Supreme Court Updates: PACL घोटाले में निवेशकों को लौटाए गए कितने रुपये; शीर्ष कोर्ट ने मांगी जानकारी
पीएसीएल को पर्ल ग्रुप के नाम से भी जाना जाता था। कंपनी ने आम लोगों से खेती और रियल एस्टेट जैसे कारोबार के आधार पर लगभग 60,000 करोड़ रुपये जुटाए थे। कंपनी ने यह निवेश 18 वर्षों के दौरान गैरकानूनी तरीके से हासिल किया था। जब लौटाने की बारी आई तो कंपनी पीछे हटने लगी। तब इस मामले में सेबी ने दखल दिया था और मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा था।
विस्तार
सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को पर्ल्स एग्रोटेक कॉर्पोरेशन लिमिटेड (पीएसीएल) की पोंजी योजनाओं के निवेशकों को लौटाने के लिए एकत्रित की गई राशि की जानकारी मांगी है। शीर्ष कोर्ट ने बाजार नियामक सेबी और पूर्व सीजेआई आरएम लोढ़ा की अध्यक्षता वाले विशेषज्ञ पैनल से पर्ल्स एग्रोटेक कॉर्पोरेशन लिमिटेड (पीएसीएल) की संपत्तियों की बिक्री और रिफंड के बारे में ताजा विवरण उपलब्ध कराने को कहा। बता दें कि इस विशेषज्ञ पैनल को अदालत ने नियुक्त किया था।
न्यायमूर्ति बेला एम त्रिवेदी और न्यायमूर्ति पंकज मिथल की पीठ इस मामले में सुनवाई कर रही थी। सुनवाई के दौरान भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड (सेबी) की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता प्रताप वेणुगोपाल ने दलील दी कि नियामक अपने द्वारा और न्यायमूर्ति लोढ़ा की अध्यक्षता वाली विशेषज्ञ समिति द्वारा उठाए गए कदमों पर नवीनतम रिपोर्ट दाखिल करने को तैयार हैं। वेणुगोपाल की दलील पर ध्यान देते हुए पीठ ने सेबी और पैनल द्वारा अब तक की गई कार्यवाही की जानकारी मांगी। इसके साथ ही शीर्ष कोर्ट ने पीएसीएल की संपत्तियों की बिक्री से अब तक प्राप्त धन, वितरित राशि और निवेशकों के बकाया का विवरण भी मांगा गया है। पीठ ने मामले की अगली सुनवाई 13 फरवरी तय की है।
गौरतलब है कि पीएसीएल और निर्मल सिंह भंगू सहित इसके प्रमोटर और निदेशक, निवेशकों से चिट फंड योजनाओं के माध्यम से एकत्र किए गए 49,100 करोड़ रुपये वापस करने में कथित रूप से फेल होने के बाद कानूनी लड़ाई लड़ रहे हैं।
निवेशकों का पैसा लौटाने के लिए 2016 में बनाई गई थी कमिटी
लोढ़ा कमिटी का गठन 2016 में सुप्रीम कोर्ट ने किया था। सीबीआई के अनुसार, अगस्त 2022 तक कमिटी ने पीएसीएल और उससे जुड़ी संस्थाओं की संपत्तियों को बेचकर 878.20 करोड़ रुपये रिकवर किए थे। कुल वसूली में PACL की 113 संपत्तियों की नीलामी से मिले 86.20 करोड़ रुपये भी शामिल हैं। कमिटी ने जिन संपत्तियों से रिकवरी की कार्रवाई की थी उनमें ऑस्ट्रेलिया स्थित पर्ल्स इन्फ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स की कंपनियां भी शामिल हैं। उससे कंपनी ने 369.20 करोड़ रुपये की रिकवरी की थी। ऑस्ट्रेलिया में कार्रवाई के लिए सेबी की ओर से वहां के फेडरल कोर्ट में क्लेम दाखिल किया गया था। वहां से मंजूरी मिलने के बाद रिकवरी की कार्रवाई को अंजाम दिया गया।
इसके अलावा 308.04 करोड़ रुपये सरकार ने PACL और उसकी सहयोगी कंपनियों के खातों को फ्रीज कर जुटाए थे। सरकार ने कंपनी के फिक्स्ड डिपोजिट से भी 98.45 करोड़ रुपये हासिल किए थे। कंपनी के 75 लग्जरी वहनों को बेचकर 15.62 करोड़ रुपये हासिल किए गए। वहीं, कंपनी के संपत्ति से जुड़े छह दस्तावेजों से 69 लाख रुपये हासिल हुए थे।
क्या है PACL स्कैम?
पीएसीएल को पर्ल ग्रुप के नाम से भी जाना जाता था। कंपनी ने आम लोगों से खेती और रियल एस्टेट जैसे कारोबार के आधार पर लगभग 60,000 करोड़ रुपये जुटाए थे। कंपनी ने यह निवेश 18 वर्षों के दौरान गैरकानूनी तरीके से हासिल किया था। जब लौटाने की बारी आई तो कंपनी पीछे हटने लगी। तब इस मामले में सेबी ने दखल दिया था और मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा था। इस कंपनी के निवेशक लंबे समय से अपना पैसा वापस पाने का इंतजार कर रहे हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने विदेशी मेडिकल स्नातकों की याचिका पर नेशनल मेडिकल कमीशन और एमपी स्थित एक सरकारी कॉलेज से जवाब मांगा है। जस्टिस बीआर गवई की अध्यक्षता वाली पीठ ने मामले में सुनवाई की। याचिकाकर्ता ने अपनी याचिका में दलील दी थी कि उन्हें इंटर्नशिप के दौरान वजीफा नहीं दिया जाता है। इस याचिका में नेशनल मेडिकल काउंसिल द्वारा जारी 4 मार्च 2022 और 19 मई 2022 के सर्कुलर का हवाला दिया गया है। याचिकाकर्ता का कहना है कि इस सर्कुलर के अनुसार, विदेशी मेडिकल स्नातकों को वजीफा भारतीय मेडिकल स्नातकों के बराबर बढ़ाया जाना चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट ने याचिकाकर्ता के उपस्थित न होने पर उसके खिलाफ गैर-जमानती वारंट जारी किया
वहीं, एक अन्य मामले में सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को एक व्यक्ति के खिलाफ गैर-जमानती वारंट (एनबीडब्ल्यू) जारी किया। शीर्ष अदालत स्वत: संज्ञान लेकर उपेंद्र नाथ दलाई के खिलाफ अवमानना कार्यवाही शुरू की थी। साथ ही उसे तलब किया था। लेकिन जब दलाई कार्यवाही के दौरान उपस्थित नहीं हुआ तो अदालत ने उसके खिलाफ एनबीडब्ल्यू जारी किया। मंगलवार की कार्यवाही के दौरान, न्यायमूर्ति सी टी रविकुमार और न्यायमूर्ति राजेश बिंदल की पीठ ने कहा कि सुनवाई की आखिरी तारीख पर जमानती वारंट जारी होने के बावजूद दलाई उपस्थित नहीं हुए।मंगलवार को मामले में शीर्ष अदालत ने सुनवाई की अगली तारीख 13 फरवरी तय की है।
शीर्ष अदालत ने एक प्रचार हित याचिका दायर करने के लिए एक लाख रुपये की लागत जमा करने में विफल रहने पर पिछले साल अगस्त में उपेंद्र नाथ दलाई के खिलाफ कार्यवाही शुरू की थी। शीर्ष अदालत ने 5 दिसंबर, 2022 को दिवंगत धार्मिक व्यक्ति श्री श्री ठाकुर अनुकूल चंद्र को 'परमात्मा' घोषित करने की मांग करने वाली एक जनहित याचिका को खारिज कर दिया था। साथ ही याचिकाकर्ता पर एक लाख रुपये का जुर्माना लगाया था।
सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को एक याचिकाकर्ता के अदालत में गैरहाजिर रहने पर उसके खिलाफ गैर-जमानती वारंट जारी कर दिया। दरअसल, शीर्ष कोर्ट ने उसके खिलाफ स्वत: संज्ञान लेते हुए अवमानना कार्यवाही शुरू की थी और इस पर सुनवाई के दौरान मौजूद न रहने पर यह कदम उठाया। शीर्ष कोर्ट ने उक्त याचिककर्ता उपेंद्र नाथ दलाई के खिलाफ यह कार्यवाही पिछले साल एक प्रचार हित याचिका दायर करने को लेकर शुरू की थी।
सुप्रीम कोर्ट ने पांच लोगों को खंभे से बांधकर सार्वजनिक रूप से पीटने और उसका वीडियो बनाने के मामले में गुजरात के चार पुलिसकर्मियों को फटकार लगाई, लेकिन गुजरात हाईकोर्ट की ओर से अदालत की अवमानना के मामले में इन पुलिसकर्मियों को दी गई 14 दिन की कैद की सजा पर रोक बढ़ा दी। पीठ ने सुनवाई शुरू होते ही कहा, लोगों को खंभे से बांधना, सार्वजनिक रूप में उनकी पिटाई करना और वीडियो बनाना, ये किस तरह के अत्याचार हैं।
पीठ ने पुलिस अधिकारियों से कहा, क्या आपके पास कानून के तहत लोगों को खंभे से बांधने और उन्हें पीटने का अधिकार है? जाइए और हिरासत का आनंद लीजिए। आप अपने ही अधिकारियों के मेहमान होंगे। वे आपके साथ विशेष व्यवहार करेंगे। पुलिसकर्मियों की ओर से पेश वरिष्ठ वकील सिद्धार्थ दवे ने बताया कि उनके खिलाफ आपराधिक मुकदमा व विभागीय कार्यवाही पहले से ही चल रही है। दवे ने हाईकोर्ट की सजा पर रोक लगाने का अनुरोध किया। इस पर पीठ ने अगले आदेश तक अवमानना के आदेश पर रोक लगा दी।
सुप्रीम कोर्ट ने दिव्यांग व्यक्ति अधिकार अधिनियम, 2016 के कार्यान्वयन से जुड़ी एक रिट याचिका में उन राज्यों एवं केंद्रशासित प्रदेशों को आठ सप्ताह के भीतर हलफनामा देने को कहा है, जिन्होंने अब तक नहीं दिया है। पीठ को बताया गया कि अंडमान और निकोबार द्वीप समूह, आंध्र, अरुणाचल, असम, बिहार, चंडीगढ़, छत्तीसगढ़, दादरा और नगर हवेली, दमन और दीव, गोवा, गुजरात, हरियाणा, हिमाचल, झारखंड, कर्नाटक, लक्षद्वीप, लद्दाख, मध्य प्रदेश व अन्य ने अब तक अनुपालन हलफनामा दाखिल नहीं किया है।