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Supreme Court: 'स्पष्ट न होने पर क्रूरता सिद्ध करने के लिए एक उदाहरण काफी नहीं'; चार लोगों पर आपराधिक केस रद्द
Wed, 06 Dec 2023 08:50 PM IST
ज्योति भास्कर
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
Published by: ज्योति भास्कर
Updated Wed, 06 Dec 2023 08:50 PM IST
सार
क्रूरता के आरोप और दोषसिद्धि मामले में सुप्रीम कोर्ट ने अहम टिप्पणी की। शीर्ष अदालत ने कहा, किसी व्यक्ति को क्रूरता के अपराध में फंसाने के लिए महज एक उदाहरण पर्याप्त नहीं हो सकता। अदालत ने क्रूरता का असाधारण (portentous) होने की शर्त भी रखी।
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सुप्रीम कोर्ट
- फोटो : ANI
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विस्तार
क्रूरता के आरोप और अदालत के समक्ष दोष साबित करने के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने अहम टिप्पणी की है। शीर्ष अदालत ने विवाहित महिला के आरोपों को लेकर कहा, किसी व्यक्ति को क्रूरता के अपराध में फंसाने के लिए महज एक उदाहरण पर्याप्त नहीं हो सकता। अदालत ने क्रूरता का उदाहरण प्रत्यक्ष और असाधारण (portentous) होने की शर्त भी रखी। अदालत के इस फैसले से चार लोगों को राहत मिली। दहेज उत्पीड़न और क्रूरता के इस मामले में कोर्ट ने आरोपी व्यक्ति की बहन और चचेरे भाइयों सहित चार लोगों के खिलाफ आपराधिक कार्यवाही रद्द कर दी।
उच्चतम न्यायालय में जस्टिस संजीव खन्ना और न्यायमूर्ति एसवीएन भट्टी की पीठ ने कहा, किसी विवाहित महिला के साथ क्रूरता के मामले में आरोपियों की संलिप्तता के भौतिक साक्ष्य के अभाव में क्रूरता साबित नहीं की जा सकती। अदालत ने कहा, जब तक आरोप और साक्ष्य स्पष्ट न हों, क्रूरता के आरोपों के तहत किसी को फंसाने के लिए पर्याप्त नहीं माने जा सकते। शिकायतकर्ता के वैवाहिक जीवन में क्रूरता को लेकर अदालत ने कहा, राहत की गुहार लगाते हुए अपील कर रहे याचिकाकर्ताओं के खिलाफ दावे 'बहुत अस्पष्ट और सामान्य' प्रकृति के पाए गए।
शीर्ष अदालत ने भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 498ए और 506 और दहेज निषेध अधिनियम, 1961 के प्रावधानों के तहत कथित अपराध करने के आरोपियों को राहत दी। सुप्रीम कोर्ट ने कहा, शिकायतकर्ता के वैवाहिक जीवन में हस्तक्षेप और संलिप्तता के किसी भी भौतिक सबूत के अभाव में आरोपी को आईपीसी की धारा 498ए के तहत क्रूरता का दोषी नहीं ठहराया जा सकता। अदालत ने 30 नवंबर को पारित आदेश में कहा, जब तक क्रूरता के सबूत और उदाहरण स्पष्ट न हों, इसके आधार पर आरोपी के खिलाफ दोषसिद्ध नहीं किया जा सकता।
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बता दें कि आईपीसी की धारा 498ए पति या उसके रिश्तेदारों पर आरोप लगाने के लिए इस्तेमाल किया जाता है। इसके तहत किसी विवाहित महिला के साथ क्रूरता करने के अपराध का आरोप लगाकर मुकदमे चलाए जाते हैं। धारा 506 के तहत आपराधिक धमकी का दोष साबित होने पर सजा सुनाई जाती है।
अदालत ने अपने आदेश में पाया, क्रूरता के आरोप से राहत की अपील करने वाले याचिकाकर्ता वैवाहिक घर में नहीं रह रहे थे। उनमें से एक भारत से भी बाहर रह रहा था। आरोपियों को राहत देते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा, क्रूरता साबित करने के विशिष्ट विवरणों के अभाव में अदालत वर्तमान अपील को स्वीकार करती है। शीर्ष अदालत ने कर्नाटक उच्च न्यायालय के आदेश को चुनौती देने वाली याचिका पर यह आदेश पारित किया। हाईकोर्ट ने मार्च 2019 में पारित आदेश में चारों आरोपियों के खिलाफ आरोप पत्र को रद्द करने से इनकार कर दिया था।
क्रूरता की शिकायत करने वाली महिला की शादी जून 2015 में हुई थी। उसने एक शिकायत की थी जिसके बाद नवंबर 2016 में कर्नाटक में प्राथमिकी दर्ज की गई थी। महिला ने आरोप लगाया था कि फरवरी 2016 में अपीलकर्ताओं (ससुराल पक्ष) में से एक ने कथित तौर पर उसकी शारीरिक बनावट पर टिप्पणी की थी। महिला ने निजी सामान को कूड़ेदान में फेंकने के आरोप भी लगाए थे।
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उच्चतम न्यायालय में जस्टिस संजीव खन्ना और न्यायमूर्ति एसवीएन भट्टी की पीठ ने कहा, किसी विवाहित महिला के साथ क्रूरता के मामले में आरोपियों की संलिप्तता के भौतिक साक्ष्य के अभाव में क्रूरता साबित नहीं की जा सकती। अदालत ने कहा, जब तक आरोप और साक्ष्य स्पष्ट न हों, क्रूरता के आरोपों के तहत किसी को फंसाने के लिए पर्याप्त नहीं माने जा सकते। शिकायतकर्ता के वैवाहिक जीवन में क्रूरता को लेकर अदालत ने कहा, राहत की गुहार लगाते हुए अपील कर रहे याचिकाकर्ताओं के खिलाफ दावे 'बहुत अस्पष्ट और सामान्य' प्रकृति के पाए गए।
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शीर्ष अदालत ने भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 498ए और 506 और दहेज निषेध अधिनियम, 1961 के प्रावधानों के तहत कथित अपराध करने के आरोपियों को राहत दी। सुप्रीम कोर्ट ने कहा, शिकायतकर्ता के वैवाहिक जीवन में हस्तक्षेप और संलिप्तता के किसी भी भौतिक सबूत के अभाव में आरोपी को आईपीसी की धारा 498ए के तहत क्रूरता का दोषी नहीं ठहराया जा सकता। अदालत ने 30 नवंबर को पारित आदेश में कहा, जब तक क्रूरता के सबूत और उदाहरण स्पष्ट न हों, इसके आधार पर आरोपी के खिलाफ दोषसिद्ध नहीं किया जा सकता।
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बता दें कि आईपीसी की धारा 498ए पति या उसके रिश्तेदारों पर आरोप लगाने के लिए इस्तेमाल किया जाता है। इसके तहत किसी विवाहित महिला के साथ क्रूरता करने के अपराध का आरोप लगाकर मुकदमे चलाए जाते हैं। धारा 506 के तहत आपराधिक धमकी का दोष साबित होने पर सजा सुनाई जाती है।
अदालत ने अपने आदेश में पाया, क्रूरता के आरोप से राहत की अपील करने वाले याचिकाकर्ता वैवाहिक घर में नहीं रह रहे थे। उनमें से एक भारत से भी बाहर रह रहा था। आरोपियों को राहत देते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा, क्रूरता साबित करने के विशिष्ट विवरणों के अभाव में अदालत वर्तमान अपील को स्वीकार करती है। शीर्ष अदालत ने कर्नाटक उच्च न्यायालय के आदेश को चुनौती देने वाली याचिका पर यह आदेश पारित किया। हाईकोर्ट ने मार्च 2019 में पारित आदेश में चारों आरोपियों के खिलाफ आरोप पत्र को रद्द करने से इनकार कर दिया था।
क्रूरता की शिकायत करने वाली महिला की शादी जून 2015 में हुई थी। उसने एक शिकायत की थी जिसके बाद नवंबर 2016 में कर्नाटक में प्राथमिकी दर्ज की गई थी। महिला ने आरोप लगाया था कि फरवरी 2016 में अपीलकर्ताओं (ससुराल पक्ष) में से एक ने कथित तौर पर उसकी शारीरिक बनावट पर टिप्पणी की थी। महिला ने निजी सामान को कूड़ेदान में फेंकने के आरोप भी लगाए थे।