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Supreme Court: 'करोड़ों लोगों की आस्था को गलत ठहराना कठिन काम'; सबरीमाला समीक्षा पर सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी
Wed, 15 Apr 2026 10:43 PM IST
Shivam Garg
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
Published by: Shivam Garg
Updated Wed, 15 Apr 2026 10:43 PM IST
सार
Supreme Court Sabarimala Review Hearing: सुप्रीम कोर्ट ने सबरीमाला समीक्षा मामले में कहा कि करोड़ों लोगों की आस्था को गलत ठहराना अदालत के लिए सबसे कठिन कार्यों में से एक है। धार्मिक स्वतंत्रता पर अहम सुनवाई 22 अप्रैल तक जारी रहने की उम्मीद है।
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सबरीमाला मामले में सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई
- फोटो : Amar Ujala Graphics
विस्तार
सबरीमाला मामले की समीक्षा सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने एक बेहद अहम टिप्पणी की है। अदालत ने कहा कि किसी भी संवैधानिक न्यायालय के लिए करोड़ों लोगों की धार्मिक आस्थाओं को गलत या त्रुटिपूर्ण घोषित करना सबसे कठिन कार्यों में से एक होता है।
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यह टिप्पणी नौ न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने की, जिसकी अध्यक्षता न्यायमूर्ति सूर्य कांत कर रहे हैं। यह मामला धार्मिक स्वतंत्रता और मौलिक अधिकारों के बीच संतुलन से जुड़ा हुआ है। न्यायमूर्ति बी. वी. नागरत्ना ने सुनवाई के दौरान कहा कि सामाजिक सुधार के नाम पर धर्म की मूल भावना को कमजोर नहीं किया जा सकता। उन्होंने धार्मिक मामलों में अत्यधिक न्यायिक हस्तक्षेप को लेकर सावधानी बरतने की बात कही।
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धार्मिक आस्था बनाम संवैधानिक अधिकार
सुनवाई के दौरान अदालत ने इस बात पर भी विचार किया कि क्या धार्मिक मामलों में गैर-आस्थावान व्यक्तियों द्वारा दायर जनहित याचिकाओं (PIL) पर सुनवाई होनी चाहिए। पीठ ने वरिष्ठ अधिवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी की दलीलों को सुना, जिन्होंने 'आवश्यक धार्मिक प्रथाओं' के सिद्धांत पर सवाल उठाए। उनका कहना था कि यह सिद्धांत न्यायाधीशों को यह तय करने की शक्ति देता है कि किसी धर्म में क्या आवश्यक है और क्या नहीं, जो न्यायिक सीमा से बाहर जा सकता है।
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अनुच्छेद 25 पर बहस
सिंघवी ने कहा कि यदि कोई प्रथा सच्चे विश्वास और आस्था के साथ धर्म का हिस्सा मानी जाती है, तो उसे संविधान के अनुच्छेद 25 के तहत संरक्षण मिलना चाहिए, बशर्ते वह सार्वजनिक व्यवस्था, नैतिकता और स्वास्थ्य के खिलाफ न हो।
सुप्रीम कोर्ट इस समय यह तय कर रहा है कि धार्मिक स्वतंत्रता और अन्य मौलिक अधिकारों के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए और धार्मिक प्रथाओं में न्यायिक हस्तक्षेप की सीमा क्या होनी चाहिए। इसके अलावा, अदालत कई अन्य संवेदनशील मामलों पर भी विचार कर रही है, जिनमें धार्मिक स्थलों में प्रवेश, समुदायगत प्रथाएं और महिला अधिकारों से जुड़े मुद्दे शामिल हैं। यह मामला केवल सबरीमाला तक सीमित नहीं है, बल्कि यह भारत में धर्म, आस्था और संविधान के बीच संतुलन तय करने वाला एक महत्वपूर्ण कानूनी सवाल बन गया है, जिस पर पूरे देश की नजरें टिकी हुई हैं।
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