फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   India News ›   Supreme Court News Update Today: SC defer for Monday in 26 month pregnancy medical termination

Supreme Court: 26 हफ्ते का गर्भ गिराने के मामले में अब सोमवार को सुनवाई, AIIMS से मांगे कई सवालों के जवाब

Fri, 13 Oct 2023 12:21 PM IST
काव्या मिश्रा न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: काव्या मिश्रा Updated Fri, 13 Oct 2023 12:21 PM IST
सार

शीर्ष अदालत ने एम्स से विभिन्न पहलुओं पर रिपोर्ट देने को कहा है। कोर्ट जानना चाहता है कि क्या ऐसा कोई सबूत है जो यह बताता हो कि महिला को मानसिक बीमारी के इलाज के लिए दी जाने वाली दवाओं से पूर्ण अवधि की गर्भावस्था खतरे में पड़ जाएगी।  

विज्ञापन
Supreme Court News Update Today: SC defer for Monday in 26 month pregnancy medical termination
सुप्रीम कोर्ट - फोटो : Social Media

विस्तार

सुप्रीम कोर्ट ने 26 सप्ताह के गर्भ को गिराने की अनुमति मांग रही महिला के मामले में आगे की सुनवाई के लिए 16 अक्तूबर की तारीख तय की है। सोमवार तक के लिए मामले को स्थगित कर दिया गया है। इसके साथ ही अदालत ने एम्स से एक रिपोर्ट मांगी है। दरअसल, शीर्ष अदालत ने एम्स से विभिन्न पहलुओं पर रिपोर्ट देने को कहा है।

विज्ञापन


मानसिक और शारीरिक स्थिति का मूल्यांकन
अदालत ने रिपोर्ट में यह बताने को कहा है कि क्या भ्रूण को कोई बीमारी है? कोर्ट जानना चाहता है कि क्या ऐसा कोई सबूत है जो यह बताता हो कि महिला को मानसिक बीमारी के इलाज के लिए दी जाने वाली दवाओं से पूर्ण अवधि की गर्भावस्था खतरे में पड़ जाएगी। सुप्रीम कोर्ट ने एम्स से महिला की मानसिक और शारीरिक स्थिति का मूल्यांकन करने को कहा। साथ ही भ्रूण की सुरक्षा के लिए कोई दवा उपलब्ध है इसके बारे में भी जानकारी देने को कहा है। 
विज्ञापन


यह भी पढ़ें- Superme Court: 'हम बच्चे को नहीं मार सकते, 26 हफ्ते तक क्या कर रही थीं', गर्भपात की जिद पर CJI की सख्त टिप्पणी

विज्ञापन
विज्ञापन

कोर्ट की दो टूक- बच्चे को नहीं मार सकते
बता दें, 26 सप्ताह की गर्भवती महिला पहले ही दो बच्चों की मां बन चुकी है। अब महिला तीसरी बार बच्चे को जन्म देने वाली है, लेकिन वह बच्चा गिराना चाहती है, लेकिन मेडिकल तरीकों का इस्तेमाल कर गर्भपात की अनुमति लेने पहुंची महिला को सुप्रीम कोर्ट से भी निराशा हाथ लगी है। गर्भ गिराने की अपील पर एक दिन पहले सुप्रीम कोर्ट ने कहा था, हम किसी बच्चे को नहीं मार सकते। कोर्ट के निर्देश पर एम्स के मेडिकल बोर्ड ने कहा था कि बच्चे की जान बचाई जा सकती है।


सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के उल्लंघन पर एनसीएलटी को जांच का आदेश
सुप्रीम कोर्ट ने राष्ट्रीय कंपनी कानून अपीलीय न्यायाधिकरण (एनसीएलएटी) अध्यक्ष को न्यायाधिकरण की एक पीठ की तरफ से शीर्ष अदालत के निर्देशों का पालन नहीं करने पर जांच का आदेश दिया है। साथ ही 16 अक्तूबर को रिपोर्ट भी तलब की है। यह आदेश फिनोलेक्स केबल्स की वार्षिक आम बैठक (एजीएम) और कंपनी प्रबंधन पर नियंत्रण को लेकर प्रकाश छाबड़िया और दीपक छाबड़िया के बीच कानूनी लड़ाई से संबंधित है।

मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) डीवाई चंद्रचूड़ की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय पीठ ने शुक्रवार सुबह एनसीएलएटी इस मामले में जांचकर्ता की रिपोर्ट मिलने के बाद ही बैठक के नतीजे घोषित करने का निर्देश दिया था, जो दोपहर दो बजे अपना फैसला सुनाने वाली थी। लेकिन दो सदस्यीय न्यायाधिकरण ने दो बजे ही अपना फैसला सुना दिया, जबकि जांचकर्ता की रिपोर्ट 2.40 बजे अपलोड हुई। इस बारे में बताए जाने पर पीठ ने इसे शीर्ष अदालत के आदेश का उल्लंघन बताया और एनसीएलएटी के अध्यक्ष को पूरे मामले की जांच करने का निर्देश दिया।

सिंधिया के मामले में सुप्रीम कोर्ट का अहम फैसला

गर्भपात की अनुमति वाले मामले के अलावा सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य एम सिंधिया से जुड़े मामले में भी अहम फैसला लिया। शीर्ष अदालत ने राज्यसभा के लिए चुने गए सिंधिया के निर्वाचन को चुनौती देने वाली याचिका खारिज कर दी। न्यायमूर्ति हृषिकेश रॉय और न्यायमूर्ति संजय करोल की खंडपीठ ने कहा, याचिकाकर्ता की दलीलों में कोई दम नहीं। विवादित आदेशों में हस्तक्षेप का कोई मामला नहीं बनता। बता दें कि मध्य प्रदेश से राज्यसभा के लिए चुने गए ज्योतिरादित्य सिंधिया, केंद्रीय नागरिक उड्डयन और इस्पात मंत्री हैं।

बच्चे को गोद लेने की प्रक्रिया में देरी का मुद्दा; सुप्रीम कोर्ट ने क्या सवाल पूछा

दिन के एक अन्य मामले में सुप्रीम कोर्ट ने बच्चे को गोद लेने को एक ''मानवीय चीज'' करार दिया। अदालत ने कहा, इस प्रक्रिया में ''भारी देरी'' का मुद्दा गंभीर है। अदालत ने कहा कि कई बच्चे बेहतर जीवन की उम्मीद में गोद लेने का इंतजार कर रहे हैं। अगर 20 साल की उम्र के किसी जोड़े को बच्चा गोद लेने के लिए तीन या चार साल तक इंतजार करना पड़ता है, तो माता-पिता के रूप में उनकी स्थिति और गोद लिए जाने वाले बच्चे की स्थिति समय बीतने के साथ बदल सकती है।

सीजेआई चंद्रचूड़ की पीठ में दो याचिकाओं पर सुनवाई
मुख्य न्यायाधीश डी वाई चंद्रचूड़, न्यायमूर्ति जेबी पारदीवाला और न्यायमूर्ति मनोज मिश्रा की पीठ ने कहा, याचिकाकर्ताओं ने कहा है कि गोद लेने की प्रक्रिया रुक गई है। पीठ ने कहा, ''इसमें बहुत देरी हो रही है। पीठ भारत में बच्चे को गोद लेने की कानूनी प्रक्रिया को सरल बनाने की मांग सहित दो याचिकाओं पर सुनवाई कर रही थी।

भारतीय कुश्ती महासंघ (डब्ल्यूएफआई) के केस में SC ने क्या कहा?

पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट ने भारतीय कुश्ती महासंघ (WFI) में चुनाव पर रोक लगा रखी है। चुनाव पर रोक के खिलाफ डब्ल्यूएफआई के एड-हॉक पैनल ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। इस अपील पर उच्चतम न्यायालय ने शुक्रवार को केंद्र और अन्य से जवाब मांगा। बता दें कि एड-हॉक समिति का कठन कुश्ती महासंघ को संचालित करने के लिए किया गया था। न्यायमूर्ति अभय एस ओका और न्यायमूर्ति पंकज मित्तल की पीठ ने केंद्र, हरियाणा कुश्ती संघ, हरियाणा ओलंपिक संघ और अन्य को नोटिस जारी कर तीन नवंबर तक जवाब मांगा है।

29 अगस्त को SC ने हस्तक्षेप से इनकार किया
बता दें कि एड-हॉक पैनल ने चुनावों पर रोक लगाने के उच्च न्यायालय के 25 सितंबर के आदेश के खिलाफ शीर्ष अदालत का रुख किया था। शीर्ष अदालत ने 29 अगस्त को डब्ल्यूएफआई चुनावों पर रोक लगाने वाले उच्च न्यायालय के आदेश में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया था।

न्यायमूर्ति डीसी चौधरी का तबादला मामला, सुप्रीम कोर्ट नहीं करेगा हस्तक्षेप

आर्म्ड फोर्सेस ट्रिब्यूनल (एएफटी) के न्यायाधीश के रूप में न्यायमूर्ति डीसी चौधरी के तबादला मामले में उच्चतम न्यायालय ने कहा है कि कोर्ट आदेश में हस्तक्षेप नहीं करेगा। शीर्ष अदालत ने चंडीगढ़ की क्षेत्रीय पीठ से कोलकाता स्थानांतरित करने के आदेश में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया। मुख्य न्यायाधीश डी वाई चंद्रचूड़ और न्यायमूर्ति जेबी पारदीवाला और न्यायमूर्ति मनोज मिश्रा की पीठ ने कहा, सशस्त्र पीठ के अध्यक्ष के "प्रशासनिक विवेक" पर संदेह करने का कोई कारण नहीं है। एएफटी न्यायाधीश के रूप में जस्टिस डीसी चौधरी बेहद प्रतिष्ठित थे।

कानून मंत्रालय से जुड़ी मांग
एक अन्य अपील में एएफटी बार एसोसिएशन ऑफ चंडीगढ़ ने सुप्रीम कोर्ट से कहा कि केंद्रीय कानून और न्याय मंत्रालय को ट्रिब्यूनल के लिए मूल मंत्रालय बना दिया जाए। इस पर शीर्ष अदालत ने केंद्र से जवाब मांगा। फिलहाल, एएफटी का मूल मंत्रालय रक्षा मंत्रालय (एमओडी) है।

ज्योतिरादित्य के राज्यसभा चुनाव को चुनौती देने वाली याचिका खारिज
सुप्रीम कोर्ट ने केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया के राज्यसभा निर्वाचन को चुनौती देने वाली याचिका शुक्रवार को खारिज कर दी। जस्टिस हृषिकेश रॉय और जस्टिस संजय करोल की पीठ ने कहा कि इस विशेष अनुमति याचिका में हस्तक्षेप का कोई आधार नहीं है। याचिका में सिंधिया के निर्वाचन को चुनौती दी गई थी कि उन्होंने अपने हलफनामे में अपने खिलाफ लंबित एक आपराधिक मामले की जानकारी नहीं दी थी।


जस्टिस डीसी चौधरी के तबादला आदेश में दखल से इन्कार
सुप्रीम कोर्ट ने सशस्त्र बल न्यायाधिकरण (एएफटी) के न्यायिक सदस्य जस्टिस डीसी चौधरी को चंडीगढ़ से कोलकाता पीठ में स्थानांतरित करने के मामले में दखल देने से इन्कार कर दिया। चीफ जस्टिस (सीजेआई) जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ की अध्यक्षता वाली पीठ ने कहा कि तबादले का निर्देश देने के लिए एएफटी चेयरपर्सन की विवेकाधीन शक्तियों पर संदेह करने की कोई वजह नहीं है। हालांकि सीजेआई जस्टिस चंद्रचूड़, जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस मनोज मिश्रा की पीठ ने केंद्रीय रक्षा मंत्रालय (एमओडी) से एएफटी पर नियंत्रण वापस लेने की मांग वाली याचिका पर केंद्र सरकार से 3 सप्ताह में प्रतिक्रिया मांगी। यह याचिका चंडीगढ़ की एएफटी बार एसोसिएशन ने दायर की।

सुप्रीम कोर्ट में सरकार के पक्षकार वाले लंबित मामले 5 साल में ढाई गुना बढ़े
सुप्रीम कोर्ट में पिछले लगभग पांच साल में ऐसे लंबित मामलों की संख्या ढाई गुना बढ़ गई है जिसमें भारत सरकार भी एक पक्ष है। सूचना के अधिकार के तहत विधि मंत्रालय से मिली जानकारी के मुताबिक, 2019 में ऐसे मामलों की संख्या 4,536 थी जो 2023 में बढ़कर 11,414 हो गई है। पुणे स्थित विहार दुर्वे ने आरटीआई के जरिये यह जानकारी मांगी थी। उन्होंने 2019 से 2023 तक हर साल के हिसाब से मामलों की जानकारी मांगी थी, लेकिन विधि मंत्रालय ने कहा कि जिस स्वरूप में जानकारी मांगी गई है उसके मुताबिक उसके पास आंकड़े नहीं है। मंत्रालय ने कहा कि 2019 में भारत सरकार के पक्षकार वाले मामलों की संख्या 4,536 थी। 2020 में 3,341, 2021 में 3,230, 2022 में 6,159 और 2023 में 1414। वहीं, सुप्रीम कोर्ट की वेबसाइट पर शुक्रवार तक उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, शीर्ष अदालत में कुल 79,566 मामले लंबित हैं। इस साल 42,548 मामले दायर किए गए और 41,723 मामलों का निस्तारण भी हुआ। भारत सरकार की तरफ से सुप्रीम कोर्ट में केस लड़ने वाले वकीलों को किए गए भुगतान के संबंध में मांगी गई जानकारी पर विधि मंत्रालय ने कहा कि 2019-20 में 37.96 करोड़ का भुगतान किया गया। 2020-21 में 32.46 करोड़, 2021-22 में 28.78 करोड़ व 2022-23 में 31.76 करोड़ और 2023-24 (12 सितंबर तक) में 19.62 करोड़ रुपये का भुगतान किया गया।  
विज्ञापन
विज्ञापन

रहें हर खबर से अपडेट, डाउनलोड करें Android Hindi News apps, iOS Hindi News apps और Amarujala Hindi News apps अपने मोबाइल पे|
Get all India News in Hindi related to live update of politics, sports, entertainment, technology and education etc. Stay updated with us for all breaking news from India News and more news in Hindi.

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed