Supreme Court: बेअंत सिंह हत्याकांड के दोषी की याचिका पर सुनवाई 11 मार्च तक टली, पंजाब जेल शिफ्ट की मांग
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सुप्रीम कोर्ट ने 1995 में पंजाब के मुख्य मंत्री बेअंत सिंह की हत्या के दोषी जगतार सिंह हवारा की याचिका पर सुनवाई 11 मार्च तक स्थगित कर दी। हवारा ने दिल्ली की तिहाड़ जेल से पंजाब की किसी जेल में स्थानांतरण की मांग की है। न्यायमूर्ति एम.एम. सुंदरश और न्यायमूर्ति एन. कोटिस्वर सिंह की पीठ ने सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता के अनुरोध पर मामले को आगे की तारीख तक टाल दिया।
हवारा की दलील क्या है?
याचिका में कहा गया है कि हवारा पंजाब के फतेहगढ़ साहिब जिले के निवासी हैं और उनके खिलाफ दिल्ली में कोई मामला लंबित नहीं है, इसलिए उन्हें पंजाब की जेल में रखा जाना चाहिए। याचिका में यह भी दावा किया गया कि जेल में उनका आचरण पिछले 19 वर्षों से संतोषजनक रहा है।
हालांकि, 2004 में एक बार जेल से फरार होने की घटना का उल्लेख भी किया गया है। हवारा ने यह भी कहा कि समान मामले में दोषी एक अन्य कैदी को तिहाड़ से चंडीगढ़ जेल स्थानांतरित किया जा चुका है। हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ हवारा और अभियोजन पक्ष, दोनों की अपीलें सुप्रीम कोर्ट में लंबित हैं। अब इस मामले पर अगली सुनवाई 11 मार्च को होगी।
1995 के विस्फोट मामले में उम्रकैद
हवारा 31 अगस्त 1995 को चंडीगढ़ स्थित सिविल सचिवालय के बाहर हुए बम विस्फोट मामले में उम्रकैद की सजा काट रहे हैं। इस हमले में तत्कालीन पंजाब के मुख्यमंत्री बेअंत सिंह और 16 अन्य लोगों की मौत हुई थी। मार्च 2007 में ट्रायल कोर्ट ने हवारा को मौत की सजा सुनाई थी, जिसे बाद में पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय ने अक्तूबर 2010 में आजीवन कारावास में बदल दिया। अदालत ने आदेश दिया था कि उन्हें जीवन भर जेल में ही रहना होगा।
देवघर कोषागार घोटाला: लालू यादव को मिली जमानत के खिलाफ CBI की याचिका पर सुनवाई टली
सुनवाई के दौरान सीबीआई की ओर से अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल एस.वी. राजू ने दलील दी कि झारखंड हाईकोर्ट का आदेश कानून के विपरीत है और सजा निलंबित करना गलत है। वहीं लालू यादव की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने कहा कि कुछ आरोपियों को नोटिस तक नहीं मिला है। पीठ ने टिप्पणी करते हुए कहा कि सभी पक्ष इस विशेष अनुमति याचिका के मुद्दों से अवगत हैं और अधिकांश आरोपी 60, 70 और 80 वर्ष की आयु के हैं। जिन मामलों में प्रतिवादी का निधन हो चुका है, उन्हें बंद किया जाएगा।
अरुणाचल के सरकारी ठेकों का मामला : सीबीआई जांच की मांग वाली याचिका पर न्यायालय का फैसला सुरक्षित
सुप्रीम कोर्ट ने अरुणाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री पेमा खांडू के परिवार के सदस्यों के स्वामित्व वाली कंपनियों को सार्वजनिक निर्माण कार्यों के ठेके दिए जाने की सीबीआई जांच के अनुरोध वाली याचिका पर अपना फैसला मंगलवार को सुरक्षित रख लिया। न्यायमूर्ति विक्रम नाथ, न्यायमूर्ति संदीप मेहता और न्यायमूर्ति एन वी अंजारिया की पीठ ने फैसला सुरक्षित रखते हुए कहा कि पक्षकारों की ओर से पेश होने वाले वकील दो सप्ताह के भीतर अपनी लिखित दलीलें प्रस्तुत कर सकते हैं। याचिकाकर्ता गैर सरकारी संगठनों ‘सेव मोन रीजन फेडरेशन’ और ‘वॉलंटरी अरुणाचल सेना’ की ओर से पेश हुए अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने अरुणाचल प्रदेश द्वारा हाल ही में दायर हलफनामे का हवाला देते हुए तर्क दिया कि कई ठेके मुख्यमंत्री के परिवार के सदस्यों के स्वामित्व वाली कंपनियों को दिए गए थे।
उन्होंने कहा, सीबीआई जांच होनी चाहिए। इसमें भ्रष्टाचार की बू आ रही है, साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि राज्य पुलिस निष्पक्ष रूप से मामले की जांच नहीं कर पाएगी।पिछले साल दो दिसंबर को, सुप्रीम कोर्ट ने अरुणाचल प्रदेश सरकार को 2015 से 2025 तक दिए गए ठेकों का विस्तृत हलफनामा दाखिल करने को कहा था, जिसमें मुख्यमंत्री के परिवार के सदस्यों की कंपनियों को दिए गए ठेके भी शामिल हैं
सुप्रीम कोर्ट में पश्चिम बंगाल में भाजपा कार्यकर्ताओं की हत्या मामले की सुनवाई
सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को सवाल उठाया कि क्या हर हत्या या हिंसक घटना पर अदालत निगरानी रखेगी। यह सुनवाई 2018 के पश्चिम बंगाल स्थानीय निकाय चुनावों के बाद तीन भाजपा कार्यकर्ताओं की कथित हत्याओं से जुड़ी याचिका पर हुई, जिसने राज्य में राजनीतिक हिंसा पर नई बहस छेड़ दी। सुप्रीम कोर्ट की पीठ जिसमें न्यायमूर्ति विक्रम नाथ, संदीप मेहता और एन वी अंजरिया शामिल थे, ने याचिकाकर्ता से पूछा कि उन्होंने अपनी शिकायत के लिए कोलकाता उच्च न्यायालय क्यों नहीं संपर्क किया।
याचिका दाखिल करने वाले वरिष्ठ अधिवक्ता गौरव भाटिया ने बताया कि इस मामले की पृष्ठभूमि में 2018 में पश्चिम बंगाल में राजनीतिक कारणों से हुई 19 हत्याओं में से तीन प्रमुख हत्याओं को सुप्रीम कोर्ट के संज्ञान में लाया गया। उन्होंने कहा कि मृतकों के परिवार के सदस्यों को कुछ प्रभावशाली लोगों से जान का खतरा मिल रहा है।
भाटिया ने बताया कि इन 19 मामलों में से पांच मामलों में पुलिस ने बंद करने की रिपोर्ट दाखिल की थी। इस पर न्यायमूर्ति नाथ ने कहा, “क्या हर हत्या या हिंसक घटना की निगरानी यह कोर्ट करेगी?” और पीठ ने याचिकाकर्ता को सुझाव दिया कि उन्हें राहत के लिए उच्च न्यायालय से संपर्क करना चाहिए।
एक नजर पूरे मामले पर
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अगस्त 2018 में सुप्रीम कोर्ट ने पश्चिम बंगाल में तीन भाजपा कार्यकर्ताओं की कथित हत्याओं की जांच के लिए सीबीआई जांच की मांग वाली याचिका पर विचार करने की अनुमति दी थी।
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आरोप था कि मृतकों शक्तिपद सरकार, त्रिलोचन महतो और दुलाल कुमार के परिवार के सदस्यों को धमकियां दी जा रही थीं।
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शक्तिपद सरकार, मंडिरबाजार-धनुरहाट क्षेत्र के भाजपा ब्लॉक अध्यक्ष, जुलाई 2018 में दक्षिण 24 परगना जिले में घर लौटते समय हमला करके हत्या कर दी गई थी।
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दुलाल कुमार का शव जून 2018 में पुरुलिया जिले के बालरमपुर में बिजली के पोल से लटका पाया गया।
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त्रिलोचन महतो का शव मई 2018 में उसी जिले में पेड़ से लटका पाया गया।
2019 में सर्वोच्च न्यायालय ने किया था नोट
मार्च 2019 में सुप्रीम कोर्ट ने नोट किया कि शक्तिपद सरकार और त्रिलोचन महतो की हत्याओं में चार्जशीट दाखिल की गई थी। कोर्ट ने कहा कि मृतकों के परिवार के पास अन्य कानूनी उपाय उपलब्ध हैं, इसलिए वह दो मामलों के संदर्भ में याचिका पर आगे विचार नहीं करना चाहेगी।
सुप्रीम कोर्ट ने उत्तर प्रदेश के डीआईजी संजीव त्यागी को 9 मार्च को हैदराबाद स्थित फोरेंसिक लैब में उपस्थित होकर आवाज का नमूना देने का निर्देश दिया है। साथ ही, याचिकाकर्ता इस्लामुद्दीन अंसारी को भी उसी दिन वहां मौजूद रहने की अनुमति दी, ताकि वह अपने मोबाइल फोन में मौजूद ऑडियो क्लिप की पहचान कराने में फोरेंसिक अधिकारियों की मदद कर सकें। त्यागी पर मुस्लिम विरोधी टिप्पणी करने का आरोप है। जस्टिस अहसानुद्दीन अमानुल्लाह और जस्टिस के विनोद चंद्रन की पीठ ने निर्देश दिया कि जांच के बाद ऑडियो क्लिप की ट्रांसक्रिप्ट सहित पूरी रिपोर्ट सीलबंद लिफाफे में सौंपी जाए। मार्च, 2020 में कोविड-19 महामारी के दौरान यह ऑडियो क्लिप सामने आया था। उस समय त्यागी बिजनौर में पुलिस अधीक्षक थे। अदालत ने लैब से यह भी स्पष्ट करने को कहा है कि याचिकाकर्ता के मोबाइल फोन (जिसे पुलिस ने जब्त कर लिया था) से कोई सामग्री हटाई गई है या नहीं। मामला उस याचिका से जुड़ा है, जिसमें इस्लामुद्दीन अंसारी ने अपने खिलाफ दर्ज आपराधिक कार्यवाही को चुनौती दी थी। अंसारी पर ऑडियो क्लिप के जरिए अफवाह फैलाने के आरोप में आईपीसी की धारा 505 और आईटी एक्ट की धारा 67 के तहत मुकदमा दर्ज किया गया था। दिसंबर, 2025 में सुप्रीम कोर्ट ने उनके खिलाफ कार्यवाही रद्द कर दी थी और ऑडियो क्लिप की सत्यता की जांच के निर्देश दिए थे।
सुप्रीम कोर्ट ने धोखाधड़ी के एक मामले में आरोपी को जमानत देने के पिछले साल नवंबर के आदेश को यह कहते हुए रद्द कर दिया कि इलाहाबाद हाईकोर्ट को अंधाधुंध समानता का सिद्धांत लागू नहीं करना चाहिए था। जस्टिस संजय कुमार और जस्टिस के विनोद चंद्रन की पीठ ने जमानत मामलों में सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिए गए कई पूर्व निर्णयों का हवाला दिया, जिनमें एक कुख्यात अपराधी और हत्या की सुपारी लेने वाले अपराधी भी शामिल थे। पीठ ने कहा, हालांकि उक्त कुछ मामलों में की गई टिप्पणियां जघन्य अपराधों के संदर्भ में थीं, लेकिन हम यह ध्यान दे सकते हैं कि समाज के नागरिकों के जीवन और स्वतंत्रता का मूल्य केवल उनके एक व्यक्ति होने तक ही सीमित नहीं है। यह उनके जीवन की गुणवत्ता, जिसमें उनकी आर्थिक स्थिति भी शामिल है और इन सभी पहलुओं पर ध्यान देना होगा। पीठ ने कहा, आर्थिक प्रकृति के अपराधों में, जहां निर्दोष लोगों को ठगों द्वारा उनकी मेहनत की कमाई से वंचित कर दिया जाता है, जो दूसरों के भोलेपन का फायदा उठाकर उनका शोषण करना अपने जीवन-यापन का लक्ष्य बना लेते हैं, तो कथित अपराधियों की जमानत याचिका पर विचार करते समय उपरोक्त कारकों पर विचार करना आवश्यक है। पीठ ने सुनवाई के दौरान कहा कि राज्य द्वारा दायर जवाबी हलफनामे से स्पष्ट है कि आरोपी आदतन अपराधी है।
लालू यादव की जमानत के खिलाफ सीबीआई की याचिका पर सुनवाई टली
सुप्रीम कोर्ट ने राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव की जमानत के खिलाफ सीबीआई की याचिका पर सुनवाई 22 अप्रैल तक के लिए टाल दी। जांच एजेंसी ने देवघर कोषागार से जुड़े एक घोटाले में लालू को झारखंड हाईकोर्ट से मिली जमानत को चुनौती दी है। जस्टिस एमएम सुंदरेश और जस्टिस एन कोटिश्वर सिंह की पीठ ने यह कहते हुए मामले को टाल दिया कि दलीलें पूरी नहीं हुई हैं और कुछ आरोपियों की मौत हो चुकी है।
ऐसा कोई देश नहीं है...आरोपी के वानुआतु का नागरिक होने के दावे पर बोला सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने एक आरोपी की जमानत याचिका पर सुनवाई करते हुए मंगलवार को कहा कि वानुआतु जैसा कोई देश नहीं है। आरोपी ने दावा किया था कि वह प्रशांत महासागर के द्वीपीय देश वानुआतु का नागरिक है। आरोपी ने कलकत्ता हाईकोर्ट से उसे जमानत देने से इन्कार वाले फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी। पीठ को आरोपी के वकील ने बताया कि वह एक साल और तीन महीने से हिरासत में हैं। पीठ ने पूछा, आपका मुवक्किल किस देश के नागरिक हैं?
क्या यह अदालत बंगाल में होने वाली हर हत्या पर नजर रखेगी
सुप्रीम कोर्ट ने पश्चिम बंगाल में हत्याओं के मामले में सुनवाई करते हुए पूछा कि क्या यह अदालत बंगाल में होने वाली हर हत्या या हिंसा की घटना पर नजर रखेगी। यह सवाल राज्य में 2018 के स्थानीय निकाय चुनावों के बाद तीन भाजपा कार्यकर्ताओं की हत्या से संबंधित याचिका पर सुनवाई के दौरान उठाया गया। जस्टिस विक्रम नाथ, जस्टिस संदीप मेहता और जस्टिस एनवी अंजारिया की पीठ ने याचिकाकर्ता से पूछा कि अपनी शिकायत लेकर कलकत्ता हाईकोर्ट क्यों नहीं गए। मृतकों में से एक के भाई की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता गौरव भाटिया ने पीठ को मामले की संक्षिप्त पृष्ठभूमि बताते हुए कहा कि पश्चिम बंगाल में हुई तीन जघन्य हत्याओं को शीर्ष कोर्ट के संज्ञान में लाया गया था।
सौतेली बेटी की हत्या के मामले में गड़बड़ जांच के चलते पिता को किया बरी
सुप्रीम कोर्ट ने छह साल की सौतेली बेटी की हत्या के आरोपी व्यक्ति की सजा और आजीवन कारावास को रद्द कर दिया। कोर्ट ने इसके लिए गड़बड़ी भरी जांच और अभियोजन पक्ष की ओर से परिस्थितिजन्य साक्ष्य स्थापित करने में विफलता का हवाला दिया।
राष्ट्रीय चिकित्सा विज्ञान बोर्ड (एनबीईएमएस) ने सुप्रीम कोर्ट को बताया है कि क्वालीफाइंग कट-ऑफ परसेंटाइल कम होने के बाद नीट-पीजी 2025 काउंसलिंग के लिए 95,913 अतिरिक्त उम्मीदवार पात्र हो गए हैं। सुप्रीम कोर्ट में दायर हलफनामे में, बोर्ड ने कहा कि इस स्तर पर किसी भी तरह का हस्तक्षेप इन उम्मीदवारों को सीधे प्रभावित करेगा। हलफनामे में यह स्पष्ट किया गया है कि कट-ऑफ में कमी करने में इसकी कोई भूमिका नहीं है। यह निर्णय पूरी तरह से स्वास्थ्य सेवा महानिदेशालय, स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय और राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग के अधिकार क्षेत्र में आता है। यह हलफनामा नीट-पीजी 2025-26 के लिए पात्रता कट-ऑफ प्रतिशत में भारी कमी करने के एनबीईएमएस के निर्णय को चुनौती देने वाली याचिका के जवाब में दायर किया गया था। जस्टिस पीएस नरसिम्हा और जस्टिस आलोक आराधे की पीठ ने 4 फरवरी को सरकार, एनबीईएमएस, राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग और अन्य को नोटिस जारी किए थे।
सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से यह स्पष्ट करने को कहा है कि क्या कक्षा 9 से 12 तक पढ़ाने वाले विशेष शिक्षकों के लिए शिक्षक पात्रता परीक्षा (टीईटी) पास करना अनिवार्य है। अदालत ने कहा कि इस मुद्दे पर नियमों और दिशानिर्देशों में स्पष्टता जरूरी है। जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की पीठ ने एडिशनल सॉलिसिटर जनरल ऐश्वर्या भाटी, न्याय मित्र ऋषि मल्होत्रा और अन्य वरिष्ठ अधिवक्ताओं की दलीलें सुनने के बाद केंद्र से जवाब मांगा। अदालत ने तीन सवालों पर स्पष्टीकरण चाहा है, क्या माध्यमिक स्तर के विशेष शिक्षकों के लिए टीईटी अनिवार्य है, 10 जून 2022 के शिक्षा मंत्रालय के पत्र में बताई गई भर्ती प्रक्रिया सभी स्तरों पर लागू होती है या नहीं, और क्या 2010 के बाद किसी राज्य या केंद्र ने माध्यमिक स्तर के लिए टीईटी आयोजित की है। सुनवाई के दौरान केंद्र की ओर से कहा गया कि टीईटी सभी शिक्षकों के लिए जरूरी है और विशेष शिक्षकों के लिए भारतीय पुनर्वास परिषद का प्रमाणपत्र भी अनिवार्य है। इस पर जस्टिस दत्ता ने 2021 के एक फैसले का हवाला देते हुए कहा कि टीईटी की शर्त स्पष्ट रूप से कक्षा 1 से 5 और 6 से 8 तक के लिए है, 9 से 12 के लिए नहीं। उन्होंने कहा कि ऐसी अनिवार्यता नियमों के तहत तय होनी चाहिए। अदालत ने सभी राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों को 21 जुलाई 2022 के आदेश के अनुपालन में संविदा शिक्षकों के वेतन और सेवा शर्तों पर एक महीने में हलफनामा दाखिल करने का निर्देश भी दिया।
सुप्रीम कोर्ट ने गंभीर अपराधों में पीड़ितों को मुआवजा बढ़ाने और आरोपियों की सजा को मनमाने ढंग से कम करने की अदालतों की हालिया प्रथा की निंदा की है। सर्वोच्च न्यायालय ने इसे एक खतरनाक प्रवृत्ति करार दिया, जो समाज को यह गलत संदेश दे रही है कि अपराधी केवल पैसे देकर खुद को दोषमुक्त कर सकते हैं। जस्टिस राजेश बिंदल और जस्टिस विजय बिश्नोई की पीठ ने कहा कि सजा का उद्देश्य प्रभावी निवारण करना है ताकि भविष्य में ऐसे ही अपराध या कृत्य न हों और उनमें कमी लाई जा सके। सजा देते समय इस बात का ध्यान रखा जाना चाहिए कि सजा न तो बहुत कठोर हो और न ही इतनी नरम हो कि उसका निवारक प्रभाव कम हो जाए। पीठ ने कहा कि विभिन्न न्यायालयों की ओर से मुआवजे को सजा के विकल्प के रूप में मानने की गलत समझ चिंता का विषय है। यह एक ऐसी प्रथा है जिसकी निंदा की जानी चाहिए। पीठ ने आगे कहा, हमने विभिन्न उच्च न्यायालयों में एक प्रवृत्ति देखी है जिसमें निचली अदालत द्वारा अभियुक्तों को दी गई सजा को न्यायिक विवेक के किसी स्पष्ट प्रयोग के बिना मनमाने ढंग से और यांत्रिक रूप से कम कर दिया जाता है। पीठ ने कहा, पीड़ित को देय मुआवजे को बढ़ाने और सजा को कम करने की प्रथा, विशेष रूप से गंभीर अपराध के मामलों में, खतरनाक है क्योंकि यह समाज को गलत संदेश दे सकती है कि अपराधी या आरोपी व्यक्ति केवल आर्थिक मुआवजा देकर अपने अपराध से मुक्त हो सकते हैं। शीर्ष अदालत ने ये टिप्पणियां मद्रास हाईकोर्ट की मदुरै पीठ की ओर से दिए गए एक फैसले पर सुनवाई करते हुई की।