकार; याचिकाकर्ता को हाईकोर्ट जाने की सलाह
Mon, 15 Sep 2025 02:32 PM IST
पवन पांडेय
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
Published by: पवन पांडेय
Updated Mon, 15 Sep 2025 02:32 PM IST
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सुप्रीम कोर्ट
- फोटो : अमर उजाला
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सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को गुजरात पुलिस पर 17 वर्षीय नाबालिग के साथ यौन शोषण और कस्टडी में यातना का आरोप लगाने वाली याचिका पर सुनवाई करने से इनकार कर दिया। अदालत ने याचिकाकर्ता को सलाह दी कि वह पहले हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाएं। मामले में न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की पीठ ने याचिकाकर्ता के वकील से कहा, 'हमें आपकी परेशानी का एहसास है, लेकिन आपने पहले हाई कोर्ट क्यों नहीं गए?'
वकील ने बताया कि नाबालिग के साथ पुलिस ने बर्बरता की है। इस पर कोर्ट ने दोबारा पूछा, 'आप आर्टिकल 226 के तहत हाई कोर्ट क्यों नहीं गए?' वकील ने दलील दी कि उन्होंने सुप्रीम कोर्ट से एम्स, नई दिल्ली, से मेडिकल बोर्ड बनवाकर नाबालिग के जख्मों की जांच कराने का निर्देश देने की मांग की थी। इस पर कोर्ट ने कहा,'क्या हाई कोर्ट यह आदेश नहीं दे सकता?' वकील ने यह भी कहा कि यह सिर्फ एक मामले की बात नहीं है, बल्कि पूरे देश में नाबालिगों को पुलिस कस्टडी में उठाकर प्रताड़ित करने का बड़ा मुद्दा है। हालांकि, कोर्ट ने साफ किया कि पहले हाई कोर्ट में जाएं और अगर वहां राहत न मिले तो वापस सुप्रीम कोर्ट आ सकते हैं। इसके साथ ही कोर्ट ने एम्स से मेडिकल रिपोर्ट बनवाने के अनुरोध को भी ठुकरा दिया।
वकील ने यह भी चिंता जताई कि जब तक वह हाई कोर्ट पहुंचेंगे, तब तक बोटाद थाने की सीसीटीवी फुटेज नष्ट हो सकती है। इस पर कोर्ट ने कहा, 'अगर आप समय पर हाई कोर्ट जाएंगे तो फुटेज नष्ट नहीं होगी।' इसके बाद वकील ने याचिका वापस ले ली।
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क्या है पूरा मामला?
यह याचिका नाबालिग के बहन ने दायर की थी। इसमें आरोप लगाया गया कि 18 अगस्त को गुजरात के बोटाद शहर की पुलिस ने नाबालिग को सोने और नकदी की चोरी के शक में उठाया। नाबालिग को 19 अगस्त से 28 अगस्त तक गैरकानूनी तरीके से कस्टडी में रखा गया। इस दौरान उसे पुलिस स्टेशन में बेरहमी से पीटा गया और यौन शोषण किया गया। पुलिस ने नाबालिग को न तो 24 घंटे के भीतर जुवेनाइल जस्टिस बोर्ड या मजिस्ट्रेट के सामने पेश किया और न ही मेडिकल जांच कराई।
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वकील ने बताया कि नाबालिग के साथ पुलिस ने बर्बरता की है। इस पर कोर्ट ने दोबारा पूछा, 'आप आर्टिकल 226 के तहत हाई कोर्ट क्यों नहीं गए?' वकील ने दलील दी कि उन्होंने सुप्रीम कोर्ट से एम्स, नई दिल्ली, से मेडिकल बोर्ड बनवाकर नाबालिग के जख्मों की जांच कराने का निर्देश देने की मांग की थी। इस पर कोर्ट ने कहा,'क्या हाई कोर्ट यह आदेश नहीं दे सकता?' वकील ने यह भी कहा कि यह सिर्फ एक मामले की बात नहीं है, बल्कि पूरे देश में नाबालिगों को पुलिस कस्टडी में उठाकर प्रताड़ित करने का बड़ा मुद्दा है। हालांकि, कोर्ट ने साफ किया कि पहले हाई कोर्ट में जाएं और अगर वहां राहत न मिले तो वापस सुप्रीम कोर्ट आ सकते हैं। इसके साथ ही कोर्ट ने एम्स से मेडिकल रिपोर्ट बनवाने के अनुरोध को भी ठुकरा दिया।
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वकील ने यह भी चिंता जताई कि जब तक वह हाई कोर्ट पहुंचेंगे, तब तक बोटाद थाने की सीसीटीवी फुटेज नष्ट हो सकती है। इस पर कोर्ट ने कहा, 'अगर आप समय पर हाई कोर्ट जाएंगे तो फुटेज नष्ट नहीं होगी।' इसके बाद वकील ने याचिका वापस ले ली।
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क्या है पूरा मामला?
यह याचिका नाबालिग के बहन ने दायर की थी। इसमें आरोप लगाया गया कि 18 अगस्त को गुजरात के बोटाद शहर की पुलिस ने नाबालिग को सोने और नकदी की चोरी के शक में उठाया। नाबालिग को 19 अगस्त से 28 अगस्त तक गैरकानूनी तरीके से कस्टडी में रखा गया। इस दौरान उसे पुलिस स्टेशन में बेरहमी से पीटा गया और यौन शोषण किया गया। पुलिस ने नाबालिग को न तो 24 घंटे के भीतर जुवेनाइल जस्टिस बोर्ड या मजिस्ट्रेट के सामने पेश किया और न ही मेडिकल जांच कराई।
पुलिस हिरासत में नाबालिग की पिटाई, सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई से किया इनकार
सुप्रीम कोर्ट ने गुजरात पुलिस पर 17 वर्षीय लड़के के साथ यौन शोषण और हिरासत में पिटाई के आरोपों की जांच संबंधी याचिका पर सुनवाई से इनकार कर दिया। शीर्ष कोर्ट ने याचिकाकर्ता से हाईकोर्ट जाने को कहा। जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने कहा, हम आपकी पीड़ा समझते हैं, लेकिन आप हाईकोर्ट क्यों नहीं गए? संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत आप वहां जा सकते थे। याचिकाकर्ता के वकील ने कहा कि उन्होंने दिल्ली एम्स से मेडिकल बोर्ड गठित कराकर रिपोर्ट लेने की मांग की थी। इस पर कोर्ट ने सवाल किया कि यह आदेश हाईकोर्ट क्यों नहीं दे सकता था। वकील ने यह भी तर्क दिया कि मामला केवल इस बच्चे का नहीं, बल्कि पूरे देश में नाबालिगों के साथ पुलिस अत्याचार से जुड़ा है। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि पहले हाईकोर्ट जाएं और अगर वहां से राहत न मिले तो दोबारा यहां आ सकते हैं। कोर्ट ने दिल्ली एम्स को रिपोर्ट देने का निर्देश भी देने से इनकार कर दिया।
सुप्रीम कोर्ट ने गुजरात पुलिस पर 17 वर्षीय लड़के के साथ यौन शोषण और हिरासत में पिटाई के आरोपों की जांच संबंधी याचिका पर सुनवाई से इनकार कर दिया। शीर्ष कोर्ट ने याचिकाकर्ता से हाईकोर्ट जाने को कहा। जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने कहा, हम आपकी पीड़ा समझते हैं, लेकिन आप हाईकोर्ट क्यों नहीं गए? संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत आप वहां जा सकते थे। याचिकाकर्ता के वकील ने कहा कि उन्होंने दिल्ली एम्स से मेडिकल बोर्ड गठित कराकर रिपोर्ट लेने की मांग की थी। इस पर कोर्ट ने सवाल किया कि यह आदेश हाईकोर्ट क्यों नहीं दे सकता था। वकील ने यह भी तर्क दिया कि मामला केवल इस बच्चे का नहीं, बल्कि पूरे देश में नाबालिगों के साथ पुलिस अत्याचार से जुड़ा है। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि पहले हाईकोर्ट जाएं और अगर वहां से राहत न मिले तो दोबारा यहां आ सकते हैं। कोर्ट ने दिल्ली एम्स को रिपोर्ट देने का निर्देश भी देने से इनकार कर दिया।
वरिष्ठ पत्रकार वरदराजन और अन्य को सुप्रीम कोर्ट से राहत
सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को वरिष्ठ पत्रकार सिद्धार्थ वरदराजन और अन्य पत्रकारों को असम में उनके खिलाफ दर्ज मामलों में गिरफ्तारी या अन्य सख्त कार्रवाई से दी गई सुरक्षा को बढ़ा दिया है। ये मामले एक ऑनलाइन न्यूज पोर्टल पर छपी एक खबर को लेकर दर्ज किए गए थे। जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जयमाल्या बागची की पीठ ने यह फैसला उस समय दिया, जब वरिष्ठ वकील नित्या रामकृष्णन ने कोर्ट को बताया कि वरदराजन और अन्य पत्रकारों ने असम पुलिस को पत्र लिखा था, लेकिन अब तक कोई जवाब नहीं मिला है।
सुप्रीम कोर्ट ने पत्रकारों की इस बात को रिकॉर्ड में लेते हुए सुनवाई को अगली तारीख तक स्थगित कर दिया। सुनवाई के दौरान सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता केंद्र सरकार की ओर से पेश हुए। उन्होंने कोर्ट से कहा कि वह उस याचिका पर जवाब दाखिल करना चाहते हैं जिसमें भारतीय न्याय संहिता 2023 के तहत राजद्रोह से जुड़ी धारा 152 की सांविधानिक वैधता को चुनौती दी गई है।
सेवानिवृत्त मेजर जनरल एस. जी. वोंबटकेरे की ओर से यह जनहित याचिका दाखिल की गई है। वोंबटकेरे विशिष्ट सेवा पदक से सम्मानित एक पूर्व सैन्य अधिकारी हैं। याचिका में धारा 152 को चुनौती दी गई है, जो भारत की संप्रभुता, एकता और अखंडता को खतरे में डालने वाले कृत्यों से संबंधित है। सुप्रीम कोर्ट ने तुषार मेहता को इस याचिका पर जवाब दाखिल करने की अनुमति दी। 22 अगस्त को शीर्ष अदालत ने असम पुलिस को निर्देश दिया था कि वरदराजन और अन्य पत्रकारों के खिलाफ किसी तरह की सख्त कार्रवाई न की जाए। यह मामला ऑपरेशन सिंदूर पर लिखे एक लेख को लेकर है। हालांकि कोर्ट ने पत्रकारों को यह भी निर्देश दिया था कि वे जांच में सहयोग करें और कानून का पालन करें। कोर्ट ने पुलिस से इस मामले पर स्थिति रिपोर्ट भी मांगी थी।
पहली प्राथमिकी 'फाउंडेशन फॉर इंडिपेंडेंट जर्नलिज्म' और वरदराजन के खिलाफ 11 जुलाई को असम के मोरीगांव थाने में दर्ज की गई थी। यह प्राथमिकी बीएनएस की धारा 152 और अन्य धाराओं के तहत दर्ज हुई थी। इसी तरह, एक और प्राथमिकी गुवाहाटी के थाने में दर्ज हुई थी, जिसमें राजद्रोह और अन्य धाराओं के तहत मामला दर्ज किया गया।
सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को वरिष्ठ पत्रकार सिद्धार्थ वरदराजन और अन्य पत्रकारों को असम में उनके खिलाफ दर्ज मामलों में गिरफ्तारी या अन्य सख्त कार्रवाई से दी गई सुरक्षा को बढ़ा दिया है। ये मामले एक ऑनलाइन न्यूज पोर्टल पर छपी एक खबर को लेकर दर्ज किए गए थे। जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जयमाल्या बागची की पीठ ने यह फैसला उस समय दिया, जब वरिष्ठ वकील नित्या रामकृष्णन ने कोर्ट को बताया कि वरदराजन और अन्य पत्रकारों ने असम पुलिस को पत्र लिखा था, लेकिन अब तक कोई जवाब नहीं मिला है।
सुप्रीम कोर्ट ने पत्रकारों की इस बात को रिकॉर्ड में लेते हुए सुनवाई को अगली तारीख तक स्थगित कर दिया। सुनवाई के दौरान सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता केंद्र सरकार की ओर से पेश हुए। उन्होंने कोर्ट से कहा कि वह उस याचिका पर जवाब दाखिल करना चाहते हैं जिसमें भारतीय न्याय संहिता 2023 के तहत राजद्रोह से जुड़ी धारा 152 की सांविधानिक वैधता को चुनौती दी गई है।
सेवानिवृत्त मेजर जनरल एस. जी. वोंबटकेरे की ओर से यह जनहित याचिका दाखिल की गई है। वोंबटकेरे विशिष्ट सेवा पदक से सम्मानित एक पूर्व सैन्य अधिकारी हैं। याचिका में धारा 152 को चुनौती दी गई है, जो भारत की संप्रभुता, एकता और अखंडता को खतरे में डालने वाले कृत्यों से संबंधित है। सुप्रीम कोर्ट ने तुषार मेहता को इस याचिका पर जवाब दाखिल करने की अनुमति दी। 22 अगस्त को शीर्ष अदालत ने असम पुलिस को निर्देश दिया था कि वरदराजन और अन्य पत्रकारों के खिलाफ किसी तरह की सख्त कार्रवाई न की जाए। यह मामला ऑपरेशन सिंदूर पर लिखे एक लेख को लेकर है। हालांकि कोर्ट ने पत्रकारों को यह भी निर्देश दिया था कि वे जांच में सहयोग करें और कानून का पालन करें। कोर्ट ने पुलिस से इस मामले पर स्थिति रिपोर्ट भी मांगी थी।
पहली प्राथमिकी 'फाउंडेशन फॉर इंडिपेंडेंट जर्नलिज्म' और वरदराजन के खिलाफ 11 जुलाई को असम के मोरीगांव थाने में दर्ज की गई थी। यह प्राथमिकी बीएनएस की धारा 152 और अन्य धाराओं के तहत दर्ज हुई थी। इसी तरह, एक और प्राथमिकी गुवाहाटी के थाने में दर्ज हुई थी, जिसमें राजद्रोह और अन्य धाराओं के तहत मामला दर्ज किया गया।
संपूर्ण हिमालय पर्वतमाला पारिस्थितिक संकट का सामना कर रही : सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को कहा कि पारिस्थितिकी और पर्यावरण संबंधी स्थिति से जुड़ा मुद्दा केवल हिमाचल प्रदेश तक ही सीमित नहीं है, बल्कि समूचा हिमालय क्षेत्र इस सकंट का सामना कर रहा है। जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने कहा कि वह हिमाचल प्रदेश में पारिस्थितिकी और पर्यावरणीय परिस्थितियों से संबंधित मुद्दों से जुड़े स्वतः संज्ञान मामले में 23 सितंबर को अपना आदेश पारित करेगी।
जस्टिस मेहता ने कहा, आखिरकार, पारिस्थितिकी और पर्यावरणीय संकट केवल हिमाचल तक ही सीमित नहीं है। पूरी हिमालयी शृंखला इसका सामना कर रही है। सुनवाई के दौरान, हिमाचल प्रदेश के महाधिवक्ता और अतिरिक्त महाधिवक्ता ने पीठ को इस मामले में राज्य की ओर से दायर एक रिपोर्ट के बारे में बताया। इस मामले में न्यायमित्र के रूप में न्यायालय की सहायता कर रहे वरिष्ठ वकील के. परमेश्वर ने कहा कि राज्य की ओर से दायर रिपोर्ट में वृक्षावरण सहित कई पहलुओं को शामिल किया गया है।
उन्होंने कहा, रिपोर्ट में कई पहलुओं को शामिल किया गया है। सभी पहलुओं पर एक साथ विचार करना संभव नहीं हो सकता। इसमें वृक्षावरण से लेकर खनन पहलू, ग्लेशियर आदि को शामिल किया गया है। परमेश्वर ने कहा कि राज्य ने रिपोर्ट में दलील दी गई थी कि ग्लेशियरों के आकार में कमी और उनके खिसकने को लेकर कुछ चिंताएं हैं, लेकिन उन्हें लेकर विशिष्ट जानकारी रिपोर्ट में नहीं है।
सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को कहा कि पारिस्थितिकी और पर्यावरण संबंधी स्थिति से जुड़ा मुद्दा केवल हिमाचल प्रदेश तक ही सीमित नहीं है, बल्कि समूचा हिमालय क्षेत्र इस सकंट का सामना कर रहा है। जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने कहा कि वह हिमाचल प्रदेश में पारिस्थितिकी और पर्यावरणीय परिस्थितियों से संबंधित मुद्दों से जुड़े स्वतः संज्ञान मामले में 23 सितंबर को अपना आदेश पारित करेगी।
जस्टिस मेहता ने कहा, आखिरकार, पारिस्थितिकी और पर्यावरणीय संकट केवल हिमाचल तक ही सीमित नहीं है। पूरी हिमालयी शृंखला इसका सामना कर रही है। सुनवाई के दौरान, हिमाचल प्रदेश के महाधिवक्ता और अतिरिक्त महाधिवक्ता ने पीठ को इस मामले में राज्य की ओर से दायर एक रिपोर्ट के बारे में बताया। इस मामले में न्यायमित्र के रूप में न्यायालय की सहायता कर रहे वरिष्ठ वकील के. परमेश्वर ने कहा कि राज्य की ओर से दायर रिपोर्ट में वृक्षावरण सहित कई पहलुओं को शामिल किया गया है।
उन्होंने कहा, रिपोर्ट में कई पहलुओं को शामिल किया गया है। सभी पहलुओं पर एक साथ विचार करना संभव नहीं हो सकता। इसमें वृक्षावरण से लेकर खनन पहलू, ग्लेशियर आदि को शामिल किया गया है। परमेश्वर ने कहा कि राज्य ने रिपोर्ट में दलील दी गई थी कि ग्लेशियरों के आकार में कमी और उनके खिसकने को लेकर कुछ चिंताएं हैं, लेकिन उन्हें लेकर विशिष्ट जानकारी रिपोर्ट में नहीं है।
आदिवासियों की जमीन को घोषित नहीं किया जा सकेगा वक्फ संपत्ति
सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को संशोधित वक्फ कानून की उस धारा को बरकरार रखा है, जो आदिवासियों की जमीन को वक्फ संपत्ति घोषित करने से रोकती है। चीफ जस्टिस (सीजेआई) बी आर गवई और जस्टिस ऑगस्टिन जॉर्ज मसीह की पीठ ने अंतरिम आदेश में कहा कि पूरे कानून को नहीं रोका जाएगा, लेकिन आदिवासी जमीन संबंधी प्रमुख प्रावधान न्यायोचित है। उन्होंने यह भी कहा कि वक्फ की संपत्ति के रूप में पंजीकरण के समय वक्फ दस्तावेज जोड़ना जरूरी है।
सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को संशोधित वक्फ कानून की उस धारा को बरकरार रखा है, जो आदिवासियों की जमीन को वक्फ संपत्ति घोषित करने से रोकती है। चीफ जस्टिस (सीजेआई) बी आर गवई और जस्टिस ऑगस्टिन जॉर्ज मसीह की पीठ ने अंतरिम आदेश में कहा कि पूरे कानून को नहीं रोका जाएगा, लेकिन आदिवासी जमीन संबंधी प्रमुख प्रावधान न्यायोचित है। उन्होंने यह भी कहा कि वक्फ की संपत्ति के रूप में पंजीकरण के समय वक्फ दस्तावेज जोड़ना जरूरी है।