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सुप्रीम कोर्ट: गिरफ्तारी के आधार नहीं बताए तो दोबारा अरेस्ट करना मुश्किल, मजिस्ट्रेट की मंजूरी क्यों जरूरी?

Mon, 21 Sep 2026 09:01 PM IST
हिमांशु सिंह चंदेल न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: हिमांशु सिंह चंदेल Updated Mon, 21 Sep 2026 09:01 PM IST
सार

सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि अगर किसी आरोपी को गिरफ्तारी के आधार नहीं बताए जाने या संविधान के अनुच्छेद 22(1) के उल्लंघन के कारण रिहा किया जाता है, तो उसी मामले में दोबारा गिरफ्तारी के लिए जांच एजेंसी सीधे कार्रवाई नहीं कर सकती। उसे मजिस्ट्रेट के सामने आवेदन देना होगा। आवेदन पर वरिष्ठ अधिकारी की मंजूरी भी जरूरी होगी। कोर्ट ने दोबारा गिरफ्तारी की इस प्रक्रिया में मजिस्ट्रेट की भूमिका को इतना अहम क्यों बनाया? आइए, सबकुछ विस्तार से जानते हैं...

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Supreme Court: Rearrest Difficult If Grounds of Arrest Aren’t Provided, Why Is Magistrate’s Approval Necessary
गिरफ्तारी के आधार नहीं बताए तो दोबारा गिरफ्तारी मुश्किल - फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स

विस्तार

सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को गिरफ्तारी और नागरिक की व्यक्तिगत स्वतंत्रता से जुड़े एक अहम फैसले में कहा कि अगर किसी व्यक्ति को गिरफ्तारी के कारण नहीं बताए गए या उसे 24 घंटे के भीतर मजिस्ट्रेट के सामने पेश नहीं किया गया और इसी वजह से अदालत ने उसे रिहा कर दिया, तो उसी मामले में उसे दोबारा गिरफ्तार करने के लिए जांच एजेंसी को मजिस्ट्रेट से मंजूरी लेनी होगी। अदालत ने साफ किया कि दोबारा गिरफ्तारी का फैसला उसी जांच एजेंसी के विवेक पर नहीं छोड़ा जा सकता, जिसने संविधान के प्रावधान का उल्लंघन किया है।

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जस्टिस उज्जल भुइयां और जस्टिस एएस चंद्रकुर की पीठ ने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 22(1) और 22(2) से समझौता नहीं किया जा सकता। अनुच्छेद 22(1) के तहत गिरफ्तार व्यक्ति को गिरफ्तारी के आधार बताए जाने जरूरी हैं, जबकि अनुच्छेद 22(2) के अनुसार गिरफ्तार या हिरासत में लिए गए व्यक्ति को 24 घंटे के भीतर निकटतम मजिस्ट्रेट के सामने पेश करना होता है। अदालत ने कहा कि अगर इन संवैधानिक सुरक्षा उपायों का उल्लंघन हुआ है, तो दोबारा गिरफ्तारी के लिए न्यायिक मंजूरी जरूरी होगी।

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दोबारा गिरफ्तारी से पहले जांच एजेंसी को क्या करना होगा?

पीठ ने कहा कि अगर किसी आरोपी को रिहा किए जाने के बाद भी जांच एजेंसी को लगता है कि जांच आगे बढ़ाने के लिए उसकी हिरासत में पूछताछ जरूरी है, तो उसे संबंधित मजिस्ट्रेट के सामने दोबारा हिरासत के लिए आवेदन देना होगा। आवेदन में आरोपी को दोबारा गिरफ्तार करने की वजह और उसकी हिरासत की जरूरत बतानी होगी। साथ ही यह भी बताना होगा कि पहली बार गिरफ्तारी के समय गिरफ्तारी के आधार आरोपी को क्यों नहीं बताए गए। अदालत ने स्पष्ट किया कि ऐसा आवेदन गिरफ्तारी के आधार आरोपी को बताए जाने के बाद ही दिया जा सकेगा।

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मजिस्ट्रेट की मंजूरी कब मिल सकती है?

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि मजिस्ट्रेट तभी दोबारा गिरफ्तारी की अनुमति दे सकता है, जब वह संतुष्ट हो कि पहली गिरफ्तारी के समय गिरफ्तारी के आधार बताना वास्तविक और उचित कारणों से संभव नहीं था। साथ ही मजिस्ट्रेट को यह भी संतुष्ट होना होगा कि आरोपी को दोबारा गिरफ्तार करने की जरूरत है। आवेदन पर संबंधित अधिकारी के तत्काल वरिष्ठ अधिकारी की मंजूरी भी जरूरी होगी। अदालत ने कहा कि इसका मकसद किसी तरह की मिलीभगत या गलत कार्रवाई की संभावना को रोकना है। मजिस्ट्रेट को आवेदन पर जल्द फैसला करना होगा और, संभव हो तो, आवेदन मिलने के एक सप्ताह के भीतर प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का पालन करते हुए निर्णय लेना होगा।

गलती करने वाले पुलिस अधिकारी के खिलाफ क्या होगा?

सुप्रीम कोर्ट ने दोबारा गिरफ्तारी की प्रक्रिया के साथ पुलिस अधिकारियों की जवाबदेही भी तय की है। अदालत ने कहा कि जब किसी आरोपी को अनुच्छेद 22(1) के उल्लंघन के कारण रिहा किया जाता है और उसकी दोबारा हिरासत मांगी जाती है, तो वरिष्ठ अधिकारी को जांच किसी दूसरे अधिकारी को सौंपनी होगी। साथ ही संबंधित पुलिस अधिकारी के खिलाफ विभागीय जांच शुरू की जानी चाहिए। अगर जांच में अधिकारी के खिलाफ प्रतिकूल निष्कर्ष आता है, तो उसके खिलाफ विभागीय कार्रवाई होगी और उसकी सर्विस बुक में भी इसकी एंट्री की जाएगी। अदालत ने कहा कि संविधान या उसके किसी प्रावधान के उल्लंघन को मामले की गंभीरता या अपराध की प्रकृति के आधार पर नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

किस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने यह फैसला दिया? 

सुप्रीम कोर्ट ने पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट के 29 मई के आदेश को रद्द कर दिया। मामला पोक्सो कानून के तहत आरोपी जसकरण जीत सिंह देओल से जुड़ा था। मजिस्ट्रेट ने पहले पाया था कि गिरफ्तारी के समय संविधान के अनुच्छेद 22(1) का पालन नहीं हुआ और आरोपी को हिरासत से रिहा कर दिया था। हालांकि, मजिस्ट्रेट ने पंजाब पुलिस को कानून के अनुसार आगे गिरफ्तारी करने की अनुमति दी थी। हाईकोर्ट ने भी जांच एजेंसी को आरोपी के खिलाफ गिरफ्तारी वारंट मांगने, दोबारा गिरफ्तार करने या उसकी हिरासत और रिमांड मांगने से रोकने की अपील खारिज कर दी थी। सुप्रीम कोर्ट ने अब इस व्यवस्था को बदलते हुए कहा कि ऐसी स्थिति में दोबारा गिरफ्तारी के लिए मजिस्ट्रेट की न्यायिक मंजूरी जरूरी होगी।
 

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