फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   India News ›   Supreme Court takes a tough stance on pensions for former MLAs and MLCs; seeks response from Yogi government.

‘जनसेवा या निजी फायदा?’: पूर्व विधायकों और एमएलसी की पेंशन पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, योगी सरकार से मांगा जवाब

Thu, 10 Sep 2026 04:11 PM IST
अस्मिता त्रिपाठी पीटीआई, नई दिल्ली
पीटीआई, नई दिल्ली Published by: अस्मिता त्रिपाठी Updated Thu, 10 Sep 2026 04:11 PM IST
सार

सुप्रीम कोर्ट ने उत्तर प्रदेश के मौजूदा और पूर्व विधायक और एमएलसी को मिलने वाली पेंशन व अन्य सुविधाओं के मामले में यूपी सरकार से जवाब मांगा है। याचिका में 1980 के कानून के प्रावधानों को चुनौती दी गई है। हाई कोर्ट ने पहले इसे खारिज कर दिया था। 

विज्ञापन
Supreme Court takes a tough stance on pensions for former MLAs and MLCs; seeks response from Yogi government.
सुप्रीम कोर्ट - फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स

विस्तार

सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को उत्तर प्रदेश सरकार और अन्य लोगों से एक याचिका पर जवाब मांगा। इस याचिका में 1980 के उस कानून के कुछ प्रावधानों की वैधता को चुनौती दी गई थी, जिसके तहत राज्य के मौजूदा और पूर्व एमएलए और एमएलसी को पेंशन और दूसरी सुविधाएं मिलती हैं।
विज्ञापन


लखनऊ बेंच के किस फैसले को दिया चुनौती? 
जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की बेंच ने इस याचिका पर सुनवाई करने पर सहमति जताई। इस याचिका में इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ बेंच के इस साल मई में दिए गए फैसले को चुनौती दी गई थी। हाई कोर्ट ने 'उत्तर प्रदेश राज्य विधानमंडल (सदस्यों के वेतन-भत्ते और पेंशन) अधिनियम, 1980' के कुछ प्रावधानों की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाली याचिका खारिज कर दी थी।
विज्ञापन


हाई कोर्ट ने क्या कहा है? 
हाई कोर्ट ने कहा था कि ये प्रावधान मौजूदा और पूर्व एमएलए और एमएलसी को कई तरह के वेतन, भत्ते और दूसरी सुविधाएं देते हैं। साथ ही उनके जीवनसाथी, परिवार के सदस्यों और साथी को पेंशन, पारिवारिक पेंशन, मुफ्त यात्रा, चिकित्सा सुविधाएं और दूसरी सुविधाएं भी देते हैं।
विज्ञापन
विज्ञापन


याचिका में क्या कहा गया है? 
सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट के फैसले को चुनौती देने वाली याचिका पर नोटिस जारी किया। सुनवाई के लिए इसे चार हफ्ते बाद की तारीख दी। याचिकाकर्ता 'लोक प्रहरी' ने हाई कोर्ट में यह तर्क देते हुए याचिका दायर की थी कि राज्य विधानसभा ने असल में खुद को ही अपने मामले का जज बना लिया है। अपने और अपने पूर्व सदस्यों को ऐसे फायदे दिए हैं जो साफ तौर पर मनमाने हैं। उस बुनियादी संवैधानिक विचार के खिलाफ हैं जिसके अनुसार सार्वजनिक पद जनसेवा के लिए होता है, न कि निजी फायदे के लिए।

हाई कोर्ट ने कहा था, 'रिट याचिकाकर्ता की मुख्य शिकायत यह है कि ये सभी प्रावधान भारत के संविधान के अनुच्छेद 195 द्वारा दी गई सीमित शक्तियों से कहीं आगे जाते हैं। यह अनुच्छेद केवल सदस्यों के वेतन और भत्तों की बात करता है। इसमें पेंशन, रिटायरमेंट के बाद मिलने वाले फायदों, परिवार/साथी के लिए सुविधाओं या 'अन्य सुविधाओं' का कोई जिक्र नहीं है।'


हाई कोर्ट ने याचिका खारिज कर क्या कहा था? 
संविधान का अनुच्छेद 195 किसी राज्य की विधानसभा और विधान परिषद के सदस्यों के वेतन और भत्तों से संबंधित है। हाई कोर्ट ने कहा था कि याचिकाकर्ता की चुनौती असल में किसी साबित हो सकने वाली संवैधानिक कमी के बजाय नीतिगत असहमति पर आधारित थी। याचिका को खारिज करते हुए हाई कोर्ट ने कहा था, 'राज्य विधानसभा पर अपने 'सदस्यों' और 'पूर्व सदस्यों' के लिए सामाजिक सुरक्षा का कोई उपाय लागू करने पर कोई संवैधानिक रोक नहीं है।'
विज्ञापन
विज्ञापन

रहें हर खबर से अपडेट, डाउनलोड करें Android Hindi News apps, iOS Hindi News apps और Amarujala Hindi News apps अपने मोबाइल पे|
Get all India News in Hindi related to live update of politics, sports, entertainment, technology and education etc. Stay updated with us for all breaking news from India News and more news in Hindi.

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed