Supreme Court: 'जमानत अर्जी में आपराधिक इतिहास छिपाना सरासर धोखा'; सुप्रीम कोर्ट ने जताई नाराजगी
आपराधिक मामलों में पारदर्शिता और जवाबदेही को मजबूत करने वाले अपने इस फैसले में शीर्ष कोर्ट ने कहा कि अब हर जमानत याचिकाकर्ता को एसएलपी की शुरुआत में अपने आपराधिक मामलों की पूरी जानकारी देनी होगी। शीर्ष कोर्ट ने कहा कि दाखिल किसी भी जमानत याचिका में यह स्पष्ट तौर पर लिखा जाए कि याचिकाकर्ता पर कोई आपराधिक मामला नहीं है। अगर कोई मामला है तो यह बताया जाए।
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
विस्तार
सुप्रीम कोर्ट ने जमानत याचिका या संभावित कार्रवाई से संरक्षण के लिए अर्जी दायर करने वालों की तरफ से अपने आपराधिक इतिहास के बारे में जानकारी न दिए जाने की बढ़ती प्रवृत्ति पर गहरी नाराजगी जताई है। शीर्ष कोर्ट ने कहा, यह तो अदालत के साथ सरासर धोखा है। कोर्ट ऐसे मामलों में अतीत में उदारता दिखाता रहा है लेकिन अब समय आ गया है कि इस स्थिति को आगे जारी न रहने दिया जाएगा।
जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस मनमोहन की पीठ ने इस टिप्पणी के साथ महत्वपूर्ण तथ्यों को छिपाने का दोषी मानते हुए हत्या के एक आरोपी की जमानत याचिका खारिज कर दी। कोर्ट ने कहा कि जमानत पाने या गिरफ्तारी से बचने के लिए विशेष अनुमति याचिकाओं में आपराधिक मामलों का खुलासा न करने की प्रवृत्ति बढ़ रही है। उनके आपराधिक इतिहास के बारे में कई बार पता तभी चलता है जब जमानत या अग्रिम जमानत याचिकाओं पर राज्य की तरफ से जवाबी हलफनामा दिया जाता है। उक्त मामले में याचिकाकर्ता मुन्नेश को 26 मई 2018 को भारतीय दंड संहिता की धारा 302 (हत्या) के तहत दर्ज एक मामले में गिरफ्तार किया गया था। उसके खिलाफ मुकदमे की कार्यवाही जारी है और अभियोजन पक्ष कुछ गवाहों के बयान भी दर्ज कर चुका है। मुन्नेश की जमानत याचिका को पूर्व में इलाहाबाद हाईकोर्ट की तरफ से जारी किया जा चुका था। इसके बाद उसने अनुच्छेद 136 के तहत सुप्रीम कोर्ट में विशेष अनुमति याचिका दाखिल की थी।
अब, याचिकाकर्ताओं को देनी होगी पूरी जानकारी.
आपराधिक मामलों में पारदर्शिता और जवाबदेही को मजबूत करने वाले अपने इस फैसले में शीर्ष कोर्ट ने कहा कि अब हर जमानत याचिकाकर्ता को एसएलपी की शुरुआत में अपने आपराधिक मामलों की पूरी जानकारी देनी होगी। शीर्ष कोर्ट ने कहा कि दाखिल किसी भी जमानत याचिका में यह स्पष्ट तौर पर लिखा जाए कि याचिकाकर्ता पर कोई आपराधिक मामला नहीं है। अगर कोई मामला है तो यह बताया जाए।
गलत ब्योरा देना बनेगा खारिज करने का आधार
कोर्ट ने कहा कि इस तरह के निर्देश का पालन करने से कुछ लोगों को असुविधा होगी लेकिन यह संस्थागत हित में जरूरी है। पीठ ने पूर्व में दो अलग-अलग मामलों में इस तरह के खुलासे की वकालत किए जाने का जिक्र भी किया। कोर्ट ने कहा कि अगर एसएलपी में दिया गया आपराधिक इतिहास का ब्योरा बाद में गलत पाया गया तो यह याचिका खारिज करने का आधार होगा।
रहें हर खबर से अपडेट, डाउनलोड करें Android Hindi News apps, iOS Hindi News apps और Amarujala Hindi News apps अपने मोबाइल पे|
Get all India News in Hindi related to live update of politics, sports, entertainment, technology and education etc. Stay updated with us for all breaking news from India News and more news in Hindi.