सुप्रीम कोर्ट अपडेट: 10 अक्तूबर के प्रदर्शन से पहले जंतर-मंतर को प्रतिबंधों से रखा गया था बाहर, पुलिस ने बताया
यह याचिका मार्च के दौरान कथित तौर पर हुए हंगामे और नारेबाजी को लेकर दायर की गई है। अदालत ने सभी संबंधित पक्षों को अपना पक्ष रखने के लिए कहा है। अब इस मामले में अगली सुनवाई 23 नवंबर को होगी। इस मार्च में राहुल गांधी समेत इंडिया ब्लॉक के कई नेता मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) और कथित वोट चोरी के मुद्दे पर अपनी आपत्तियां दर्ज कराने सुप्रीम कोर्ट पहुंचे थे।
विपक्षी नेताओं ने चुनाव प्रक्रिया और मतदाता सूची में कथित अनियमितताओं को लेकर अदालत में याचिका दाखिल की थी। इस मामले में चार वकीलों की ओर से याचिका दायर की गई है। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि राजनीतिक दलों और नेताओं को अदालत परिसर में जुलूस निकालने, नारेबाजी करने या किसी तरह का प्रदर्शन करने की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए।
उनका तर्क है कि इस तरह की गतिविधियों से न्यायिक कामकाज प्रभावित हो सकता है और अदालत पर दबाव बनाने की कोशिश हो सकती है। याचिका में सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट परिसरों के आसपास राजनीतिक प्रदर्शनों को नियंत्रित करने के लिए एक समान दिशा-निर्देश बनाने की मांग की गई है।
तरुण तेजपाल की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई टली, अब 5 नवंबर को होगी अगली सुनवाई
सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को पत्रकार तरुण तेजपाल की याचिका पर सुनवाई 5 नवंबर तक टाल दी। तेजपाल ने 2013 के दुष्कर्म मामले में बॉम्बे हाईकोर्ट के फैसले को चुनौती दी है। हाईकोर्ट ने उन्हें 10 साल की सजा सुनाई थी। जस्टिस एमएम सुंदरेश और जस्टिस प्रसन्ना बी वराले की पीठ ने यह फैसला गोवा सरकार की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता के समय मांगने पर लिया। तेजपाल की ओर से पेश वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल ने दिवाली पर उन्हें घर जाने की अनुमति देने की मांग की। हालांकि, मेहता ने इसका विरोध किया। सुप्रीम कोर्ट ने पहले तेजपाल की सजा को चुनौती देने वाली याचिका पर गोवा पुलिस को नोटिस जारी किया था। वहीं, गोवा सरकार ने भी सजा बढ़ाने की मांग करते हुए याचिका दायर की है। बॉम्बे हाईकोर्ट ने 6 अगस्त को तेजपाल को दोषी ठहराते हुए 10 साल के कठोर कारावास की सजा सुनाई थी। इससे पहले ट्रायल कोर्ट ने उन्हें बरी कर दिया था। यह मामला 2013 में गोवा के एक होटल की लिफ्ट में अपनी जूनियर सहकर्मी से दुष्कर्म से जुड़ा है। तेजपाल ने 20 अगस्त को सुप्रीम कोर्ट में हाईकोर्ट के फैसले को चुनौती दी थी।
10 अक्तूबर के प्रदर्शन से पहले जंतर-मंतर को प्रतिबंधों से रखा गया था बाहर, दिल्ली पुलिस ने बताया
- दिल्ली पुलिस ने मंगलवार को सुप्रीम कोर्ट को बताया कि 10 अक्टूबर के प्रदर्शन से पहले राजधानी के कई इलाकों में निषेधाज्ञा लागू की गई थी, लेकिन जंतर-मंतर को इन प्रतिबंधों से बाहर रखा गया था। यहां प्रदर्शन की अनुमति थी, लेकिन इसके लिए पहले लिखित मंजूरी लेना और शाम पांच बजे तक प्रदर्शन खत्म करना जरूरी था।
- दिल्ली पुलिस आयुक्त अनुराग कुमार ने मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ के सामने अतिरिक्त हलफनामा दाखिल किया। इसमें बताया गया कि नई दिल्ली इलाके की संवेदनशीलता को देखते हुए भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 163 के तहत प्रतिबंध लगाए गए थे। यह हलफनामा माकपा महासचिव एमए बेबी की याचिका पर दाखिल किया गया है।
- इससे पहले सुप्रीम कोर्ट ने 15 अक्टूबर को दिल्ली पुलिस को धारा 163 के तहत जारी आदेश रिकॉर्ड पर रखने का निर्देश दिया था। एमए बेबी की याचिका में 10 अक्टूबर के प्रस्तावित प्रदर्शन से पहले दिल्ली मेट्रो के 57 स्टेशनों को बंद करने के फैसले को चुनौती दी गई थी। पुलिस ने पहले भी कहा था कि मेट्रो सेवाओं को नियंत्रित करने समेत सभी कदम खुफिया सूचनाओं और मौजूदा हालात के आकलन के आधार पर उठाए गए थे।
- पुलिस ने बताया कि संसद, राष्ट्रपति भवन और इंडिया गेट जैसे महत्वपूर्ण प्रतिष्ठानों की मौजूदगी के कारण प्रतिबंध जरूरी थे। जुलाई में हुए प्रदर्शनों के दौरान सामने आए हालात को भी ध्यान में रखा गया था। 19 अगस्त से 26 सितंबर के बीच सात पुलिस उप-मंडलों में निषेधाज्ञा के आदेश जारी किए गए थे। इनमें कनॉट प्लेस, तुगलक रोड, संसद मार्ग, चाणक्यपुरी, बाराखंभा रोड, सफदरजंग एन्क्लेव और डिफेंस कॉलोनी शामिल थे।
- हालांकि, संसद मार्ग और कनॉट प्लेस के आदेशों में जंतर-मंतर रोड के छूट वाले क्षेत्र को स्पष्ट रूप से प्रतिबंधों से बाहर रखा गया था। इन आदेशों के तहत बिना लिखित अनुमति पांच या अधिक लोगों के जुटने, बैठक, नारेबाजी, भाषण, जुलूस, प्रदर्शन और धरना देने पर रोक थी। दिल्ली में 15 पुलिस जिले और 72 उप-मंडल हैं। धारा 163 के आदेश 60 दिनों तक लागू रहते हैं, जब तक उन्हें पहले वापस न ले लिया जाए। इनके उल्लंघन पर भारतीय न्याय संहिता की धारा 223 के तहत कार्रवाई का प्रावधान है।