Supreme Court: मुस्लिम महिलाओं के अधिकार पर सवाल, केंद्र से मांगा जवाब; समान नागरिक संहिता पर भी टिप्पणी
सुप्रीम कोर्ट ने मुस्लिम पर्सनल लॉ की कुछ धाराओं को चुनौती देने वाली पीआईएल पर केंद्र सरकार से जवाब मांगा है। कोर्ट ने महिला अधिकार और समान नागरिक संहिता पर भी अहम टिप्पणी की।
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विस्तार
सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण जनहित याचिका (PIL) पर सुनवाई करते हुए केंद्र सरकार से जवाब मांगा है, जिसमें मुस्लिम पर्सनल लॉ (शरीयत) अधिनियम 1937 की कुछ धाराओं को महिलाओं के अधिकारों के खिलाफ बताया गया है। सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने कहा कि समान नागरिक संहिता एक संवैधानिक लक्ष्य है, जिस पर देश में गंभीर विचार-विमर्श की आवश्यकता है।
PIL में क्या है दावा?
यह जनहित याचिका न्याय नारी फाउंडेशन और अन्य याचिकाकर्ताओं द्वारा दायर की गई है, जिसमें कहा गया है कि मुस्लिम पर्सनल लॉ के तहत संपत्ति और उत्तराधिकार से जुड़े नियम महिलाओं के साथ भेदभाव करते हैं। याचिका में दावा किया गया है कि कई मामलों में महिलाओं को पुरुषों की तुलना में आधा या उससे भी कम हिस्सा मिलता है, जो संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) का उल्लंघन है।
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कोर्ट में हुई बहस
सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने दलील दी कि यह नियम महिलाओं के मौलिक अधिकारों का हनन करता है। उन्होंने कहा कि संपत्ति संबंधी मुद्दे धार्मिक परंपरा नहीं बल्कि नागरिक कानून का हिस्सा हैं। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि वह सीधे कानून में बदलाव या नई व्यवस्था लागू नहीं कर सकता, क्योंकि यह विधायिका का अधिकार क्षेत्र है।
समान नागरिक संहिता पर टिप्पणी
सुनवाई के दौरान अदालत ने यह भी कहा कि देश में समान नागरिक संहिता पर विचार करना एक संवैधानिक महत्व का विषय है। हालांकि, कोर्ट ने यह भी चेतावनी दी कि न्यायपालिका को विधायिका की भूमिका में नहीं जाना चाहिए। कोर्ट ने कहा कि इस मामले में प्रभावित महिलाओं की प्रत्यक्ष भागीदारी जरूरी है। याचिकाकर्ताओं ने भी कहा कि वे इस मुद्दे से प्रभावित महिलाओं को सुनवाई में शामिल करेंगे।
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पत्नी का भरण-पोषण करना पति का प्राथमिक व निरंतर कर्तव्य- सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि भरण-पोषण की राशि तय करते समय संतुलन बनाए रखना जरूरी है, ताकि यह पत्नी के लिए पर्याप्त हो, लेकिन पति पर अत्यधिक बोझ भी न डाले। अदालत ने इसे प्रतिस्पर्धी हितों के बीच न्यायसंगत संतुलन बनाने की प्रक्रिया बताया। पीठ ने एक महिला को मिलने वाली मासिक भरण-पोषण राशि 15,000 रुपये से बढ़ाकर 25,000 रुपये कर दी। मामले के अनुसार, दोनों की शादी 7 मई 2023 को नई दिल्ली में हिंदू रीति-रिवाजों के अनुसार हुई थी। शादी के बाद पत्नी ससुराल में पति और उसके परिवार के साथ रहती थी, लेकिन संबंधों में तनाव बना रहा।
महिला ने आरोप लगाया कि उसे उपेक्षा के साथ शारीरिक व मानसिक उत्पीड़न का सामना करना पड़ा। शादी के एक साल के भीतर ही महिला को ससुराल छोड़कर मायके लौटना पड़ा और तब से वह अलग रह रही है। उसके पास आजीविका का कोई स्वतंत्र साधन नहीं है। इसके बाद महिला ने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (बीएनएसएस), 2023 की धारा 144 के तहत उत्तराखंड के चंपावत जिले के टनकपुर स्थित अदालत में 50,000 रुपये मासिक भरण-पोषण की मांग करते हुए याचिका दायर की। परिवार अदालत ने उसे 8,000 रुपये प्रतिमाह भरण-पोषण देने का आदेश दिया, जिसे उत्तराखंड हाईकोर्ट ने बढ़ाकर 15,000 रुपये कर दिया। महिला ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया जिसने इस राशि को बढ़ाकर 25,000 रुपये प्रति माह कर दिया।
अशोक चक्र के लिए दिशा-निर्देश वाली याचिका पर सुनवाई से इन्कार
पीठ ने कहा, आप समाज के लिए कुछ रचनात्मक कार्य करें। याचिकाकर्ता ने वाराणसी के एक गोलचक्कर पर लगाए गए अशोक चक्र की तस्वीर दिखाई, लेकिन पीठ ने याचिका पर विचार करने से इन्कार कर दिया।
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