SC Updates: बंगाल शिक्षक भर्ती घोटाले में 14 दिन बाद सुनवाई; 26 हजार शिक्षकों की नियुक्ति रद्द का मामला
सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को कहा कि वह शिक्षक भर्ती घोटाले मामले में 14 दिन बाद सुनवाई करेगा। बता दें, बंगाल सरकार ने कलकत्ता हाईकोर्ट के उस फैसले को सर्वोच्च अदालत में चुनौती दी, जिसमें राज्य संचालित और राज्य सहायता प्राप्त स्कूलों में स्कूल सेवा आयोग (एसएससी) द्वारा की गई 25,753 शिक्षकों और गैर-शिक्षण कर्मचारियों की नियुक्ति को अमान्य कर दिया गया है।
शीर्ष अदालत ने कहा कि राज्य सरकार और अन्य की याचिकाओं पर 24 सितंबर को सुनवाई की जाएगी।
तीन सदस्यीय पीठ क्या बोली?
मुख्य न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़ की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय पीठ ने कहा कि मंगलवार को सूचीबद्ध याचिकाओं के समय पर दिन में कुछ अन्य मामलों की सुनवाई की वजह से कार्यवाही नहीं हो पाएगी। पीठ में न्यायमूर्ति जेबी पारदीवाला और न्यायमूर्ति मनोज मिश्रा भी शामिल हैं।
24 को करेंगे सुनवाई
सीजेआई का कहना है कि हम 24 सितंबर को इस मामले में सुनवाई करेंगे। इससे पहले, शीर्ष अदालत ने कहा था कि वह याचिकाओं पर 10 सितंबर को सुनवाई करेगी और पक्षकारों को 16 अगस्त तक याचिकाओं पर अपना जवाब दाखिल करने का अंतिम मौका दिया था।
पीठ ने नोडल वकीलों (राज्य सरकार की तरफ से आस्था शर्मा, शालिनी कौल, पार्थ चटर्जी और शेखर कुमार) से जानकारी को इलेक्ट्रॉनिक प्रारूप में इकट्ठा करें। इन पीडीएफ दस्तावेजमें दोनों पक्षों की तरफ से जिन फैसलों का जिक्र किया गया है उनकी जानकारी होनी चाहिए।
न्यायालय ने उत्तराखंड मेडिकल कॉलेज को एमबीबीएस छात्रों के मूल दस्तावेज लौटाने को कहा
प्रधान न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़ की अध्यक्षता वाली पीठ ने डॉक्टरों की ओर से पेश हुए वरिष्ठ वकील गौरव अग्रवाल और वकील तन्वी दुबे की दलीलों पर गौर किया। वकीलों ने दलील दी थी कि मूल दस्तावेज नहीं होने के कारण ये छात्र न तो एक डॉक्टर के रूप में खुद को पंजीकृत करा पाएंगे और न ही वे उच्च शिक्षा के लिए परीक्षा में बैठ सकेंगे।
पीठ में न्यायमूर्ति जेबी पारदीवाला और न्यायमूर्ति मनोज मिश्रा भी शामिल थे। पीठ ने उत्तराखंड के देहरादून में स्थित श्री गुरु राम राय इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल एंड हेल्थ साइंसेस कॉलेज को 7.5 लाख रुपये के भुगतान पर उन छात्रों को उनके मूल दस्तावेज लौटाने का आदेश दिया जिन्होंने एमबीबीएस की पढ़ाई और अपेक्षित इंटर्नशिप पूरी कर ली है।
शीर्ष अदालत ने सोमवार को कहा कि छात्रों को एक हलफनामा देना होगा कि वे बकाया फीस का भुगतान कर रहे हैं।
मेडिकल कॉलेज ने इससे पहले अखिल भारतीय कोटे के तहत प्रवेश पाने वाले छात्रों के लिए पांच लाख रुपये वार्षिक फीस को बढ़ाकर 13.22 लाख रुपये कर दिया था। कॉलेज ने राज्य कोटा के तहत दाखिला लेने वाले छात्रों के लिए चार लाख रुपये वार्षिक फीस को बढ़ाकर 9.78 लाख रुपये कर दिया था। फीस में बढ़ोत्तरी पूर्वव्यापी प्रभाव से लागू की गई है। अपनी एमीबीबीएस की पढ़ाई और एक साल का इंटर्नशिप पूरा कर चुके छात्रों ने कॉलेज के उस निर्णय की वैधता को चुनौती दी थी, जिसमें उनसे उनके मूल दस्तावेज प्राप्त करने के लिए ‘‘अत्यधिक बकाये’’ का भुगतान करने को कहा गया था।
दुबे ने कहा, ‘बिना वास्तविक दस्तावेज के ये डॉक्टर घर पर बैठने को मजबूर हो जाएंगे। वे न तो नीट-पीजी के काउंसलिंग में हिस्सा ले पाएंगे और न ही वे अस्पताल में अपना प्रशिक्षण शुरू कर पाएंगे।'
पिछले कुछ साल से इस मामले में कई याचिकाएं सामने आई हैं और नैनीताल उच्च न्यायालय में पूर्वप्रभावी फीस वृद्धि के खिलाफ एक याचिका भी लंबित है। वकील ने बताया कि छात्रों ने करीब 38 लाख रुपये का भुगतान करने के आदेश को चुनौती दी थी। छात्रों के वकील ने दलील दी कि यह निर्णय ‘‘मनमाना और उन पर जबरन थोपा गया’’ है, क्योंकि वे पहले ही एक पाठ्यक्रम की पढ़ाई पूरी कर चुके हैं।
वकील ने कहा, ‘'अगर उन्हें पहले से पता होता तो वे उत्तराखंड के कॉलेज को कभी नहीं चुनते क्योंकि उन्हें अपने गृह राज्यों में कम फीस पर कॉलेज मिल रहे थे।’
उच्च न्यायालय ने छात्रों को नौ किस्तों में पूरी राशि का भुगतान करने का निर्देश दिया था। कॉलेज ने एक नोटिस जारी किया था जिसमें कहा गया था कि जब तक भुगतान नहीं किया जाता, इंटर्नशिप शुरू नहीं हो सकती। कॉलेज की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता गोपाल शंकरनारायणन ने कहा कि अक्सर ऐसे परिदृश्य में कॉलेजों के लिए छात्रों के दस्तावेज जारी होने के बाद उनके लंबित बकाए का हिसाब रखना मुश्किल हो जाता है। कुछ छात्र गायब हो जाते हैं और कुछ मामलों में फीस के बकाए के लिए दिए गए चेक बाउंस हो जाते हैं।
न्यायालय का 1991 के मुल्तानी मामले में पूर्व डीजीपी सैनी के खिलाफ नई एफआईआर को रद्द करने से इनकार
उच्चतम न्यायालय ने 1991 में जूनियर इंजीनियर बलवंत सिंह मुल्तानी के गायब होने और उनकी हत्या होने के संबंध में पंजाब के पूर्व पुलिस महानिदेशक सुमेध सिंह सैनी के खिलाफ दर्ज एक नई प्राथमिकी को रद्द करने से मंगलवार को इनकार कर दिया।
न्यायमूर्ति एम एम सुंदरेश और न्यायमूर्ति पंकज मिथल की पीठ ने कहा कि मामले में दाखिल किए जा रहे एक आरोपपत्र के मद्देनजर वह प्राथमिकी में हस्तक्षेप नहीं करना चाहेगी। हालांकि, शीर्ष अदालत ने कहा कि पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय के आठ सितंबर, 2020 के फैसले में दर्ज टिप्पणी और निष्कर्ष निचली अदालत में कार्यवाही के आड़े नहीं आएंगे। सैनी की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता मुकुल रोहतगी ने प्राथमिकी रद्द करने का अनुरोध करते हुए कहा कि यह कथित घटना के कई साल बाद 2020 में राजनीतिक कारणों से दर्ज की गई थी।
उन्होंने कहा कि इस अदालत ने बार-बार सैनी को राहत दी है जो एक सम्मानित अधिकारी रहे हैं और अदालत ने मामले में उन्हें दंडात्मक कार्रवाई से भी संरक्षण प्रदान किया है।
न्यायमूर्ति सुंदरेश ने कहा कि मामले में आरोपपत्र दायर किया जा चुका है, इसलिए वह इस स्तर पर प्राथमिकी को रद्द नहीं कर सकती। पीठ ने कहा कि सैनी निचली अदालत में कार्यवाही का सामना कर सकते हैं और उसे एक उचित मंच पर चुनौती दे सकते हैं।
शीर्ष अदालत ने पांच जनवरी, 2021 को पंजाब सरकार से कहा था कि मामले में सैनी के खिलाफ दर्ज नई प्राथमिकी में दायर आरोपपत्र प्रस्तुत किया जाए। अदालत ने 1991 में मुल्तानी के गायब होने और हत्या होने के मामले में दर्ज नई प्राथमिकी में सैनी को पहले ही अग्रिम जमानत दे दी थी। 1991 की घटना के सिलसिले में दर्ज नए मामले में सैनी को तीन दिसंबर, 2020 को अग्रिम जमानत दी थी। उसने 33 वर्ष पुराने मामले में सैनी को गिरफ्तारी पूर्व जमानत देने से इनकार करने के पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय के एक आदेश को रद्द कर दिया था।
शीर्ष अदालत ने कहा था कि वर्तमान मामले में प्राथमिकी दर्ज करने में लंबी देरी अग्रिम जमानत देने का वैध कारण हो सकती है।
न्यायमूर्ति गौरी, चार अन्य को स्थायी न्यायाधीश नियुक्त करने की सिफारिश
सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम ने मद्रास हाईकोर्ट के स्थायी न्यायाधीश के तौर पर जस्टिस लक्ष्मण चंद्र विक्टोरिया गौरी और चार अन्य अतिरिक्त न्यायाधीशों के नामों की मंगलवार को सिफारिश की। पिछले साल न्यायमूर्ति गौरी की उच्च न्यायालय की अतिरिक्त न्यायाधीश के रूप में नियुक्ति को लेकर विवाद उत्पन्न हो गया था। अतिरिक्त न्यायाधीश के रूप में उनकी नियुक्ति से पहले, बार के कई सदस्यों ने भारत के प्रधान न्यायाधीश को पत्र लिखकर उनके कथित नफरती भाषणों और भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) से जुड़ाव की बात कही थी।