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नहीं हटेगी वकीलों की हड़ताल पर लगी रोक, सुप्रीम कोर्ट ने लोगों के अधिकारों का दिया हवाला

Sun, 07 Oct 2018 01:05 AM IST
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Updated Sun, 07 Oct 2018 01:05 AM IST
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Supreme Court refuses to remove ban on lawyers strike 

सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस रंजन गोगोई ने बार काउंसिल ऑफ इंडिया की वकीलों के हड़ताल पर जाने पर लगी रोक हटाने के सुझाव से असहमति जताई है। 16 साल पुराने प्रतिबंध को हटाने की मांग पर सीजेआई ने आश्चर्य जताते हुए पूछा कि आखिर हड़ताल क्यों होनी चाहिए। बार काउंसिल ऑफ इंडिया के एक कार्यक्रम में बार चेयरमैन मनन कुमार मिश्रा ने नए सीजेआई के सामने हड़ताल पर रोक हटाने का मुद्दा उठाया था। 

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इसी पर सीजेआई ने अपनी प्रतिक्रिया दी। 3 अक्तूबर को सीजेआई का पद संभालने वाले जस्टिस गोगोई ने कहा कि मुझे नहीं लगता कि यह कोई मुद्दा है। क्यों इसकी वैधता चाहिए, हड़ताल क्यों होनी चाहिए। मुझे विश्वास है ऐसा कुछ नहीं होगा। 
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सीजेआई गोगोई की राय से सहमति जताते हुए सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस अरुण मिश्रा ने वकीलों को याद दिलाया कि उनकी अनुपस्थिति लोगों की आजादी को प्रभावित करेगी और उन्हें उनके कई अधिकारों से वंचित कर देगी। उन्होंने कहा कि जब लोकतंत्र खतरे में हो तो असाधारण मामलों में या फिर न्यायिक व्यवस्था को बचाने के लिए बार हड़ताल का समर्थन कर सकता है, नहीं तो उसे हड़ताल पर जाने का कोई अधिकार नहीं है। 
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जस्टिस मिश्रा ने कहा कि क्या हम जंगल राज बर्दाश्त कर सकते हैं? क्या हम कानून के दरवाजे आम लोगों के लिए बंद कर सकते हैं? जब आप कोर्ट में नहीं होंगे तो न जाने कितने लोगों की आजादी इससे प्रभावित होगी? उस दिन कितने लोग अपने अधिकारों से वंचित रह जाएंगे? दरअसल, हड़ताल पर लगी रोक हटाने की मांग करते हुए बार चेयरमैन मनन मिश्रा ने कहा था कि यदि वकीलों को बोलने से रोका जाएगा तो देश के लोकतांत्रिक व्यवस्था को बर्बाद कर देगा। 


वकीलों का सीजेआई पर बहुत गहरी आस्था है। हमें पूरा भरोसा है कि आप हमारी स्वतंत्रता को बरकरार रखेंगे। कार्यक्रम में जस्टिस एनवी रमन्ना और जस्टिस मोहन एम शांतागौदर भी मौजूद थे। वर्ष 2002 के एक फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि वकीलों को हड़ताल पर जाने या बहिष्कार का आह्वान करने कोई अधिकार नहीं है।

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