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सुप्रीम कोर्ट: अनुकंपा के आधार पर विवाहित बेटी भी नौकरी की हकदार, सर्वाइवर की होनी चाहिए अनुमति

Tue, 05 Apr 2022 10:40 PM IST
शिव शरण शुक्ला न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: शिव शरण शुक्ला Updated Tue, 05 Apr 2022 10:40 PM IST
सार

जस्टिस अजय रस्तोगी और जस्टिस सीटी रविकुमार की पीठ ने एक विवाहित बेटी की उस याचिका खारिज कर दिया जिसमें उसने पिता की मौत के बाद अनुकंपा पर नौकरी की मांग की थी। 17 जुलाई 2013 में डीएसपी पद पर तैनात उसके पिता जितेंद्र सिंह भदौरिया की मौत हो गई थी।
 

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Supreme Court said that married daughter on basis of compassion is also entitled to job although permission of survivor should be given for this
सुप्रीम कोर्ट - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि अनुकंपा के आधार पर विवाहित बेटी को भी नौकरी दी जा सकती है बशर्ते सर्वाइवर(मां/पिता) ऐसा करने के इच्छुक हों। शीर्ष अदालत ने कहा है कि सिर्फ बेटी होना अनुकंपा के आधार पर नौकरी के लिए पर्याप्त नहीं है।

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जस्टिस अजय रस्तोगी और जस्टिस सीटी रविकुमार की पीठ ने एक विवाहित बेटी की उस याचिका खारिज कर दिया जिसमें उसने पिता की मौत के बाद अनुकंपा पर नौकरी की मांग की थी। 17 जुलाई 2013 में डीएसपी पद पर तैनात उसके पिता जितेंद्र सिंह भदौरिया की मौत हो गई थी।
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याचिकाकर्ता महिला सुरभि भदौरिया की ओर से पेश वकील दुष्यंत पराशर ने पीठ के समक्ष कर्नाटक राज्य बनाम सीएन अपूर्वा मामले में सुप्रीम कोर्ट द्वारा दी गई व्यवस्था का हवाला देते हुए कहा कि उस फैसले के आधार पर शादीशुदा बेटी भी अनुकंपा पर नौकरी पाने की हकदार है।
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इस पर जस्टिस रस्तोगी ने कहा है कि योजना के रूल-2.2 के अनुसार अनुकंपा पर नौकरी के लिए सर्वाइवर(मां/पिता) से नाम को हरी झंडी मिलनी चाहिए, लेकिन इस मामले में विवाहित बेटी को अनुकंपा पर नौकरी के लिए मां की ओर से मंजूरी नहीं मिली है।

इस पर वकील पराशर ने कहा कि विवाहित बेटी को अनुकंपा पर नौकरी के लिए उसकी मां की ओर से मंजूरी नहीं मिली है, लेकिन मौजूद प्रावधान के तहत वह व्यक्तिगत अधिकार के तौर पर अनुकंपा पर नौकरी की मांग कर सकती है। उन्होंने कहा कि मां ने उसके नाम को इसलिए मंजूरी नहीं दी क्योंकि याचिकाकर्ता विवाहित बेटी ने अचल संपत्ति के बंटवारे की मांग करते हुए एक मामला दायर कर रखा था।


पराशर ने कहा कि याचिकाकर्ता का भाई पेशे से वकील है और वह सुप्रीम कोर्ट में वकालत करता है। याचिकाकर्ता परिवार में सबसे बड़ी है, इसलिए उसकी मां को उसके दावे पर आपत्ति नहीं हो सकती है। हालांकि पीठ पराशर की दलीलों से संतुष्ट नहीं हई और याचिका को खारिज कर दिया।

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