सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए कहा कि अधीनस्थ न्यायिक सेवाओं के सदस्य सीधी भर्ती के माध्यम से जिला न्यायाधीशों के तौर पर नियुक्ति के लिए पात्र नहीं होंगे।
न्यायमूर्ति अरुण मिश्रा की अध्यक्षता वाली पीठ ने आदेश को निर्धारित करते हुए कहा कि संविधान के अनुच्छेद 233 (2) के तहत पात्रता के लिए सात साल लगातार अभ्यास की आवश्यकता होती है और केवल बार के अभ्यर्थी ही कोटा का लाभ उठा सकते हैं। जस्टिस अरुण मिश्रा, जस्टिस विनीत सरन और जस्टिस एस रवींद्र भट की तीन जजों वाली बेंच ने 16 जनवरी को मामले में आदेश सुरक्षित रख लिया था।
अनुच्छेद 233 के उपखंड 2 का दिया हवाला
पीठ ने संविधान के अनुच्छेद 233 के उपखंड 2 की विवेचना करते हुए कहा कि इस प्रावधान में न्यायिक सेवा में कार्यरत अभ्यर्थियों के जिला न्यायाधीशों के रूप में सीधी भर्ती के माध्यम से नियुक्ति पर प्रतिबंध लगाया गया है। अनुच्छेद 233 का उपखंड 2 कहता है कि कोई व्यक्ति जो पहले ही केंद्र या राज्य की सेवा में है, वह जिला जज के तौर पर नियुक्ति के लिए पात्र नहीं होगा।
प्रावधान यह भी कहता है कि जिला न्यायाधीश के पद के लिए पात्र व्यक्ति के पास वकील के तौर पर प्रैक्टिस का अनुभव सात साल से कम नहीं होना चाहिए और नियुक्ति के लिए हाईकोर्ट द्वारा उसके नाम की सिफारिश की जानी चाहिए।
शीर्ष अदालत ने कहा कि हालांकि अधीनस्थ न्यायपालिका के सदस्यों के नाम पर पदोन्नति के माध्यम से जिला न्यायाधीश के पद के लिए विचार किया जा सकता है।
क्या है मामला
इस मामले में धीरज मोर बनाम दिल्ली हाईकोर्ट के मामले को इस सुप्रीम कोर्ट की पीठ को भेजा गया था। इस मामले में संविधान के अनुच्छेद 233 की व्याख्या के संबंध में कानून का एक बड़ा सवाल था, जस्टिस कुरियन जोसेफ और जस्टिस मोहन एम शांतनगौदर की पीठ ने 23 जनवरी 2018 को संदर्भ भेजा था। पीठ ने कहा कि विचार के लिए एक बड़ा मुद्दा यह है कि क्या जिला न्यायाधीश के रूप में नियुक्ति के लिए पात्रता केवल नियुक्ति के समय या आवेदन के समय या दोनों में देखी जानी है।
याचिकाकर्ता ने दो बिंदुओं का किया था जिक्र
याचिकाकर्ताओं ने मुख्य रूप से दो बातों का जिक्र किया था- पहला यदि किसी उम्मीदवार ने अधिवक्ता के रूप में सात साल का अभ्यास पूरा कर लिया है, तो वह इस तथ्य के बावजूद पात्र होगा कि आवेदन / नियुक्ति की तिथि पर, वह संघ या राज्य की सेवा में है। दूसरा वे सदस्य जो सिविल जज, जूनियर डिवीजन या सीनियर डिवीजन के रूप में न्यायिक सेवा में हैं, अगर उन्होंने न्यायिक अधिकारी के रूप में सात साल या न्यायिक अधिकारी-सह-अधिवक्ता के रूप में सात साल पूरे किए हैं, तो उन्हें योग्य उम्मीदवारों के रूप में माना जाना चाहिए।
17 मई, 2019 को न्यायमूर्ति अरूण कुमार मिश्रा और न्यायमूर्ति नवीन सिन्हा की पीठ ने कहा था कि यह जरूर है कि अंतरिम आदेश के जरिए कुछ मामलों में बार कोटे से सिविल जजों को जिला जज नियुक्त किया गया है, लेकिन अब हम भविष्य में और इस तरह की नियुक्ति की इजाजत नहीं दे सकते। पीठ ने कहा कि अब इस संदर्भ में और अंतरिम आदेश पारित नहीं किया जा सकता।
पीठ ने इस मामले को महत्वपूर्ण बताते हुए इस लंबित मसले को चीफ जस्टिस के पास भेजते हुए उचित पीठ केसमक्ष सुनवाई कराने का आग्रह किया था।
सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए कहा कि अधीनस्थ न्यायिक सेवाओं के सदस्य सीधी भर्ती के माध्यम से जिला न्यायाधीशों के तौर पर नियुक्ति के लिए पात्र नहीं होंगे।
न्यायमूर्ति अरुण मिश्रा की अध्यक्षता वाली पीठ ने आदेश को निर्धारित करते हुए कहा कि संविधान के अनुच्छेद 233 (2) के तहत पात्रता के लिए सात साल लगातार अभ्यास की आवश्यकता होती है और केवल बार के अभ्यर्थी ही कोटा का लाभ उठा सकते हैं। जस्टिस अरुण मिश्रा, जस्टिस विनीत सरन और जस्टिस एस रवींद्र भट की तीन जजों वाली बेंच ने 16 जनवरी को मामले में आदेश सुरक्षित रख लिया था।
अनुच्छेद 233 के उपखंड 2 का दिया हवाला
पीठ ने संविधान के अनुच्छेद 233 के उपखंड 2 की विवेचना करते हुए कहा कि इस प्रावधान में न्यायिक सेवा में कार्यरत अभ्यर्थियों के जिला न्यायाधीशों के रूप में सीधी भर्ती के माध्यम से नियुक्ति पर प्रतिबंध लगाया गया है। अनुच्छेद 233 का उपखंड 2 कहता है कि कोई व्यक्ति जो पहले ही केंद्र या राज्य की सेवा में है, वह जिला जज के तौर पर नियुक्ति के लिए पात्र नहीं होगा।
प्रावधान यह भी कहता है कि जिला न्यायाधीश के पद के लिए पात्र व्यक्ति के पास वकील के तौर पर प्रैक्टिस का अनुभव सात साल से कम नहीं होना चाहिए और नियुक्ति के लिए हाईकोर्ट द्वारा उसके नाम की सिफारिश की जानी चाहिए।
शीर्ष अदालत ने कहा कि हालांकि अधीनस्थ न्यायपालिका के सदस्यों के नाम पर पदोन्नति के माध्यम से जिला न्यायाधीश के पद के लिए विचार किया जा सकता है।
क्या है मामला
इस मामले में धीरज मोर बनाम दिल्ली हाईकोर्ट के मामले को इस सुप्रीम कोर्ट की पीठ को भेजा गया था। इस मामले में संविधान के अनुच्छेद 233 की व्याख्या के संबंध में कानून का एक बड़ा सवाल था, जस्टिस कुरियन जोसेफ और जस्टिस मोहन एम शांतनगौदर की पीठ ने 23 जनवरी 2018 को संदर्भ भेजा था। पीठ ने कहा कि विचार के लिए एक बड़ा मुद्दा यह है कि क्या जिला न्यायाधीश के रूप में नियुक्ति के लिए पात्रता केवल नियुक्ति के समय या आवेदन के समय या दोनों में देखी जानी है।
याचिकाकर्ता ने दो बिंदुओं का किया था जिक्र
याचिकाकर्ताओं ने मुख्य रूप से दो बातों का जिक्र किया था- पहला यदि किसी उम्मीदवार ने अधिवक्ता के रूप में सात साल का अभ्यास पूरा कर लिया है, तो वह इस तथ्य के बावजूद पात्र होगा कि आवेदन / नियुक्ति की तिथि पर, वह संघ या राज्य की सेवा में है। दूसरा वे सदस्य जो सिविल जज, जूनियर डिवीजन या सीनियर डिवीजन के रूप में न्यायिक सेवा में हैं, अगर उन्होंने न्यायिक अधिकारी के रूप में सात साल या न्यायिक अधिकारी-सह-अधिवक्ता के रूप में सात साल पूरे किए हैं, तो उन्हें योग्य उम्मीदवारों के रूप में माना जाना चाहिए।
17 मई, 2019 को न्यायमूर्ति अरूण कुमार मिश्रा और न्यायमूर्ति नवीन सिन्हा की पीठ ने कहा था कि यह जरूर है कि अंतरिम आदेश के जरिए कुछ मामलों में बार कोटे से सिविल जजों को जिला जज नियुक्त किया गया है, लेकिन अब हम भविष्य में और इस तरह की नियुक्ति की इजाजत नहीं दे सकते। पीठ ने कहा कि अब इस संदर्भ में और अंतरिम आदेश पारित नहीं किया जा सकता।
पीठ ने इस मामले को महत्वपूर्ण बताते हुए इस लंबित मसले को चीफ जस्टिस के पास भेजते हुए उचित पीठ केसमक्ष सुनवाई कराने का आग्रह किया था।