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सुप्रीम कोर्ट: अगर बिल्डर ओसी प्राप्त करने में विफल रहे तो यह  सेवा में कोताही का मामला

Tue, 11 Jan 2022 11:19 PM IST
सुभाष कुमार न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: सुभाष कुमार Updated Tue, 11 Jan 2022 11:19 PM IST
सार

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अगर बिल्डर के पास ओसी नहीं है या नहीं मिला है तो यह सेवा में कोताही है और ऐसे में सोसायटी के सदस्य बतौर उपभोक्ता मुआवजे के लिए गुहार लगा सकते हैं।

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supreme court said if builder is unable to get occupation certificate then it is lapse of service
सुप्रीम कोर्ट - फोटो : Social Media

विस्तार

सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि अगर बिल्डर औक्यूपेसन सर्टिफिकेट (ओसी) प्राप्त करने में विफल होता है तो यह उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम,1986 के तहत इसे सेवा में कोताही का मामला माना जाएगा। जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ और जस्टिस एएस बोपन्ना की पीठ ने कहा है कि फ्लैट खरीददार बतौर उपभोक्ता यह अधिकार रखता है कि वह इस स्थिति में मुआवजा के लिए गुहार लगा सके क्योंकि ओसी न रहने के कारण उसे टैक्स, पानी का शुल्क या अन्य शुल्क ज्यादा देना पड़ता है। बिल्डर की कमी का खामियाजा फ्लैट खरीदार को भुगतना पड़ता है।

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सुप्रीम कोर्ट ने ये बातें महाराष्ट्र के एक हाउसिंग सोसायटी से जुड़े मामले की सुनवाई करते हुए कही। इस मामले में समृद्धि हाउसिंग कोऑपरेटिव सोसायटी के लोगों ने बिल्डर मुंबई महालक्ष्मी कंस्ट्रक्शन प्राइवेट लिमिटेड के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। सोसायटी का कहना था कि बिल्डर ने सेवा में कोताही की है क्योंकि वह ओसी पाने में विफल रहा है। इस कारण सोसायटी के फ्लैट खरीददारों को 25 फीसदी ज्यादा प्रॉपर्टी चार्ज और 50 फीसदी ज्यादा पानी का शुल्क देना पड़ रहा है। 
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सोसायटी ने राष्ट्रीय उपभोक्ता आयोग के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी। आयोग से सोसायटी को राहत नहीं मिल पाई थी। आयोग ने यह भी कहा था कि सोसायटी को 'उपभोक्ता' नहीं माना जाएगा। सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि इस मामले में बिल्डर कंपनी का दायित्व है कि वह सारे मालिकाना हक और ओसी ट्रांसफर करे। अगर बिल्डर के पास ओसी नहीं है या नहीं मिला है तो यह सेवा में कोताही है और ऐसे में सोसायटी के सदस्य बतौर उपभोक्ता मुआवजे के लिए गुहार लगा सकते हैं। सुप्रीम कोर्ट ने मामले को राष्ट्रीय उपभोक्ता आयोग को भेजते हुए कहा कि मामले को फिर से मेरिट के आधार पर विचार किया जाए। आयोग को मामले का निपटारा करने के लिए तीन महीने का समय दिया गया है।

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