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सुप्रीम कोर्ट ने कहा: लोगों को सच याद दिलाने का साहस दिखाना हमारी जिम्मेदारी; फैसला इंसानों-कुत्तों के हित में

Thu, 14 Aug 2025 07:19 AM IST
शुभम कुमार न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: शुभम कुमार Updated Thu, 14 Aug 2025 07:19 AM IST
सार

सुप्रीम कोर्ट ने लावारिस कुत्तों के मामले में कहा कि न्यायपालिका की जिम्मेदारी सच को उजागर करना है, चाहे वह अप्रिय क्यों न हो। कोर्ट ने दिल्ली-एनसीआर में कुत्तों को शेल्टर में भेजने के निर्देश दिए और लोगों से उन्हें गोद लेने की अपील की। कोर्ट ने इंसान और पशु, दोनों के हितों की रक्षा को सर्वोपरि बताया।

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Supreme Court's decision on stray dog case in the interest of humans and dogs in Delhi NCR
सुप्रीम कोर्ट - फोटो : एएनआई

विस्तार

दिल्ली-एनसीआर में लावारिस कुत्तों पर दो दिन पहले दिए अपने फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि न्यायपालिका की एकमात्र जिम्मेदारी है कि वह लोगों को उन सच्चाइयों से अवगत कराने का साहस और शक्ति रखे, जिन्हें वे सुनना पसंद नहीं करते। पीठ ने कहा, हमारा दिल सभी के लिए समान रूप से दुखी है। हम उन लोगों की निंदा करते हैं जो बेजुबानों के लिए प्यार और देखभाल की आड़ में आत्मप्रशंसा में जुटे हैं। लोगों के कल्याण के लिए काम करने वाली अदालत के रूप में, हमारे द्वारा दिए गए निर्देश इंसानों और कुत्तों, दोनों के हित में हैं। यह निजी नहीं है।

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11 अगस्त को दिए गए आदेश में, जिसकी प्रति बुधवार को अपलोड की गई, जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस आर महादेवन की पीठ ने दिल्ली-एनसीआर के अधिकारियों को निर्देश दिया कि वे जल्द से जल्द सभी इलाकों से लावारिस कुत्तों को उठाना शुरू करें और उन्हें स्थायी रूप से कुत्तों के आश्रय स्थलों में स्थानांतरित करें। फैसले में कहा गया, न्यायपालिका को प्रचलित लोकप्रिय भावनाओं के रंग में नहीं रंगना चाहिए, क्योंकि उसकी भूमिका उस समय की भावनाओं को प्रतिध्वनित करना नहीं, बल्कि न्याय, विवेक और समता के स्थायी सिद्धांतों को बनाए रखना है।
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पीठ ने अपने फैसले में आगे कहा, सतर्क प्रहरी और अधिकारों के संरक्षक के रूप में, न्यायपालिका की यह गंभीर जिम्मेदारी है कि वह लोगों को उन सच्चाइयों की याद दिलाने का साहस और शक्ति रखे जो उन्हें पसंद नहीं हैं या जिन्हें वे सुनना पसंद नहीं करते। पीठ ने लावारिस कुत्तों के प्रति सच्चे प्यार और देखभाल के प्रति अपनी जागरूकता व्यक्त की और लोगों से आगे आकर इस प्रयास का हिस्सा बनने का आग्रह किया। आदेश में कहा गया है, हस्तक्षेपकर्ताओं की चिंताओं को देखते हुए, हम सभी से कुत्तों को गोद लेने और उन्हें अपने घरों में आश्रय देने का आग्रह करते हैं।
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हालांकि, हम उन लोगों के सद्गुणों को कम नहीं आंकते जो जानवरों के प्रति प्यार और चिंता साझा करते हैं। अदालत ने इस बात पर जोर दिया कि पशु प्रेमियों और पशुओं के प्रति उदासीन लोगों के बीच एक आभासी विभाजन पैदा करने की कोशिश की जा रही है। लेकिन समस्या की जड़ सभी व्यावहारिक कारणों से अनुत्तरित ही है।

पीठ ने कहा-हमारा फैसला क्षणिक आवेग से प्रेरित नहीं
पीठ ने वरिष्ठ अधिवक्ता गौरव अग्रवाल की ओर से प्रस्तुत एक नोट का हवाला दिया, जो न्यायमित्र के रूप में अदालत की सहायता कर रहे हैं। नोट में हाल के दिनों में भारत में कुत्तों के काटने की घटनाओं का विवरण था। पीठ ने कहा, हम जो कार्य करने का प्रस्ताव रखते हैं, उसे लापरवाही से नहीं किया जाना चाहिए। जिस ज्वलंत मुद्दे पर हमने काम शुरू किया है, वह किसी क्षणिक आवेग से प्रेरित नहीं है।


अब झिझकने का वक्त नहीं है
गहन विचार-विमर्श के बाद और पिछले दो दशकों में सार्वजनिक सुरक्षा के मूल में स्थित इस मुद्दे को सुलझाने में संबंधित अधिकारियों की व्यवस्थित विफलता के बारे में दृढ़ निष्कर्ष पर पहुंचने के बाद ही हमने इस मामले को अपने हाथ में लेने का फैसला किया है। कुत्तों के काटने की चिंताजनक घटनाओं का उल्लेख करते हुए, पीठ ने कहा कि अब आत्मसंतुष्टि से उत्पन्न किसी भी प्रतिरोध या झिझक का समय नहीं है। पीठ ने कहा कि सड़कें असुरक्षित स्थान नहीं बननी चाहिए।

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दृष्टिबाधितों को काटे जाने का सबसे अधिक जोखिम
कई चिंताओं के बीच, हम दृष्टिबाधित व्यक्तियों, छोटे बच्चों, बुजुर्गों और साधारण पृष्ठभूमि के लोगों के अनुभवों का संज्ञान लेने के लिए तत्पर हैं, जो एक दिन का भोजन भी नहीं जुटा पाते, चिकित्सा खर्च की तो बात ही छोड़ दें। दृष्टिबाधित व्यक्तियों को कुत्तों के काटने का सबसे अधिक खतरा होता है क्योंकि उनका प्राथमिक सहारा, उनकी छड़ियां, कुत्तों द्वारा खतरे के रूप में देखी जाती हैं। पीठ ने यह भी कहा कि रेबीज फैलाने वाले कुत्ते और अन्य कुत्तों के बीच पहचान या वर्गीकरण करने का कोई तरीका नहीं है। अक्सर कहा जाता है कि कोई भी व्यक्ति कानून से ऊपर नहीं है। हालांकि, इस कहावत का दूसरा पहलू भी उतना ही महत्वपूर्ण है- कोई भी व्यक्ति कानून से नीचे नहीं है।

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