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Supreme Court: मुकुल रॉय को सुप्रीम कोर्ट से राहत, अयोग्यता मामले में कलकत्ता हाईकोर्ट के फैसले पर लगी रोक

Fri, 16 Jan 2026 01:28 PM IST
रिया दुबे न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: रिया दुबे Updated Fri, 16 Jan 2026 01:28 PM IST
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Supreme Court Updates relief to Mukul Roy in defection row Telangana BRS MLAs Disqualification and other cases
सुप्रीम कोर्ट - फोटो : ANI

सुप्रीम कोर्ट ने कलकत्ता हाईकोर्ट के उस फैसले पर रोक लगा दी जिसमें टीएमसी नेता मुकुल रॉय को दलबदल कानून के तहत पश्चिम बंगाल विधानसभा की सदस्यता से अयोग्य घोषित किया गया था। सीजेआई जस्टिस सूर्यकांत की पीठ ने मुकुल रॉय के पुत्र सुभ्रांशु रॉय की ओर से दायर याचिका पर विपक्ष के नेता शुभेंदु अधिकारी और भाजपा विधायक अंबिका रॉय को नोटिस जारी करते हुए हाईकोर्ट के आदेश के संचालन को फिलहाल स्थगित कर दिया।

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सुप्रीम कोर्ट में याचिकाकर्ता की ओर से दलील दी गई कि हाईकोर्ट ने सीमित न्यायिक समीक्षा के अधिकार से आगे बढ़कर विधायक को अयोग्य घोषित किया। वकील ने कहा कि दलबदल साबित करने के लिए पेश सोशल मीडिया सामग्री साक्ष्य अधिनियम के तहत प्रमाणित नहीं थी। पीठ ने कहा कि रॉय के खिलाफ इलेक्ट्रॉनिक सबूत, जिसमें उन्हें टीएमसी की प्रेस कॉन्फ्रेंस में भाग लेते हुए दिखाया गया था, उसे साबित करना होगा क्योंकि आजकल आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस जैसे टूल का इस्तेमाल किया जाता है। इलेक्ट्रॉनिक सबूत की जांच करनी होगी। कोर्ट ने प्रतिवादियों से चार सप्ताह के भीतर जवाब दाखिल करने के लिए कहा है।
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गौरतलब है कि मुकुल रॉय ने वर्ष 2021 में कृष्णानगर नॉर्थ सीट से भाजपा के टिकट पर विधानसभा चुनाव जीता था। आरोप है कि चुनाव के बाद उन्होंने टीएमसी का दामन थाम लिया। इस दलबदल को लेकर शुभेंदु अधिकारी और अंबिका रॉय ने विधानसभा अध्यक्ष के समक्ष अयोग्यता याचिकाएं दाखिल की थीं। अध्यक्ष की ओर से याचिकाएं खारिज किए जाने के बाद मामला हाईकोर्ट पहुंचा। हाईकोर्ट ने रॉय को अयोग्य ठहराया था।

बीआरएस विधायकों की अयोग्यता पर सुप्रीम कोर्ट सख्त

सुप्रीम कोर्ट ने तेलंगाना विधानसभा स्पीकर से कहा कि वे दो सप्ताह के भीतर अदालत को यह जानकारी दें कि भारत राष्ट्र समिति (BRS) के उन विधायकों के खिलाफ दायर अयोग्यता याचिकाओं पर अब तक क्या कार्रवाई हुई है, जो दल बदलकर सत्तारूढ़ कांग्रेस में शामिल हो गए हैं। जस्टिस संजय करोल और जस्टिस ए.जी. मसीह की पीठ ने स्पीकर को स्टेटस रिपोर्ट दाखिल करने का निर्देश देते हुए इसे अंतिम अवसर बताया है।



अदालत ने स्पष्ट किया कि अगर अब भी आदेशों का पालन नहीं हुआ तो इसके गंभीर परिणाम हो सकते हैं। गौरतलब है कि सुप्रीम कोर्ट पहले ही स्पीकर को अवमानना नोटिस जारी कर चुका है और यह दोहरा चुका है कि दसवीं अनुसूची के तहत अयोग्यता याचिकाओं पर फैसला करते समय स्पीकर को संवैधानिक प्रतिरक्षा प्राप्त नहीं होती।

सुप्रीम कोर्ट ने फार्मासिस्ट भर्ती में डिप्लोमा को न्यूनतम योग्यता बनाए रखने का प्रावधान बरकरार रखा

सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को बिहार फार्मासिस्ट कैडर नियम, 2014 के उस प्रावधान को वैध माना, जिसके अनुसार फार्मासिस्ट पद के लिए न्यूनतम योग्यता 'फार्मेसी में डिप्लोमा' होना आवश्यक है। कोर्ट ने बी-फार्मा/एम-फार्मा डिग्री धारकों की चुनौती खारिज कर दी, जिन्होंने डिप्लोमा न होने के कारण अपनी भर्ती में शामिल न किए जाने का विरोध किया था। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि राज्य द्वारा 10+2 और फार्मेसी डिप्लोमा को न्यूनतम योग्यता तय करना तर्कसंगत है और इसे मनमाना नहीं कहा जा सकता। कोर्ट ने यह भी कहा कि फार्मासिस्ट सरकार के स्वास्थ्य प्रणाली का अहम हिस्सा हैं। सरकारी अस्पतालों, डिस्पेंसरी और प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों में फार्मासिस्ट को दवाओं के प्रबंधन, वितरण, स्टॉक रखरखाव, रोगी परामर्श और नियामक नियमों का पालन सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी दी जाती है। इसलिए राज्य द्वारा योग्य उम्मीदवारों का चयन करना उचित है।

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