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Supreme Court : सुप्रीम कोर्ट ने कहा- हिरासत में पूछताछ की जरूरत न होना  जमानत का आधार नहीं

Fri, 28 Oct 2022 06:12 AM IST
योगेश साहू अमर उजाला ब्यूरो/एजेंसी, नई दिल्ली।
अमर उजाला ब्यूरो/एजेंसी, नई दिल्ली। Published by: योगेश साहू Updated Fri, 28 Oct 2022 06:12 AM IST
सार

सुप्रीम कोर्ट ने एक मामले में यह भी कहा है किसी व्यक्ति को हिरासत में रखे जाने के आधार को स्पष्ट तौर पर बताया जाना जरूरी है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि हिरासत में बंदी अथॉरिटी के भरोसेमंद दस्तावेज की सुपाठ्य प्रतियों को प्राप्त करने का हमेशा हकदार होता है।

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Supreme Court: said no need for custodial interrogation is not a basis for bail
सुप्रीम कोर्ट - फोटो : ANI

विस्तार

सुप्रीम कोर्ट ने हिरासत में पूछताछ की जरूरत नहीं होने के आधार पर आपराधिक मामलों में आरोपियों को अग्रिम जमानत देने के लिए हाईकोर्टों की आलोचना की। जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जेबी परदीवाला की पीठ ने कहा कि यह गंभीर गलत अवधारणा है कि यदि अभियोजन की ओर से हिरासत में पूछताछ का कोई मामला नहीं मिलता है तो केवल इस आधार पर अग्रिम जमानत प्रदान कर दी जाए। 

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पीठ ने कहा कि अग्रिम जमानत के कई मामलों में हमने एक समान दलील देखी है कि अगर हिरासत में पूछताछ की कोई आवश्यकता नहीं है तो अग्रिम जमानत दी जा सकती है। पीठ ने कहा कि अग्रिम जमानत याचिका पर फैसला करते समय हिरासत में पूछताछ अन्य आधारों के साथ ही संबंधित पहलुओं में से एक हो सकती है। 
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ऐसे कई मामले हो सकते हैं, जिनमें आरोपी से हिरासत में पूछताछ की आवश्यकता नहीं होती, लेकिन इसका यह मतलब नहीं है कि आरोपी के खिलाफ प्रथमदृष्टया मामले को नजरअंदाज किया जाए या उस पर ध्यान न दिया जाए और उसे अग्रिम जमानत दे दी जाए। पीठ ने कहा कि अग्रिम जमानत याचिका पर सुनवाई कर रही अदालत को सबसे पहले इस बात पर गौर करना चाहिए कि क्या आरोपी के खिलाफ प्रथमदृष्टया मामला बनता है।
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मामला 1 : सजा की गंभीरता के साथ ही अपराध की प्रकृति पर विचार जरूरी
पीठ ने कहा, सजा की गंभीरता के साथ ही अपराध की प्रकृति पर विचार किया जाना चाहिए। अग्रिम जमानत देने से इन्कार करने का एक आधार हिरासत में पूछताछ हो सकता है। हालांकि, अगर हिरासत में पूछताछ की आवश्यकता नहीं है तो यह अग्रिम जमानत देने का इकलौता आधार नहीं हो सकता। पीठ ने केरल के वायनाड जिले में बाल यौन अपराध संरक्षण कानून, 2012 के विभिन्न प्रावधानों के तहत एक आरोपी को दी गई अग्रिम जमानत रद्द करते हुए यह टिप्पणी की। अपने न्यायाधिकार का इस्तेमाल नहीं करना चाहिए।

पीठ ने कहा-टिप्पणियां पूरी तरह अवांछित जांच के लिए पूरी छूट मिलनी चाहिए

  • पीठ ने कहा कि हाईकोर्ट की टिप्पणियां पूरी तरह अवांछित हैं और यह प्राथमिकी में कुछ आरोपों पर गौर न करते हुए की गईं हैं। ऐसे गंभीर मामले में हाईकोर्ट को गिरफ्तारी के खिलाफ सुरक्षा देने में अपने न्यायाधिकार का इस्तेमाल नहीं करना चाहिए। साथ ही जांच अधिकारी को जांच को तार्किक निष्कर्ष तक पहुंचाने की पूरी छूट मिलनी चाहिए।

मामला 2 : हिरासत में रखने के आधार की पढ़ने लायक प्रति पाने का बंदी हकदार 
सुप्रीम कोर्ट ने कहा है किसी व्यक्ति को हिरासत में रखे जाने के आधार को स्पष्ट तौर पर बताया जाना जरूरी है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि हिरासत में बंदी अथॉरिटी के भरोसेमंद दस्तावेज की सुपाठ्य प्रतियों को प्राप्त करने का हमेशा हकदार होता है। प्रतियां मुहैया नहीं कराना उसके मौलिक अधिकार का हनन है। जस्टिस अजय रस्तोगी और जस्टिस सीटी रविकुमार की पीठ ने यह कहते हुए नारकोटिक ड्रग्स एंड साइकोट्रॉपिक सब्सटांस (एनडीपीएस) अधिनियम के तहत आरोपी अब्दुल हनान के खिलाफ पारित डिटेंशन (हिरासत) आदेश को रद्द करने के हाईकोर्ट के आदेश के खिलाफ मणिपुर सरकार की ओर से दायर अपील को खारिज कर दिया।

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