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सुप्रीम कोर्ट बोला: उचित संदेह से परे सिद्धांत का गलत इस्तेमाल, बच निकल रहे दोषी; ये न्याय प्रणाली पर एक कलंक

Tue, 02 Sep 2025 05:44 AM IST
शुभम कुमार न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: शुभम कुमार Updated Tue, 02 Sep 2025 05:44 AM IST
सार

सुप्रीम कोर्ट ने ‘उचित संदेह से परे’ सिद्धांत के दुरुपयोग को लेकर चिंता जताई है। कोर्ट ने कहा कि इससे असली अपराधी बच निकलते हैं, जो समाज की सुरक्षा के खिलाफ है। नाबालिग से दुष्कर्म के आरोपियों को उम्रकैद की सजा वाली ट्रायल कोर्ट की सजा बरकरार रखी गई। कोर्ट ने न्याय व्यवस्था में संवेदनशीलता और कठोर कार्रवाई जरूरी बताई।

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Supreme Court said Misuse of principle beyond reasonable doubt culprits are escaping News In Hindi
सुप्रीम कोर्ट। - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि उचित संदेह से परे (बियॉन्ड रिजनेबल डाउट) सिद्धांत का गलत इस्तेमाल हो रहा है, जिसके कारण असली अपराधी कानून के शिकंजे से बच निकलने में कामयाब हो जाते हैं। कोर्ट ने जोर देकर कहा कि अपराधियों के बरी होने का ऐसा हर मामला समाज की सुरक्षा की भावना के खिलाफ विद्रोह और आपराधिक न्याय प्रणाली पर एक कलंक है। इसके साथ ही शीर्ष कोर्ट ने एक नाबालिग लड़की से दुष्कर्म के दो आरोपियों को दोषी ठहराने और उम्रकैद की सजा सुनाने वाले ट्रायल कोर्ट के फैसले को बहाल कर दिया।
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कोर्ट ने पटना हाईकोर्ट के सितंबर, 2024 के फैसले को खारिज कर दिया, जिसमें दोनों आरोपियों को बरी कर दिया गया था। पीठ ने कहा अक्सर ऐसे मामले देखने को मिलते हैं, जहां मामूली विसंगतियों, विरोधाभासों के आधार पर, उचित संदेह का मानक लागू कर अपराधी को बरी कर दिया जाता है।
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जस्टिस संजय कुमार और जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा की पीठ ने कहा, अदालतों को समाज की जमीनी हकीकतों के प्रति संवेदनशील होना चाहिए ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि कानून की मंशा को दबाया न जाए। पीठ ने कहा, न केवल किसी निर्दोष को उस अपराध के लिए सज़ा नहीं मिलनी चाहिए जो उसने किया ही नहीं, बल्कि किसी भी अपराधी को अनुचित संदेह और प्रक्रिया के दुरुपयोग के आधार पर बरी भी नहीं किया जाना चाहिए।  पीठ ने कहा, कभी-कभी पीड़ित खुद को असंवेदनशील हितधारकों से भरी व्यवस्था के खिलाफ खड़ा पाते हैं और कभी-कभी, पीड़ित खुद को मौजूदा कानूनों की प्रक्रियात्मक पेचीदगियों के साथ संघर्ष में पाते हैं।

मौजूदा मामले में पीठ ने पाया कि 2016 में होली के कुछ महीने बाद, पीड़िता को अस्वस्थता महसूस होने लगी और 1 जुलाई, 2016 को जांच करने पर पता चला कि वह तीन महीने की गर्भवती है। तब उसने खुलासा किया कि लगभग तीन-चार महीने पहले दोनों आरोपियों ने उसके साथ दुष्कर्म किया था। इसके बाद भोजपुर जिले में एक प्राथमिकी दर्ज की गई और अदालत में आरोप पत्र दायर किया गया।


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निर्दोष को सजा न हो इस लिए लागू किया जाता है उचित संदेह से परे का सिद्धांत पीठ ने कहा, उचित संदेह से परे के सिद्धांत का मूल आधार यह है कि किसी भी निर्दोष को ऐसे अपराध के लिए सजा नहीं मिलनी चाहिए जो उसने किया ही न हो। लेकिन इसका एक दूसरा पहलू, जिसके बारे में हम जानते हैं, यह है कि कई बार इस सिद्धांत के गलत इस्तेमाल के कारण, वास्तविक अपराधी कानून के शिकंजे से बच निकलने में कामयाब हो जाते हैं।

ट्रायल कोर्ट ने  ठहराया था दोषी
ट्रायल कोर्ट ने दोनों आरोपियों को दुष्कर्म के अपराध और यौन अपराधों से बच्चों का संरक्षण अधिनियम (पॉक्सो) के प्रावधानों के तहत दोषी ठहराया और उन्हें आजीवन कारावास की सजा सुनाई। बाद में, हाईकोर्ट ने अभियोजन के मामले में कमियां पाते हुए कहा कि अभियोजन उनके खिलाफ मामला साबित करने में असमर्थ रहा। पीड़िता की उम्र से संबंधित मुद्दे पर विचार करते हुए, शीर्ष अदालत ने कहा, अदालतों को पीड़ितों, खासकर देश के दूरदराज के इलाकों में रहने  वाली पीड़ितों की सामाजिक-आर्थिक परिस्थितियों के प्रति सजग रहना चाहिए।
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