Supreme Court Updates: डीएनए सबूतों में गड़बड़ी पर सुप्रीम कोर्ट की सख्ती, मौत की सजा पाए दोषी को किया बरी
सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को एक हत्या और दुष्कर्म के मामले में मौत की सजा पाए एक आरोपी को बरी कर दिया। अदालत ने मामले में जांच को त्रुटिपूर्ण बताया और डीएनए साक्ष्यों में खामियों की ओर इशारा किया।जस्टिस विक्रम नाथ, संजय करोल और संदीप मेहता की पीठ ने कहा कि फॉरेंसिक साक्ष्य वाले मामलों में डीएनए नमूनों को पूरी सावधानी और सभी जरूरी प्रक्रियाओं का पालन करते हुए एक दस्तावेज में दर्ज किया जाना चाहिए। इस दस्तावेज़ पर जांच अधिकारी, मौजूद चिकित्सक और स्वतंत्र गवाहों के हस्ताक्षर होने चाहिए।
मामले में आरोपी को मई 2011 में गिरफ्तार किया गया था और मार्च 2019 में मद्रास हाईकोर्ट ने उसकी मौत की सजा को बरकरार रखा था। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि जांच में गंभीर खामियां थीं और डीएनए सबूतों की प्रक्रिया में लापरवाही बरती गई। कोर्ट ने कहा कि अगर स्वतंत्र गवाह उपलब्ध नहीं हो पाए, तो उनकी तलाश के प्रयास और उपलब्ध न हो पाने के कारण भी रिकॉर्ड में दर्ज होने चाहिए। यह आदेश अब देशभर में लागू होगा। इस फैसले को डीएनए साक्ष्य से जुड़े मामलों में एक अहम दिशा-निर्देश माना जा रहा है।
सुप्रीम कोर्ट का आदेश: जेलों में दिव्यांग कैदियों की पहचान जरूरी, मिले बराबर इलाज और सुविधाएं
सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को तमिलनाडु की जेलों को आदेश दिया कि वे कैदियों की भर्ती के समय उनकी दिव्यांगता की पहचान करें और सभी जेलों में दिव्यांगों के अनुकूल सुविधाएं सुनिश्चित करें। मामले में सुनवाई के दौरान जस्टिस जे बी पारडीवाला और जस्टिस आर महादेवन की पीठ ने कहा कि हर कैदी को मौका दिया जाए कि वह अपनी किसी भी दिव्यांगता और उससे जुड़ी ज़रूरतों की जानकारी दे सके। कोर्ट ने कहा कि दिव्यांग कैदी समाज के सबसे वंचित और संवेदनशील वर्गों में आते हैं। जो सामाजिक और ढांचागत मुश्किलें वे बाहर झेलते हैं, वे जेल में और भी बढ़ जाती हैं।
इसके साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि आज तक दिव्यांग या ट्रांसजेंडर कैदियों के लिए ऐसा कोई विशेष कानून या नीति नहीं है, जो उनकी गरिमा और अधिकारों की गारंटी देती हो, जैसे कि महिला कैदियों के लिए कुछ बुनियादी सुरक्षा दी गई है।
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मामले में कोर्ट ने क्या कहा?
सुनावाई के दौरान कोर्ट ने जरूरी निर्देश देते हुए कहा कि जेल में प्रवेश के समय दिव्यांगता की पहचान की जाए। जेल से जुड़ी सभी जानकारी ब्रेल, बड़ी लिखाई, सांकेतिक भाषा या आसान भाषा में उपलब्ध हो। व्हीलचेयर के अनुकूल ढांचे, विशेष शौचालय, रैंप और सुरक्षित वातावरण हर जेल में हो। फिजियोथेरेपी, साइकोथेरेपी और अन्य थेरेपी सेवाओं के लिए विशेष स्थान हो। इसके साथ ही दिव्यांग कैदियों को सामान्य समाज जैसी स्वास्थ्य सेवाएं मिलें जैसे फिजियोथेरेपी, स्पीच थेरेपी, मानसिक स्वास्थ्य सेवाएं और सहायक उपकरण।
कैदियों को मनपसंद खाना न मिलना मौलिक अधिकारों का उल्लंघन नहीं', सुप्रीम कोर्ट की अहम टिप्पणी
सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को कहा कि जेल में बंद कैदियों, चाहे वे दिव्यांग हों या नहीं, को महंगा या पसंदीदा खाना न मिलना उनके मौलिक अधिकारों का उल्लंघन नहीं माना जा सकता। जस्टिस जे बी पारडीवाला और जस्टिस आर महादेवन की पीठ ने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन का अधिकार सभी कैदियों को है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि वे व्यक्तिगत पसंद के लग्जरी खाने की मांग कर सकते हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?
कोर्ट ने कहा कि राज्य की जिम्मेदारी यह है कि वह हर कैदी को पर्याप्त, पौष्टिक और चिकित्सकीय रूप से उपयुक्त भोजन दे। अगर कोई कैदी बीमार है या दिव्यांग है, तो उसे डॉक्टर की सलाह के अनुसार खाना मिलना चाहिए, लेकिन पसंद का या महंगा खाना न मिलना कोई संवैधानिक अधिकार का हनन नहीं है।
'जेलें सुधार केंद्र हैं, सुविधा स्थल नहीं'
कोर्ट ने कहा कि जेलें समाज की सुविधाओं का विस्तार नहीं हैं, बल्कि सुधार केंद्र हैं। कुछ नॉन-एसेंशियल या विलासिता की चीजें अगर न भी दी जाएं, तो जब तक उससे स्वास्थ्य या गरिमा को सीधा नुकसान नहीं होता, तब तक उसे मानवाधिकारों का उल्लंघन नहीं माना जा सकता।
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बता दें कि यह फैसला वकील एल मुरुगनाथम की याचिका पर आया, जो बीकर मस्कुलर डिस्ट्रॉफी नाम की बीमारी से पीड़ित हैं। उन्होंने कहा कि उन्हें जेल में रहते हुए प्रोटीन युक्त खाना जैसे अंडा, चिकन, मेवे रोजाना नहीं मिले, और जरूरी चिकित्सा भी नहीं मिली। इससे पहले मद्रास हाई कोर्ट ने उन्हें 5 लाख रुपये का मुआवजा देने का आदेश दिया था, जिसके खिलाफ उन्होंने सुप्रीम कोर्ट में अपील की।
सुप्रीम कोर्ट ने टूट चुकी शादी पर दी तलाक की मंजूरी, कहा- अब साथ रहना बेकार की लड़ाई
सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को एक पति-पत्नी को तलाक की मंजूरी दे दी। कोर्ट ने माना कि उनके रिश्ते में अब “आपसी सम्मान और साथ निभाने” जैसी बुनियादी बातें पूरी तरह खत्म हो चुकी हैं और ऐसे में दोनों को कानूनी रूप से साथ रखने का कोई मतलब नहीं बचता। जस्टिस विक्रम नाथ और संदीप मेहता की बेंच ने कहा कि यह फैसला दोनों के "बेहतर भविष्य" और उनके नाबालिग बच्चे की शांति भरी ज़िंदगी के लिए ज़रूरी है, जिससे वे लंबी और बेनतीजा कानूनी लड़ाइयों से मुक्त हो सकें।
क्या था मामला?
पति ने पत्नी पर क्रूरता का आरोप लगाकर फैमिली कोर्ट में तलाक की अर्जी दी थी। वहां से तलाक खारिज हुआ, फिर वह हाईकोर्ट गया—वहां भी राहत नहीं मिली। आखिरकार सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई कर तलाक मंजूर किया। कोर्ट ने यह भी कहा कि महिला द्वारा पति और उसके परिवार के खिलाफ दायर किया गया मामला झूठा था, जिसमें सभी को बरी किया गया। ऐसे में पति से यह उम्मीद नहीं की जा सकती कि वह अब उस महिला के साथ शादी निभाए।
सुप्रीम कोर्ट ने भारतीय खाद्य सुरक्षा एवं मानक प्राधिकरण को इसे लागू करने का दिया निर्देश
सुप्रीम कोर्ट ने भारतीय खाद्य सुरक्षा एवं मानक प्राधिकरण (एफएसएसएआई) को देशभर में खाद्य पदार्थों के डिब्बों पर सामने की तरफ उसमें मौजूद पोषण लेबल लागू करने का निर्देश दिया है। इस निर्देश को भारत में बढ़ते मोटापे के संकट से निपटने और खाद्य उद्योग में पारदर्शिता सुनिश्चित करने की दिशा में एक बड़ा कदम माना जा रहा है।
शिवसेना सांसद और संसद की अधीनस्थ विधान समिति के अध्यक्ष मिलिंद देवड़ा ने सोशल मीडिया पोस्ट में शीर्ष अदालत के इस आदेश की जानकारी दी। देवड़ा ने यह भी कहा कि उन्होंने सिंगापुर की स्पष्ट ए-टु-डी न्यूट्री-ग्रेड प्रणाली का अध्ययन करने की सिफारिश की है। उन्होंने कहा कि इस तरह की लेबलिंग भारतीय उपभोक्ताओं को ज्यादा स्वस्थ और अधिक जानकारीपूर्ण विकल्प चुनने में सक्षम बनाएगी। उन्होंने यह भी कहा कि देश में मोटापे, मधुमेह, उच्च रक्तचाप और अन्य गैर-संचारी रोगों (एनसीडी) के बढ़ते संकट से निपटने के लिए एफएसएसएआई को बिना किसी और देरी के इसका पालन करना चाहिए।
निर्देश स्वास्थ्य मंत्रालय के अनुरूप
सुप्रीम कोर्ट का यह निर्देश केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय की ओर से उठाए गए व्यापक नीतिगत कदमों के अनुरूप है। हाल ही में, मंत्रालय ने स्कूलों, कार्यालयों और सार्वजनिक संस्थानों में चीनी और तेल के बारे में जागरूकता बोर्ड लगाने का प्रस्ताव रखा है। इन दृश्य संकेतों का उद्देश्य रोजमर्रा के खाद्य पदार्थों में छिपे वसा और शर्करा के सेवन को कम करना और स्वस्थ आहार संबंधी आदतों को बढ़ावा देना है।
जांच में खामियां मिलने पर मौत की सजा पाए व्यक्ति को किया रिहा
सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को तमिलनाडु के थेनी में 2011 में एक युवा प्रेमी जोड़े की हत्या के मामले में मौत की सजा पाए एक व्यक्ति को जांच में खामियां पाए जाने के बाद रिहा कर दिया। शीर्ष अदालत ने डीएनए साक्ष्य पर अपनाई जाने वाली सामान्य प्रक्रिया के रूप में दिशा-निर्देश जारी किए। जस्टिस विक्रम नाथ, जस्टिस संजय करोल और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने मद्रास हाईकोर्ट के उस फैसले के खिलाफ कट्टावेल्लई उर्फ देवकर की अपील को स्वीकार करते हुए उसे निर्दोष बताते हुए बरी कर दिया। हाईकोर्ट ने 14 मई, 2011 को दोस्तों और प्रेमियों के एक लोकप्रिय मिलन स्थल सुरुली जलप्रपात पर एझिल मुथलवन की हत्या और दूसरी पीड़िता की हत्या और दुष्कर्म के लिए उसकी दोषसिद्धि और मृत्युदंड की सजा को बरकरार रखा था। साक्ष्यों की जांच के बाद अदालत ने पाया कि संवेदनशील साक्ष्य (डीएनए) के संबंध में जरा भी सावधानी नहीं बरती गई।
ईडी की शक्तियों संबंधी फैसले की समीक्षा पर 31 को सुनवाई
सुप्रीम कोर्ट प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) शक्तियों पर अपने 2022 के उस फैसले की समीक्षा की मांग वाली याचिकाओं पर 31 जुलाई को सुनवाई करेगा, जिसमें धन शोधन मामले में गिरफ्तारी और संपत्ति कुर्क करने के एजेंसी के अधिकारों को बरकरार रखा गया था।
जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की पीठ ने बुधवार को सुनवाई के लिए सूचीबद्ध मामले को 31 जुलाई तक के लिए टाल दिया। दरअसल जब केंद्र की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि वह बुधवार को उपलब्ध नहीं हैं। याचिकाकर्ताओं के अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने कहा कि इस मामले की सुनवाई 31 जुलाई को की जाती है, तो उन्हें कोई आपत्ति नहीं है। सुप्रीम कोर्ट ने 7 मई को केंद्र सरकार और याचिकाकर्ताओं से उस फैसले को चुनौती देने वाले मुद्दों को तय करने को कहा, जिसमें आरोपियों की गिरफ्तारी और संपत्ति कुर्क करने की ईडी की शक्तियों को बरकरार रखा गया था। केंद्र ने तर्क दिया था कि अगस्त 2022 में इस मुद्दे पर नोटिस जारी करने वाली पीठ द्वारा उठाए गए दो विशिष्ट मुद्दों से पर पुनर्विचार याचिकाओं पर सुनवाई आगे नहीं बढ़ सकती।