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'पहले हाईकोर्ट जाएं': बिना पहचान बताए घर में घुसी एटीएस, कार्रवाई के खिलाफ याचिका पर सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी
Tue, 13 Oct 2026 06:43 PM IST
देवेश त्रिपाठी
पीटीआई, नई दिल्ली
पीटीआई, नई दिल्ली
Published by: देवेश त्रिपाठी
Updated Tue, 13 Oct 2026 06:43 PM IST
सार
सुप्रीम कोर्ट ने उत्तर प्रदेश एटीएस के कर्मियों पर बिना उचित वर्दी और पहचान पत्र के घर में प्रवेश करने के आरोप वाली याचिका पर विचार करने से इनकार कर दिया। याचिकाकर्ता वाइज खान ने संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत सीधे शीर्ष अदालत का रुख किया था।
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सुप्रीम कोर्ट
- फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स
विस्तार
सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को उस याचिका पर सुनवाई करने से इनकार कर दिया, जिसमें उत्तर प्रदेश आतंकवाद निरोधक दस्ते (एटीएस) के कर्मियों पर उचित वर्दी पहने बिना और पहचान पत्र दिखाए बगैर याचिकाकर्ता के घर में प्रवेश करने का आरोप लगाया गया था। अदालत ने याचिकाकर्ता को राहत के लिए इलाहाबाद हाईकोर्ट जाने की सलाह दी।
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची तथा न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ ने याचिकाकर्ता वाइज खान के वकील से कहा कि वह इस मामले में हाईकोर्ट का रुख करें।
अनुच्छेद 32 के तहत सीधे सुप्रीम कोर्ट पहुंचे थे याचिकाकर्ता
सुनवाई के दौरान पीठ ने शुरुआत में ही याचिका पर विचार करने को लेकर अनिच्छा जताई। अदालत ने कहा कि याचिकाकर्ता ने पहले हाईकोर्ट जाने के बजाय संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत सीधे सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है। बता दें कि संविधान का अनुच्छेद 32 नागरिकों को मौलिक अधिकारों के प्रवर्तन के लिए सीधे सुप्रीम कोर्ट जाने का अधिकार देता है।
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याचिकाकर्ता के वकील ने दलील दी कि यदि कोई व्यक्ति अनुच्छेद 32 के तहत अदालत आता है, तो सुप्रीम कोर्ट अपने दायित्व से पीछे नहीं हट सकता। इस पर न्यायमूर्ति बागची ने कहा कि मौलिक अधिकारों के उल्लंघन से जुड़े मामलों में संविधान के अनुच्छेद 32 और 226 के तहत सुप्रीम कोर्ट तथा हाईकोर्ट के अधिकार क्षेत्र एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं। अनुच्छेद 226 के तहत हाईकोर्ट मौलिक अधिकारों के प्रवर्तन के लिए निर्देश, आदेश और रिट जारी कर सकता है।
पहले हाईकोर्ट को मामले पर विचार करने देना चाहिए
न्यायमूर्ति बागची ने कहा कि सामान्य तौर पर ऐसे आरोपों पर पहले संबंधित हाईकोर्ट को विचार करने का अवसर दिया जाना चाहिए। उन्होंने कहा, ''हम हमेशा यही पसंद करेंगे कि मौलिक अधिकारों के उल्लंघन के मामले पर पहले सुनवाई करने वाली अदालत संज्ञान ले।''
याचिकाकर्ता के वकील ने सुप्रीम कोर्ट के चर्चित डीके बसु बनाम पश्चिम बंगाल राज्य फैसले का भी हवाला दिया। इस फैसले में हिरासत के दौरान दुर्व्यवहार और अवैध गिरफ्तारी से बचाव के लिए दिशा-निर्देश तय किए गए थे। हालांकि, न्यायमूर्ति बागची ने कहा कि व्यक्तिगत स्वतंत्रता के कथित उल्लंघन से जुड़े मामलों में हाईकोर्ट के समक्ष भी राहत पाने के विकल्प उपलब्ध हैं।
वकील ने दोहराया कि याचिकाकर्ता ने सवाल उठाया है कि एटीएस के कर्मचारी बिना बैज या उचित पहचान दिखाए उसके घर में कैसे प्रवेश कर सकते हैं। इस पर मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने पूछा कि याचिकाकर्ता ने इन आरोपों को लेकर हाईकोर्ट का रुख क्यों नहीं किया।
सुप्रीम कोर्ट ने खारिज की याचिका
याचिकाकर्ता के वकील ने दलील दी कि मौलिक अधिकारों का कथित उल्लंघन अपने आप में संविधान का उल्लंघन है और ऐसे मामले में अनुच्छेद 32 के तहत सुप्रीम कोर्ट का हस्तक्षेप जरूरी है। हालांकि, पीठ ने याचिका पर विचार करने का कोई आधार नहीं पाया। अदालत ने आदेश दिया, ''याचिका पर विचार करने का कोई मामला नहीं बनता। खारिज की जाती है। याचिकाकर्ता चाहे तो हाईकोर्ट का रुख कर सकता है।''
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मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची तथा न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ ने याचिकाकर्ता वाइज खान के वकील से कहा कि वह इस मामले में हाईकोर्ट का रुख करें।
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अनुच्छेद 32 के तहत सीधे सुप्रीम कोर्ट पहुंचे थे याचिकाकर्ता
सुनवाई के दौरान पीठ ने शुरुआत में ही याचिका पर विचार करने को लेकर अनिच्छा जताई। अदालत ने कहा कि याचिकाकर्ता ने पहले हाईकोर्ट जाने के बजाय संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत सीधे सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है। बता दें कि संविधान का अनुच्छेद 32 नागरिकों को मौलिक अधिकारों के प्रवर्तन के लिए सीधे सुप्रीम कोर्ट जाने का अधिकार देता है।
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याचिकाकर्ता के वकील ने दलील दी कि यदि कोई व्यक्ति अनुच्छेद 32 के तहत अदालत आता है, तो सुप्रीम कोर्ट अपने दायित्व से पीछे नहीं हट सकता। इस पर न्यायमूर्ति बागची ने कहा कि मौलिक अधिकारों के उल्लंघन से जुड़े मामलों में संविधान के अनुच्छेद 32 और 226 के तहत सुप्रीम कोर्ट तथा हाईकोर्ट के अधिकार क्षेत्र एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं। अनुच्छेद 226 के तहत हाईकोर्ट मौलिक अधिकारों के प्रवर्तन के लिए निर्देश, आदेश और रिट जारी कर सकता है।
पहले हाईकोर्ट को मामले पर विचार करने देना चाहिए
न्यायमूर्ति बागची ने कहा कि सामान्य तौर पर ऐसे आरोपों पर पहले संबंधित हाईकोर्ट को विचार करने का अवसर दिया जाना चाहिए। उन्होंने कहा, ''हम हमेशा यही पसंद करेंगे कि मौलिक अधिकारों के उल्लंघन के मामले पर पहले सुनवाई करने वाली अदालत संज्ञान ले।''
याचिकाकर्ता के वकील ने सुप्रीम कोर्ट के चर्चित डीके बसु बनाम पश्चिम बंगाल राज्य फैसले का भी हवाला दिया। इस फैसले में हिरासत के दौरान दुर्व्यवहार और अवैध गिरफ्तारी से बचाव के लिए दिशा-निर्देश तय किए गए थे। हालांकि, न्यायमूर्ति बागची ने कहा कि व्यक्तिगत स्वतंत्रता के कथित उल्लंघन से जुड़े मामलों में हाईकोर्ट के समक्ष भी राहत पाने के विकल्प उपलब्ध हैं।
वकील ने दोहराया कि याचिकाकर्ता ने सवाल उठाया है कि एटीएस के कर्मचारी बिना बैज या उचित पहचान दिखाए उसके घर में कैसे प्रवेश कर सकते हैं। इस पर मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने पूछा कि याचिकाकर्ता ने इन आरोपों को लेकर हाईकोर्ट का रुख क्यों नहीं किया।
सुप्रीम कोर्ट ने खारिज की याचिका
याचिकाकर्ता के वकील ने दलील दी कि मौलिक अधिकारों का कथित उल्लंघन अपने आप में संविधान का उल्लंघन है और ऐसे मामले में अनुच्छेद 32 के तहत सुप्रीम कोर्ट का हस्तक्षेप जरूरी है। हालांकि, पीठ ने याचिका पर विचार करने का कोई आधार नहीं पाया। अदालत ने आदेश दिया, ''याचिका पर विचार करने का कोई मामला नहीं बनता। खारिज की जाती है। याचिकाकर्ता चाहे तो हाईकोर्ट का रुख कर सकता है।''