डॉक्टरों पर हिंसा को लेकर सुप्रीम कोर्ट सख्त: कहा- डर के माहौल में कैसे करेंगे इलाज? सुरक्षा पर दिए ये निर्देश
सुप्रीम कोर्ट ने डॉक्टरों पर हिंसा और धमकी के मामले में कड़ा रुख अपनाते हुए कहा कि शारीरिक हिंसा, डर या दबाव के बीच डॉक्टर से स्वतंत्र और सही फैसला लेने की उम्मीद नहीं की जा सकती। अदालत ने ठाणे के अस्पताल में तीन डॉक्टरों से मारपीट और गाली-गलौज के आरोपी चार लोगों की जमानत रद्द कर दी। अब सवाल है कि डॉक्टरों की सुरक्षा को लेकर अदालत ने क्या निर्देश दिए और आरोपियों पर आगे क्या कार्रवाई होगी? आइए, सबकुछ विस्तार से जानते हैं...
विस्तार
डॉक्टरों और अस्पताल के कर्मचारियों की सुरक्षा को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने अहम टिप्पणी की है। अदालत ने कहा कि अगर कोई डॉक्टर शारीरिक हिंसा, धमकी या दबाव के डर में काम कर रहा है, तो उससे स्वतंत्र और सही फैसला लेने की उम्मीद नहीं की जा सकती। यह टिप्पणी महाराष्ट्र के ठाणे जिले के एक नगरपालिका अस्पताल में डॉक्टरों से कथित मारपीट और गाली-गलौज के मामले में आई है। सुप्रीम कोर्ट ने शिवसेना के नगरसेवक रमेश म्हात्रे और उनके तीन साथियों को मिली जमानत रद्द कर दी है। चारों पर डोंबिवली के शास्त्री नगर नगरपालिका अस्पताल में ड्यूटी कर रहे तीन डॉक्टरों, जिनमें एक महिला डॉक्टर भी शामिल थीं, के साथ मारपीट और बदसलूकी का आरोप है।
सुप्रीम कोर्ट ने डॉक्टरों की स्वतंत्रता को लेकर क्या कहा?
जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने कहा कि इलाज से असंतुष्टि, किसी मांग को मनवाने या इलाज के खराब नतीजे को लेकर शिकायत जताने के लिए हिंसा, धमकी या दबाव का इस्तेमाल नहीं किया जा सकता। अदालत ने कहा कि डॉक्टरों की सुरक्षा और सम्मान केवल व्यक्तिगत अधिकार का मामला नहीं है, बल्कि यह पूरे समाज के हित से जुड़ा है। डॉक्टरों को इलाज करते समय एकाग्रता, शांति और सही निर्णय लेने की जरूरत होती है। अगर उनके मन में हिंसा या डर का खतरा रहेगा तो इसका सीधा असर स्वास्थ्य सेवाओं पर पड़ सकता है। इसी आधार पर अदालत ने बॉम्बे हाईकोर्ट के 28 सितंबर के आदेश को हटाते हुए चारों आरोपियों की जमानत रद्द कर दी।
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ठाणे के अस्पताल में आखिर क्या हुआ था?
मामला 6 जुलाई का है। आरोप है कि रमेश म्हात्रे, रमेश लक्ष्मण पवार, प्रमोद उर्फ प्रकाश उद्धव निकम और अक्षय शरद करांडे ने डोंबिवली के शास्त्री नगर नगरपालिका अस्पताल के लेबर वार्ड में ड्यूटी कर रहे तीन डॉक्टरों के साथ मारपीट और गाली-गलौज की। आरोपियों को पहले जमानत मिल गई थी। बॉम्बे हाईकोर्ट ने 7 अगस्त को म्हात्रे को जमानत दी थी और मुकदमे की सुनवाई तेजी से पूरी करने का निर्देश दिया था। इसके बाद मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा। सुप्रीम कोर्ट ने चारों को 5 अक्तूबर तक ट्रायल कोर्ट के सामने आत्मसमर्पण करने का निर्देश दिया है। अदालत ने यह भी कहा कि परिस्थितियों में कोई महत्वपूर्ण बदलाव होने पर आरोपी उचित अदालत में दोबारा जमानत मांग सकते हैं।
निर्वाचित प्रतिनिधि की जिम्मेदारी को लेकर अदालत ने क्या कहा?
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि किसी निर्वाचित प्रतिनिधि से जनता की सेवा करने और उन संस्थाओं को मजबूत करने की उम्मीद की जाती है, जिनके जरिए शिकायतों का समाधान और न्याय की प्रक्रिया चलती है। अदालत ने कहा कि कोई जनप्रतिनिधि खुद पुलिस, प्रशासक या अदालत की भूमिका नहीं अपना सकता। डर या धमकी के जरिए अपनी बात मनवाने के लिए व्यक्तिगत प्रभाव का इस्तेमाल करने से केवल एक व्यक्ति प्रभावित नहीं होता, बल्कि कानून के शासन में लोगों का भरोसा भी कमजोर हो सकता है। अदालत ने इस मामले में आरोपियों के खिलाफ दर्ज पुराने मामलों को भी महत्वपूर्ण माना। आदेश के मुताबिक, रमेश म्हात्रे के खिलाफ 18 मामले दर्ज होने की बात सामने आई है। इनमें भारतीय दंड संहिता की धारा 302 और 307 जैसे गंभीर अपराधों से जुड़े मामले भी शामिल बताए गए हैं।
डॉक्टरों और गवाहों की सुरक्षा को लेकर क्या निर्देश दिए गए?
अदालत ने कहा कि इस मामले में डॉक्टर और अस्पताल के कर्मचारी महत्वपूर्ण गवाह हैं। इसलिए ट्रायल कोर्ट को महाराष्ट्र गवाह संरक्षण और सुरक्षा अधिनियम, 2017 के तहत सभी महत्वपूर्ण गवाहों को पर्याप्त सुरक्षा देनी होगी। अगर किसी गवाह को धमकी, डर या दबाव की आशंका हो तो ट्रायल कोर्ट को तुरंत स्थिति पर नजर रखनी होगी और जरूरत पड़ने पर जिला प्रशासन या पुलिस अधीक्षक को सुरक्षा देने का निर्देश देना होगा। अदालत ने यह भी कहा कि आरोपी पक्ष के प्रभाव से बचाते हुए गवाहों को बिना डर अपनी गवाही देने का मौका मिलना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट ने महाराष्ट्र सरकार से यह भी कहा कि वह जांच करे कि आरोपियों पर लागू निवारक हिरासत संबंधी कानूनों के प्रावधान लागू होते हैं या नहीं।
अदालत ने अस्पताल में आरोपी की हिरासत को लेकर क्या सवाल उठाया?
सुप्रीम कोर्ट ने रमेश म्हात्रे के पुलिस और न्यायिक हिरासत के दौरान अस्पताल में रहने को लेकर भी गंभीर चिंता जताई। आदेश के मुताबिक, 10 से 13 जुलाई तक पुलिस हिरासत के दौरान और उसके बाद न्यायिक हिरासत में भी वह ठाणे जिला सिविल अस्पताल के जेल वार्ड में रहा। अदालत ने कहा कि इस तरह वह जेल में वास्तविक बंदी बनाए जाने की प्रक्रिया से काफी हद तक बचा रहा। अदालत के मुताबिक, 15 जुलाई 2026 को जमानत का आदेश मिलने के बाद रिलीज मेमो जारी होते ही उसने अस्पताल से छुट्टी लेने की मांग की। अदालत ने कहा कि पूरे घटनाक्रम को देखने पर यह सवाल उठता है कि क्या उसके पद से जुड़े प्रभाव का इस्तेमाल हिरासत की प्रभावी प्रक्रिया से बचने के लिए किया गया। अदालत ने यह भी कहा कि घटना के बाद डॉक्टरों में इतना डर पैदा हुआ कि कुछ पीड़ित डॉक्टरों को इस्तीफा देना पड़ा।