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SC: मॉब लिंचिंग पर सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणी, कहा- दिल्ली में बैठकर सभी मामलों की निगरानी संभव नहीं

Tue, 11 Feb 2025 08:44 PM IST
बशु जैन न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: बशु जैन Updated Tue, 11 Feb 2025 08:44 PM IST
सार

सुप्रीम कोर्ट ने मॉब लिंचिंग से जुड़ी एक जनहित याचिका का मंगलवार को निपटारा किया। कोर्ट ने कहा कि दिल्ली में बैठकर मॉब लिंचिंग के मामलों का प्रबंधन नहीं किया जा सकता। इसके अलावा सुप्रीम कोर्ट ने गौहाटी हाईकोर्ट के आदेश को खारिज कर दिया। इसमें एटीएम पर चौबीसों घंटे सुरक्षा गार्ड तैनात करने का आदेश दिया गया था। आइए पढ़ते हैं सुप्रीम कोर्ट की प्रमुख खबरें...। 

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Supreme Court update sc on mob lynching, said- it is not possible to monitor all the cases sitting in Delhi
सुप्रीम कोर्ट - फोटो : सोशल मीडिया

विस्तार

सुप्रीम कोर्ट ने मॉब लिंचिंग से जुड़ी एक जनहित याचिका का मंगलवार को निपटारा किया। कोर्ट ने कहा कि दिल्ली में बैठकर मॉब लिंचिंग के मामलों का प्रबंधन नहीं किया जा सकता। जस्टिस बीआर गवई और के विनोद चंद्रन की पीठ ने शीर्ष अदालत के 2018 के फैसले का हवाला दिया। इसमें भीड़ और गोरक्षकों द्वारा की जाने वाली हिंसा जैसे अपराधों से निपटने के लिए कई निर्देश दिए गए थे। 

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पीठ ने कहा कि दिल्ली में बैठकर हम देश के विभिन्न राज्यों में होने वाली घटनाओं की निगरानी नहीं कर सकते। जनहित याचिका में राज्यों को 2018 के फैसले के अनुरूप तत्काल कार्रवाई करने के निर्देश देने की मांग की गई थी, ताकि लिंचिंग और भीड़ हिंसा की घटनाओं से प्रभावी ढंग से निपटा जा सके। कोर्ट ने कहा कि अधिकारी शीर्ष अदालत द्वारा जारी निर्देशों का पालन करने के लिए बाध्य हैं। जब इस अदालत द्वारा निर्देश जारी किए जाते हैं, तो वे भारत के संविधान के अनुच्छेद 141 के मद्देनजर देश के सभी अधिकारियों और अदालतों के लिए बाध्यकारी होते हैं। यदि शीर्ष अदालत द्वारा जारी निर्देशों का पालन नहीं होता है, तो पीड़ित व्यक्ति के पास उपाय उपलब्ध है और वह सक्षम अदालतों का दरवाजा खटखटा सकता है।
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लिंचिंग पीड़ितों को लगी चोटों के लिए मुआवजे के रूप में न्यूनतम एक समान राशि प्रदान करने के लिए अधिकारियों को निर्देश देने के लिए एक अन्य प्रार्थना पर विचार करते हुए अदालत ने कहा कि पर्याप्त और उचित मुआवजा क्या हो सकता है, क्योंकि यह हर मामले में अलग-अलग होगा। यदि ऐसी घटना में किसी व्यक्ति को साधारण चोट लगी है और दूसरे को गंभीर चोटें आई हैं, तो एक समान मुआवजा देने का निर्देश अन्यायपूर्ण होगा। उन्होंने कहा कि इस तरह की राहत की मांग करने वाली याचिका पीड़ितों के हित में नहीं होगी। 
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सुनवाई के दौरान केंद्र की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने 2018 के फैसले का हवाला दिया और कहा कि शीर्ष अदालत ने विस्तृत दिशा-निर्देश जारी किए थे। नई भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) के तहत भीड़ द्वारा पीट-पीटकर हत्या एक अलग अपराध है।

एटीएम पर 24 घंटे सुरक्षा गार्ड की तैनाती जरूरी नहीं: सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को गौहाटी हाईकोर्ट के आदेश को खारिज कर दिया। इसमें एटीएम पर चौबीसों घंटे सुरक्षा गार्ड तैनात करने का आदेश दिया गया था। जस्टिस बीआर गवई और के विनोद चंद्रन की पीठ ने कुछ बैंकों की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि सभी एटीएम पर चौबीसों घंटे सुरक्षा गार्ड तैनात करना व्यावहारिक नहीं है। असम में हमारे पास करीब 4,000 एटीएम हैं। हम सभी एटीएम पर एक सुरक्षा गार्ड नहीं रख सकते। दुनिया भर में मान्यता प्राप्त व्यवस्था सीसीटीवी लगाना है। मेहता ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने दिसंबर 2016 में हाईकोर्ट के निर्देश पर रोक लगा दी थी। उन्होंने कहा कि स्टेट बैंक ऑफ इंडिया समेत याचिकाकर्ता बैंकों को दिसंबर 2013 में हाई कोर्ट द्वारा एटीएम के समुचित संचालन के लिए सुरक्षा प्रोटोकॉल से संबंधित अन्य निर्देशों को स्वीकार करने में कोई शिकायत नहीं है। पीठ ने याचिका स्वीकार कर ली और उच्च न्यायालय द्वारा जारी निर्देश को खारिज कर दिया। 

आजम खान के बेटे की अपील पर छह महीने में फैसला करे मुरादाबाद की अदालत
सुप्रीम कोर्ट ने मुरादाबाद की एक अदालत को 2008 के आपराधिक मामले में सपा नेता आजम खान के बेटे मोहम्मद अब्दुल्ला आजम खान की अपील पर छह महीने के भीतर फैसला करने का निर्देश दिया। जस्टिस एमएम सुंदरेश और राजेश बिंदल की पीठ ने कहा कि जिला और सत्र अदालत सजा के खिलाफ उनकी अपील पर फैसला करते समय अपराध की तारीख पर खान को किशोर मान सकती है। अब्दुल्ला खान और उनके पिता के खिलाफ 2008 में मुरादाबाद के छजलेट पुलिस स्टेशन में आईपीसी की धारा 341 (गलत तरीके से रोकना) और 353 (लोक सेवक को उसके कर्तव्य के निर्वहन से रोकने के लिए हमला या आपराधिक बल) के तहत मामला दर्ज किया गया था। आरोप लगाया गया था कि पुलिस ने जब उनके वाहन को चेकिंग के लिए रोका तो उन्होंने यातायात अवरुद्ध कर दिया था। खान ने इलाहाबाद उच्च न्यायालय के 13 अप्रैल, 2023 के आदेश के खिलाफ शीर्ष अदालत का रुख किया। इसमें उनकी सजा पर रोक लगाने से इनकार कर दिया गया था। इसके कारण उन्हें विधायक के रूप में अयोग्य घोषित कर दिया गया था। फरवरी 2023 में अब्दुल्ला खान को मुरादाबाद की अदालत ने मामले में दो साल जेल की सजा सुनाई थी। मंगलवार को खान की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने कहा कि उनके किशोर होने के दावे पर ट्रायल कोर्ट से उनके पक्ष में रिपोर्ट आई है। पीठ ने कहा कि सत्र न्यायालय पहले से ही मामले में अपील पर सुनवाई कर रहा है और वह अधिकतम यही कर सकता है कि वह अदालत से सजा के खिलाफ अपील का शीघ्र निपटारा करने के लिए कहे। पीठ ने मुरादाबाद की जिला एवं सत्र अदालत को अधिमानतः छह महीने के भीतर अपील का फैसला करने का आदेश दिया।

सार्वजनिक प्राधिकरण सावधानी बरतें, अनावश्यक पेड़ न काटें: सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को कहा कि पेड़ों की सुरक्षा करना हर किसी का सांविधानिक कर्तव्य है। सार्वजनिक प्राधिकरणों को भी इसमें सावधानी बरतनी चाहिए और जरूरत से ज्यादा पेड़ काटने की अनुमति नहीं मांगनी चाहिए। एनएचएआई की ओर से दाखिल याचिका पर सुनवाई करते हुए न्यायमूर्ति अभय एस ओका और न्यायमूर्ति उज्जवल भुइयां की पीठ ने कहा कि हमने व्यावहारिक रूप से यह प्रवृत्ति देखी है कि सार्वजनिक प्राधिकारी बड़ी संख्या में पेड़ काटना चाहते हैं, जबकि ऐसा करने की जरूरत नहीं है। टीटीजेड और दिल्ली में अधिकतर ऐसा होता है। एनएचएआई ने हमसे 850 पेड़ों को गिराने की अनुमति मांगी थी, जबकि राजमार्ग निर्माण के लिए केवल 650 पेड़ों को ही काटने की आवश्यकता थी। इसलिए सार्वजनिक प्राधिकरणों का भी कर्तव्य है कि वे भी अधिक से अधिक पेड़ों को बचाएं। उनकी सुरक्षा करें। याचिका में एनएचएआई ने ग्वालियर आगरा के बीच सिक्सलेन निर्माण के लिए ताज ट्रिपेजियम जोन में 800 से अधिक पेड़ों को काटने की अनुमति मांगी है। कोर्ट ने यह भी कहा कि प्रतिपूरक पेड़ लगाने के आदेश का भी पालन नहीं किया जा रहा है। पीठ ने केंद्रीय अधिकार प्राप्त समिति (सीईसी) को इसकी जांच के निर्देश दिए। कोर्ट ने कहा कि जांच रिपोर्ट मिलने के बाद ही अनुमति दी जाएगी। 

यमुना में गिर रहे 38 नालों की सफाई न कराने पर यूपी जल निगम को फटकार, प्रबंध निदेशक तलब
सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को यमुना में गिर रहे 38 नालों की सफाई न कराने पर उत्तर प्रदेश जल निगम को फटकार लगाई। न्यायमूर्ति अभय एस ओका और न्यायमूर्ति उज्जवल भुइयां की पीठ ने आदेश का पालन न होने पर जल निगम के प्रबंध निदेशक को तलब किया है। उनको वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिये उपस्थित होकर जवाब देने के लिए कहा है। पीठ ने कहा कि हमारे 25 नवंबर 2024 के आदेश का पालन नहीं किया गया है। हम उत्तर प्रदेश जल निगम के प्रबंध निदेशक को अगली सुनवाई की तारीख से एक सप्ताह पहले व्यक्तिगत रूप से हलफनामा दाखिल करने का निर्देश देते हैं। पीठ ने अगली सुनवाई 18 मार्च तय की। जल निगम के वकील ने कहा कि नाले बंद करने के अंतरिम उपाय आगरा नगर निगम को करने थे।
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