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सुप्रीम कोर्ट: आदेश की जानबूझकर अवहेलना पर ही अवमानना की कार्रवाई 

Fri, 04 Jun 2021 03:59 AM IST
देव कश्यप एजेंसी, नई दिल्ली
एजेंसी, नई दिल्ली Published by: देव कश्यप Updated Fri, 04 Jun 2021 03:59 AM IST
सार

  • यूपी जल निगम के कर्मचारियों की दायर याचिकाओं का निपटारा करते हुए शीर्ष अदालत ने की टिप्पणी

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Supreme Court said contempt action can be taken only for willful non-compliance of a court order
सर्वोच्च न्यायालय - फोटो : पीटीआई

विस्तार

सुप्रीम कोर्ट ने बृहस्पतिवार को कहा कि अदालती आदेश का जानबूझकर पालन न करने पर ही अवमानना की कार्रवाई की जा सकती है। शीर्ष अदालत ने यह टिप्पणी उत्तर प्रदेश जल निगम के कुछ कर्मचारियों की भर्ती प्रक्रिया रद्द करने से जुड़े मामले में अधिकारियों को जारी कारण बताओ नोटिसों का निपटारा करते हुए की।

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शीर्ष अदालत लखनऊ स्थित उत्तर प्रदेश जल निगम के चीफ इंजीनियर द्वारा जारी आदेश को चुनौती देने वाली कई याचिकाओं की सुनवाई कर रहा है। सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में उत्तर प्रदेश चीफ इंजीनियर को रिट याचिकाओं पर इलाहाबाद हाईकोर्ट के 28 नवंबर 2017 के फैसले का पालन करने के लिए कहा था। इसके बाद चीफ इंजीनियर ने 4 दिसंबर 2018 को याचिकाकर्ताओं और अन्य को पुराने स्थान पर ही तैनाती देने का आदेश दिया। लेकिन  साथ ही उन्होंने नियुक्ति को अदालत से मिली स्वतंत्रता के तहत बताते हुए किसी भी तरह के बकाये का भुगतान नहीं करने की बात कही थी। चीफ इंजीनियर के इस आदेश को अदालती आदेशों का उल्लंघन बताते हुए अवमानना याचिकाएं दायर की गई थीं।
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इन याचिकाओं पर सुनवाई के दौरान बृहस्पतिवार को जस्टिस एएम खानविलकर और जस्टिस बीआर गवई की पीठ ने कहा कि अवमानना क्षेत्राधिकार का प्रयोग करने में प्राथमिक चिंता यह होनी चाहिए कि न्यायालय के निर्णय में दिए निर्देशों का पालन नहीं करने के आरोप को क्या उस पक्ष का अपमानजनक आचरण कहा जा सकता है। पीठ ने कहा कि हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट द्वारा पारित आदेशों में याचिकाकर्ताओं को सेवा की निरंतरता और पिछले वेतन के साथ बहाल करने के लिए स्पष्ट निर्देश शामिल नहीं हैं।
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पीठ ने कहा कि निर्देश में इस्तेमाल की गई अभिव्यक्ति केवल याचिकाकर्ताओं को उन पदों पर काम करने की अनुमति देने के लिए है, जिन पर वे सेवा समाप्ति से पहले कार्य कर रहे थे। साथ ही ये निर्देश उन्हें महीने दर महीने नियमित वेतन का भुगतान करने के लिए थे। ऐसे में समझा जाता है कि यह अदालत के आदेशों की जानबूझकर अवज्ञा का मामला नहीं है।

पीठ ने आगे कहा कि यह तय है कि अवमानना कार्यवाही केवल न्यायालय के आदेश की जानबूझकर अवज्ञा पर ही आगे बढ़नी चाहिए। पीठ ने सुप्रीम कोर्ट के राम किशन मामले में दिए गए फैसले का हवाला दिया, जिसमें कहा गया था कि अवमानना के आरोपी को दंडित करने के लिए, यह स्थापित करना होगा कि आदेश की अवज्ञा जानबूझकर की गई है।

जानबूझकर का मतलब है परिणाम का पूर्ण ज्ञान
पीइ ने कहा, जानबूझकर का अर्थ जानते हुए, इरादतन, सचेत, पहले से हिसाब लगाया हुआ और परिणाम के पूर्ण ज्ञान के साथ सोचसमझकर किया गया है। इसमें आकस्मिक, दुर्घटनावश, बिना सोचे समझे या अनैच्छिक या लापरवाहीपूर्ण कार्य शामिल नहीं हैं। बुरे उद्देश्य के साथ या बिना उचित बहाने के या हठपूर्वक, जिद से या विकृत रूप से किए गए कार्य और लापरवाही से, बिना सोचे-समझे, बिना विचार किए या अनजाने में किए गए कार्य में अंतर है।

इसमें लापरवाही या अनैच्छिक रूप से किया गया कोई भी कार्य शामिल नहीं है। किसी व्यक्ति के जानबूझकर आचरण का अर्थ है कि वह जानता है कि वह क्या कर रहा है और वही करने का इरादा रखता है। इसलिए, उसकी ओर से बुरे मकसद के साथ की गई कार्रवाई होनी चाहिए। भले ही किसी आदेश की अवज्ञा हो, लेकिन ऐसी अवज्ञा अगर मजबूरी का परिणाम है, जिसके तहत अवमाननाकर्ता के लिए आदेश का पालन करना संभव नहीं था, तो अवमाननाकर्ता को दंडित नहीं किया जा सकता है।


अवमानना याचिकाएं खारिज कीं
पीठ ने यह भी कहा कि उसे मूल कार्यवाही को उस प्रकार तय करने की शक्ति नहीं लेनी चाहिए, जिस प्रकार न्यायालय द्वारा निर्णय और आदेश पारित नहीं किया गया है। पीठ ने कहा कि यह आदेश की शुद्धता या अन्यथा में जाने या अतिरिक्त निर्देश देने या किसी भी निर्देश को हटाने के लिए खुला नहीं है, जो केवल पुनर्विचार क्षेत्राधिकार में अपनाया जा सकता है और अवमानना कार्यवाही नहीं। इस प्रकार, पीठ ने अवमानना याचिकाओं को खारिज कर दिया।

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