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Supreme Court: सरकारी नौकरियों में संविदा भर्ती पर अदालत सख्त, कहा- अस्थायी लेबल में श्रम का शोषण करना गलत

Tue, 19 Aug 2025 10:24 PM IST
हिमांशु चंदेल न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: हिमांशु चंदेल Updated Tue, 19 Aug 2025 10:24 PM IST
सार

सुप्रीम कोर्ट ने सरकारी नौकरियों में ‘एड-हॉकिज्म’ की प्रथा को असंवैधानिक बताते हुए कहा कि अस्थायी लेबल में श्रम का शोषण जनता के विश्वास को कमजोर करता है। अदालत ने उत्तर प्रदेश शिक्षा सेवा आयोग के कर्मचारियों की सेवाएं 2002 से नियमित करने का आदेश दिया।

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Supreme Court strict on contractual recruitment government jobs wrong exploit labour temporary label
सुप्रीम कोर्ट - फोटो : एएनआई

विस्तार

सुप्रीम कोर्ट ने सरकारी नौकरियों में लंबे समय से जारी 'एड-हॉकिज्म' यानी अस्थायी और संविदा नियुक्तियों की प्रथा पर सख्त टिप्पणी करते हुए कहा है कि अस्थायी लेबल के तहत नियमित श्रम का निरंतर शोषण जनता का विश्वास कमजोर करता है और यह संविधान द्वारा गारंटी दिए गए समान संरक्षण के अधिकार का उल्लंघन है। अदालत ने इस पर नाराजगी जताते हुए साफ किया कि सार्वजनिक रोजगार की नींव निष्पक्षता, तर्कसंगतता और काम की गरिमा पर टिकी होनी चाहिए, न कि बजट संतुलन के नाम पर कर्मचारियों पर बोझ डालकर।
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जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने यह टिप्पणी उत्तर प्रदेश उच्च शिक्षा सेवा आयोग से जुड़े कुछ कर्मचारियों की याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए की। अदालत ने इन कर्मचारियों की सेवाओं को नियमित करते हुए कहा कि राज्य एक संवैधानिक नियोक्ता है और उसे अपने बजट संतुलन के लिए कर्मचारियों की आजीविका पर बोझ नहीं डालना चाहिए। पीठ ने स्पष्ट किया कि जहां कार्य दैनिक और लगातार होता है, वहां संस्थानों को इसे अपनी स्वीकृत पद संरचना और नियुक्ति प्रक्रिया में शामिल करना अनिवार्य है। आर्थिक तंगी नीति का हिस्सा हो सकती है, लेकिन इसे कभी भी निष्पक्षता और तार्किक फैसलों पर हावी नहीं होने दिया जा सकता।
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रजिस्टर और रिकॉर्ड रखने के निर्देश
सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकारों और विभागों को निर्देश दिया कि वे पारदर्शी रजिस्टर, मस्टर रोल और अनुबंध संबंधी दस्तावेज रखें। अदालत ने कहा कि यह स्पष्ट होना चाहिए कि स्थायी पदों की जगह अस्थायी नियुक्तियों को क्यों प्राथमिकता दी जा रही है। अदालत ने चेतावनी दी कि केवल वित्तीय बाधाओं का हवाला देकर कार्यात्मक आवश्यकता और वर्षों से दैनिक वेतनभोगियों पर निर्भरता को नजरअंदाज करना प्रशासनिक मनमानी है। शीर्ष अदालत ने कहा कि सार्वजनिक रोजगार में पारदर्शिता और निष्पक्षता अनिवार्य है और इसके अभाव में कर्मचारियों के श्रम का शोषण ही नहीं बल्कि जनता के विश्वास को भी चोट पहुंचती है।
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कर्मचारियों की सेवाओं का नियमितीकरण
यह मामला 1989 से 1992 के बीच नियुक्त कर्मचारियों से जुड़ा था। सुप्रीम कोर्ट ने उनके पक्ष में फैसला सुनाते हुए कहा कि सभी की सेवाएं 24 फरवरी 2002 से नियमित मानी जाएंगी। अदालत ने राज्य सरकार और उत्तराधिकारी संस्था उत्तर प्रदेश शिक्षा सेवा चयन आयोग को आदेश दिया कि वे समकक्ष संवर्ग में नए पद सृजित करें, ताकि कर्मचारियों को किसी भी तरह की दिक्कत का सामना न करना पड़े। अदालत ने यह भी कहा कि लंबे समय से असुरक्षा की स्थिति में काम कर रहे कर्मचारियों के मानवीय पहलुओं की अनदेखी संविधान के अनुशासन के खिलाफ है।

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संवेदनशीलता और संवैधानिक अनुशासन पर जोर
सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में यह भी रेखांकित किया कि यद्यपि पद सृजन कार्यपालिका का विशेषाधिकार है, लेकिन पद न सृजित करने का निर्णय भी न्यायिक समीक्षा से बाहर नहीं है। अदालत ने प्रशासन को चेताया कि कर्मचारियों के मानवीय पहलुओं की अनदेखी करना संविधान की भावना के खिलाफ है। न्यायालय ने कहा कि राज्य सरकारों को यह समझना होगा कि संविदा और अस्थायी नियुक्तियां लंबे समय तक समाधान नहीं हो सकतीं। कर्मचारियों के साथ न्याय और उनके श्रम का सम्मान लोकतांत्रिक व्यवस्था की बुनियादी शर्त है।



 
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