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सुप्रीम कोर्ट: दो से ज्यादा बच्चे होने पर चुनाव लड़ने की पाबंदी पर अदालत सख्त, कहा- अब इसकी प्रासंगिकता खत्म

Wed, 04 Nov 2026 05:38 PM IST
हिमांशु सिंह चंदेल न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली।
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली। Published by: हिमांशु सिंह चंदेल Updated Wed, 04 Nov 2026 05:38 PM IST
सार

सुप्रीम कोर्ट ने दो से अधिक बच्चे होने पर पंचायत चुनाव लड़ने से रोकने वाले कानूनों की प्रासंगिकता पर सवाल उठाए हैं। अदालत ने कहा कि भारत की प्रजनन दर घटकर 1.9 हो गई है और भविष्य में बुजुर्ग आबादी बढ़ सकती है। 2003 के फैसले पर दोबारा विचार के लिए मामला बड़ी पीठ को भेजा गया है। क्या अब दो बच्चों की कानूनी सीमा खत्म हो सकती है? आइए, सबकुछ विस्तार से जानते हैं...

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Supreme Court Questions Two-Child Rule for Elections Says Law Has Lost Relevance
सुप्रीम कोर्ट ने दो बच्चों वाले कानून पर दोबारा विचार करने की जरूरत क्यों बताई? - फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स

विस्तार

देश में दो से ज्यादा बच्चे होने पर पंचायत चुनाव लड़ने से रोकने वाले कानूनों की जरूरत पर सुप्रीम कोर्ट ने गंभीर सवाल उठाए हैं। अदालत ने कहा है कि बदलती जनसंख्या और घटती जन्म दर के कारण ऐसे कानून अब अपनी प्रासंगिकता खो चुके हैं। पहले इन कानूनों के पीछे बढ़ती आबादी को रोकने का तर्क दिया जाता था, लेकिन पिछले कुछ दशकों में देश की स्थिति बदल गई है। भारत की कुल प्रजनन दर यानी टीएफआर वर्ष 2003 में 3.0 थी, जो अब घटकर 1.9 रह गई है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अब ऐसे कानूनों पर दोबारा विचार करने का समय आ गया है। अदालत ने इस मामले को बड़ी पीठ के पास भेज दिया है, ताकि 2003 में दिए गए अपने फैसले पर फिर से विचार किया जा सके। इस फैसले का असर उन लोगों पर भी पड़ सकता है, जिन्हें दो से अधिक बच्चे होने के कारण चुनाव लड़ने से अयोग्य घोषित किया गया है।
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सुप्रीम कोर्ट ने दो बच्चों वाले कानून पर दोबारा विचार करने की जरूरत क्यों बताई?
न्यायमूर्ति पीएस नरसिम्हा और न्यायमूर्ति आलोक अराधे की पीठ महाराष्ट्र की मंगला भीमराव इंगले की याचिका पर सुनवाई कर रही थी। इंगले को काकोड़ा ग्राम पंचायत के सरपंच पद पर चुना गया था, लेकिन दो से अधिक बच्चे होने के कारण उनका चुनाव रद्द कर दिया गया था। महाराष्ट्र ग्राम पंचायत अधिनियम, 1959 की धारा 14(1)(जे-1) के तहत दो से अधिक बच्चे होने पर पंचायत चुनाव लड़ने के लिए अयोग्य माना जाता है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि प्रजनन से जुड़े फैसले लेने का अधिकार व्यक्ति की निजी स्वतंत्रता और जीवन के अधिकार का हिस्सा है। यह अधिकार संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत मिलता है। पीठ ने कहा कि दो से अधिक बच्चे होने पर लोगों को चुनाव लड़ने से रोकना अब उचित नहीं लगता। ऐसे कानून नागरिकों के एक पूरे वर्ग को राजनीतिक प्रतिनिधित्व से बाहर कर देते हैं। इसका उनके सार्वजनिक पद संभालने की क्षमता से कोई सीधा संबंध नहीं है।
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भारत की जन्म दर में कितनी गिरावट आई और इसका क्या असर होगा?
अदालत ने कहा कि भारत की कुल प्रजनन दर 2003 के 3.0 से घटकर 1.9 हो गई है। प्रजनन दर का मतलब है कि औसतन एक महिला अपने जीवन में कितने बच्चों को जन्म देती है। अदालत ने बताया कि 2.1 की प्रजनन दर को प्रतिस्थापन स्तर माना जाता है। इसका मतलब है कि एक पीढ़ी अपनी संख्या को अगली पीढ़ी में लगभग बनाए रख सकती है। भारत की प्रजनन दर इससे नीचे आ चुकी है। इसके कारण आने वाले समय में बुजुर्गों की आबादी बढ़ सकती है और काम करने की उम्र वाले लोगों का हिस्सा घट सकता है। अदालत ने चेतावनी दी कि अगर जनसंख्या में हो रहे इन बदलावों को समय रहते नहीं समझा गया तो देश को गंभीर परिणाम भुगतने पड़ सकते हैं। पीठ ने कहा कि बदलती परिस्थितियों के अनुसार नीतियां बनाना जरूरी है। कम होती जन्म दर को लगातार गिरने देना भी भविष्य में बड़ी चुनौती बन सकता है।
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चीन का उदाहरण देकर सुप्रीम कोर्ट ने क्या चेतावनी दी?
सुप्रीम कोर्ट ने 2003 के अपने फैसले का जिक्र किया, जिसमें चीन की सख्त जनसंख्या नियंत्रण नीति को सफल उदाहरण बताया गया था। पीठ ने कहा कि चीन ने बाद में अपनी नीति बदल दी। वर्ष 2015 में उसने एक बच्चे की नीति समाप्त कर दो बच्चों की अनुमति दी। इसके बाद 2021 में तीन बच्चे पैदा करने की अनुमति दे दी गई। चीन ने बच्चों की देखभाल, शिक्षा, मातृत्व सुरक्षा और परिवार कल्याण से जुड़ी सुविधाओं को बढ़ावा देने के कदम भी उठाए। अदालत ने कहा कि चीन का अनुभव बताता है कि जन्म दर कम करना हमेशा सफलता का संकेत नहीं होता। दुनिया के कई देश अब घटती और बुजुर्ग होती आबादी की समस्या से जूझ रहे हैं। पीठ ने कहा कि जनसंख्या नियंत्रण के नाम पर किसी विवाहित जोड़े के बच्चे पैदा करने के फैसले में जबरन दखल नहीं दिया जा सकता। अदालत के मुताबिक, बदलते हालात के अनुसार कानून और नीतियां बदलना जरूरी है।


2003 के फैसले पर अब क्या होगा और सरपंच को मिली राहत का क्या है मामला?
सुप्रीम कोर्ट ने जुलाई 2003 में जावेद बनाम हरियाणा राज्य मामले में हरियाणा पंचायती राज अधिनियम, 1994 के तहत दो से अधिक जीवित बच्चे होने पर पंचायत चुनाव लड़ने से रोकने के प्रावधान को बरकरार रखा था। अब महाराष्ट्र के मामले की सुनवाई करते हुए अदालत ने उस फैसले के कानूनी आधार पर दोबारा विचार करने की जरूरत बताई है। पीठ ने अपने फैसले को भारत के मुख्य न्यायाधीश के पास भेजने का निर्देश दिया है, ताकि उचित बड़ी पीठ का गठन किया जा सके। अदालत ने यह भी बताया कि बॉम्बे हाईकोर्ट के पिछले साल अगस्त के फैसले पर पहले ही रोक लगा दी गई थी। इसके साथ ही मंगला भीमराव इंगले को सरपंच के पद पर बने रहने की अनुमति दी गई थी। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यह अंतरिम राहत सिविल अपील का अंतिम फैसला आने तक जारी रहेगी। अब बड़ी पीठ तय करेगी कि दो से अधिक बच्चे होने पर पंचायत चुनाव लड़ने से रोकने वाला कानून मौजूदा परिस्थितियों में उचित है या नहीं।
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