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SC: उपभोक्ताओं के खिलाफ प्रावधानों से कानून बनाने का मकसद विफल, याचिका रद्द करते हुए पीठ ने कही यह बात

Tue, 16 May 2023 06:15 AM IST
देव कश्यप एजेंसी, नई दिल्ली।
एजेंसी, नई दिल्ली। Published by: देव कश्यप Updated Tue, 16 May 2023 06:15 AM IST
सार

शीर्ष अदालत ने आवासीय परियोजना के पूरा होने से संबंधित मामले में राष्ट्रीय उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग के आदेश के खिलाफ दायर याचिकाओं को निपटाते हुए यह टिप्पणी की। शीर्ष अदालत ने हरियाणा के फ्लैट आवंटी संगठन की याचिका स्वीकार ली और कहा कि अगर कोई याचिका लंबित है तो उसे भी रद्द किया जाता है।

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Supreme Court says Anti-consumer provisions defeat the purpose of making laws
सुप्रीम कोर्ट। - फोटो : सोशल मीडिया

विस्तार

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 2019 का उद्देश्य देश में उपभोक्तावाद का बढ़ावा देना है। उपभोक्ताओं के खिलाफ इसके प्रावधानों के निर्माण में कोई भी तकनीकी दृष्टिकोण इस कानून को बनाने के मकसद को विफल कर देगा।

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जस्टिस जेके माहेश्वरी और जस्टिस एमएम सुंदरेश की पीठ ने कहा, पांडित्यपूर्ण और अत्यधिक तकनीकी दृष्टिकोण उपभोक्तावाद की अवधारणा को नुकसान पहुंचाएगा। शीर्ष अदालत ने आवासीय परियोजना के पूरा होने से संबंधित मामले में राष्ट्रीय उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग के आदेश के खिलाफ दायर याचिकाओं को निपटाते हुए यह टिप्पणी की। शीर्ष अदालत ने हरियाणा के फ्लैट आवंटी संगठन की याचिका स्वीकार ली और कहा कि अगर कोई याचिका लंबित है तो उसे भी रद्द किया जाता है। अदालत ने राष्ट्रीय आयोग को मामले पर जल्द सुनवाई करने का निर्देश दिया। संगठन ने बिल्डर की ओर से समय पर फ्लैट नहीं देने और अतिरिक्त धनराशि मांगने पर अदालत का दरवाजा खटखटाया था।
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गंगा-यमुना की सफाई लिए आई याचिका पर सुनवाई से इन्कार
गंगा-यमुना नदियों की सफाई के लिए दायर याचिका पर सोमवार को सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई से इन्कार कर दिया। साथ ही याची से कहा कि अपनी याचिका वह राष्ट्रीय हरित अधिकरण में रखे। याची स्वामी गुरचरण मिश्रा ने दोनों नदियों की सफाई के लिए जरूरी निर्देश देने और सुधार के लिए बने एक्शन प्लान की निगरानी की मांग की थी। चीफ जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़, जस्टिस पीएस नरसिम्हा और जस्टिस जेबी पारदीवाला ने अपने समक्ष आई याचिका पर सुनवाई के बाद कहा, क्यों नहीं याची एनजीटी चला जाता? वही इसके लिए विशेषज्ञ अधिकरण है। हम इसे सुनने नहीं में इच्छुक नहीं हैं।
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वीडियो या ऑडियो संदेश को मृत्युपूर्व आखिरी बयान माना जाए या नहीं...पर राजस्थान सरकार को नोटिस
किसी मर रहे व्यक्ति के वीडियो या ऑडियो संदेश को उसका मृत्युपूर्व आखिरी बयान माना जाए या नहीं, इस सवाल को उठाने वाली एक याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने राजस्थान सरकार को नोटिस जारी किया है। याचिका में राजस्थान हाईकोर्ट के उस आदेश को भी चुनौती दी गई, जिसमें ऑनर किलिंग के एक मामले की कोर्ट की निगरानी में अथवा सीबीआई जांच के निर्देश देने से इन्कार किया गया था।


जस्टिस अनिरुद्ध बोस और जस्टिस सुधांशु धुलिया की पीठ ने याचिकाकर्ता उमा पालीवाल की अपील पर राज्य सरकार को नोटिस भेजा। इस मामले में पीड़िता ने अपनी मौत से पहले वीडियो और ऑडियो संदेश दर्ज किया था कि अपनी मर्जी से शादी करने के कारण घर वाले उसकी हत्या कर देंगे। अगले दिन 11 मई को वह मृत पाई गई। इसके दो घंटे के अंदर पुलिस को सूचना दिए बिना या पोस्टमार्टम कराए बिना उसके शव का दाह-संस्कार कर दिया गया। 27 मई को उदयपुर के झालरा में हत्या, सबूत मिटाने और आपराधिक साजिश रचने का मामला दर्ज किया गया। याचिकाकर्ता का आरोप है कि पुलिस ने विश्वसनीय जांच नहीं की। हाईकोर्ट ने इसी 19 अप्रैल को दिए फैसले में घटना की सीबीआई या कोर्ट की निगरानी में जांच से इन्कार कर दिया था।

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