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सुप्रीम कोर्ट ने भूमि अधिग्रहण मामले को चीफ जस्टिस के पास भेजा

Fri, 23 Feb 2018 01:37 AM IST
अमर उजाला ब्यूरो, नई दिल्ली
अमर उजाला ब्यूरो, नई दिल्ली Updated Fri, 23 Feb 2018 01:37 AM IST
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Supreme Court sent land acquisition case to Chief Justice of India

सुप्रीम कोर्ट ने भूमि अधिग्रहण से जुड़े एक मामले को मुख्य न्यायाधीश के पास भेज दिया, ताकि वह उचित पीठ का निर्णय ले सकें। दरअसल सुप्रीम कोर्ट की अलग-अलग पीठों के बीच ‘मतभेद’ बृहस्पतिवार को खुलकर सामने आ गया। वास्तव में न्यायिक आचरण और शिष्टता के मसले को लेकर विभिन्न पीठों के बीच यह मतभेद पैदा हुआ है।

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अलग-अलग पीठों के बीच ‘मतभेद’ खुलकर सामने आया

बुधवार को न्यायमूर्ति मदन बी लोकुर, न्यायमूर्ति कूरियन जोसेफ और न्यायमूर्ति नवीन गुप्ता की पीठ ने कहा था कि वह न्यायमूर्ति अरुण मिश्रा की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय पीठ द्वारा 8 फरवरी के फैसले से सहमत नहीं हैं। न्यायमूर्ति कूरियन जोसेफ ने कहा कि वह अरुण मिश्रा की पीठ के फैसले की योग्यता पर नहीं जा रहे हैं, बल्कि हमारी चिंता न्यायिक अनुशासन को लेकर है। वास्तव में 8 फरवरी को भूमि अधिग्रहण मामले में लिया गया फैसला वर्ष 2014 में सुप्रीम कोर्ट की तीन सदस्यीय पीठ द्वारा दिए गए फैसले से उलट है। 
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न्यायमूर्ति लोकुर की पीठ ने इसके साथ ही देश के तमाम हाईकोर्ट को भूमि अधिग्रहण को लेकर अंतिम आदेश पारित करने से मना किया था। साथ ही इस पीठ ने सुप्रीम कोर्ट की दूसरी पीठों से आग्रह किया था कि वह कुछ समय के लिए भूमि अधिग्रहण के मामले में आगे की कार्रवाई न करे।
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बृहस्पतिवार को न्यायमूर्ति अरुण मिश्रा की पीठ और न्यायमूर्ति आदर्श गोयल की पीठ ने उनके पास लंबित भूमि अधिग्रहण के मामलों को चीफ जस्टिस के पास भेजते हुए आगे का निर्णय लेने का आग्रह किया है। दोनों ही पीठ ने चीफ जस्टिस से या तो प्रशासनिक या न्यायिक स्तर पर निर्णय लेने का आग्रह किया है। दोनों ही पीठ ने बुधवार को कहा कि न्यायमूर्ति लोकुर, जोसेफ और नवीन गुप्ता की पीठ द्वारा पारित आदेश के मद्देनजर इस मसले को चीफ जस्टिस के पास भेजा जाना ही उचित है। चीफ जस्टिस यह तय करेंगे कि इस मतभेद का निपटारा पांच सदस्यीय पीठ द्वारा किया जाना चाहिए या नहीं।


क्या है मतभेद का कारण

8 फरवरी को इंदौर विकास प्राधिकरण मामले में न्यायमूर्ति जस्टिस अरुण मिश्रा की अगुवाई वाली तीन सदस्यीय पीठ ने फैसला दिया था कि 2013 भूमि अधिग्रहण अधिनियम की धारा 31(1) के तहत अगर एक बार मुआवजे की राशि को बिना शर्त भुगतान किया गया और जमीन मालिक ने इसे अस्वीकार कर दिया तब भी उसे भुगतान माना जाएगा। यह फैसला वर्ष 2014 में तीन सदस्यीय पीठ द्वारा दिए गए फैसले के उलट था। जिस पर बुधवार को न्यायमूर्ति मदन बी लोकुर की पीठ ने कहा था कि तीन सदस्यीय पीठ के फैसले को तीन सदस्यीय पीठ नहीं पलट सकती। उनका कहना था कि यह न्यायिक अनुशासन और शिष्टता के खिलाफ है। इस मामले को बड़ी पीठ के पास भेजा जाना चाहिए था, लेकिन ऐसा नहीं किया गया।

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