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सुप्रीम कोर्ट: दुष्कर्म मामले में डीएनए प्रोफाइलिंग न होने या जांच में खामी की वजह से नहीं दी जा सकती राहत
Fri, 13 May 2022 11:21 PM IST
सुभाष कुमार
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
Published by: सुभाष कुमार
Updated Fri, 13 May 2022 11:21 PM IST
सार
पीठ में शामिल जस्टिस दिनेश माहेश्वरी और जस्टिस सीटी रविकुमार ने अभियुक्त की ओर से पेश वकील की प्रक्रिया गत खामी के दावों पर गौर किया मगर उसकी दलील को खारिज कर दिया।
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सुप्रीम कोर्ट
- फोटो : amar ujala
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विस्तार
सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को आठ साल की एक मासूम के साथ दुष्कर्म और उसकी हत्या के आरोपी की उम्रकैद की सजा को कम करने से इनकार दिया। शीर्ष अदालत ने कहा कि डीएनए प्रोफाइलिंग में चूक या प्रक्रिया की खामी की वजह से दुष्कर्म और उसके साथ ही हत्या जैसे गंभीर अपराध के आरोपी को नहीं छोड़ा जा सकता।
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शीर्ष अदालत ने इस मामले में दी गई निचली अदालत की मौत की सजा को इस शर्त के साथ आजीवन कारावास में बदला कि इस दौरान वास्तविक सजा (30 साल कैद) भुगतने से पहले वह समय पूर्व रिहाई या छूट का हकदार नहीं होगा। उसे अपनी आजीवन उम्रकैद की सजा काटनी होगी। जस्टिस एएम खानविलकर की अगुवाई वाली तीन सदस्यीय पीठ ने दोषी की ओर से मध्यप्रदेश हाईकोर्ट के मृत्युदंड के आदेश को चुनौती देते हुए याचिका पर ये टिप्पणी की।
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पीठ में शामिल जस्टिस दिनेश माहेश्वरी और जस्टिस सीटी रविकुमार ने अभियुक्त की ओर से पेश वकील की प्रक्रिया गत खामी के दावों पर गौर किया मगर उसकी दलील को खारिज कर दिया। पीठ ने कहा कि प्रक्रिया गत खामी के बावजूद अदालत घटना स्थल से बरामद साक्ष्यों के रिकॉर्ड के आधार पर विचार कर सकती है। पीठ ने कहा कि जांच निष्पक्ष होनी चाहिए इसमें कोई संदेह नहीं हैं। इसके साथ ही जांच एजेंसियों को पीड़ित और आरोपी दोनों के अधिकारों की रक्षा भी करनी चाहिए। दरअसल, याचिकाकर्ता पीड़िता का रिश्ते में मामा है। दुष्कर्म और हत्या का यह मामला सितंबर 2005 को ग्वालियर में सामने आया था।
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