Supreme Court: सीजेआई की अदालत में ऑडियो में आई दिक्कत, लालू यादव से जुड़ी याचिका पर 25 अगस्त को होगी सुनवाई
भारत के मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) डी वाई चंद्रचूड़ अपनी अदालत में शुक्रवार को कुछ मामलों की सुनवाई कर रहे थे, तो उसी दौरान ऑडियो में दिक्कत आ गई।
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उन्होंने आगे कहा कि इस समस्या को बाद में सुप्रीम कोर्ट की तकनीकी टीम ने सुलझा लिया। हालांकि व्यवधानों के कारण, कई वकील, वादी और पत्रकार कुछ समय के लिए सीजेआई की अदालत के समक्ष न्यायिक कार्यवाही में उपस्थित होने या देखने में असमर्थ रहे। शीर्ष अदालत ने भौतिक सुनवाई के अलावा वकीलों और अन्य लोगों को वीडियो कांफ्रेंसिंग के माध्यम से अदालती कार्यवाही में भाग लेने की अनुमति दी है।
सुप्रीम कोर्ट ने अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई की मांग वाली याचिका खारिज
सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को अदालत के निर्देश के बावजूद एक मामले को सूचीबद्ध नहीं करने के लिए अपने अधिकारियों के खिलाफ अवमानना याचिका दायर करने के लिए एक वकील को कड़ी फटकार लगाई और इसे रजिस्ट्री को धमकाने" का प्रयास और कानून की प्रक्रिया का दुरुपयोग बताया। न्यायमूर्ति बी आर गवई और न्यायमूर्ति प्रशांत कुमार मिश्रा की पीठ ने कहा कि केवल इसलिए कि कोई मामला अदालत द्वारा तय तारीख पर सूचीबद्ध नहीं किया गया है, महासचिव और रजिस्ट्रार (सूचीकरण) के खिलाफ अवमाननाकार्यवाही शुरू करने का आधार नहीं हो सकता है।
पीठ ने याचिका खारिज करते हुए कहा कि वर्तमान अवमानना याचिका और कुछ नहीं बल्कि कानून की प्रक्रिया का दुरुपयोग है... कुछ कठिनाइयां हैं जिनके कारण मामलों को सूचीबद्ध नहीं किया जा सकता है। आगे वकील को फटकार लगाते हुए पीठ ने कहा कि वकील अवमाननायाचिका के बजाय सुप्रीम कोर्ट के प्रशासनिक पक्ष के समक्ष शिकायत दायर कर सकते थे।
सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन (एससीबीए) के अध्यक्ष आदीश अग्रवाल, जो एक अन्य मामले में अदालत में मौजूद थे, द्वारा मांगी गई बिना शर्त माफी पर ध्यान देने के बाद शीर्ष अदालत ने वकील पर जुर्माना लगाने से रोक दिया।
उमर खालिद की याचिका पर सुनवाई दो हफ्ते के लिए स्थगित
सुप्रीम कोर्ट ने फरवरी 2020 के पूर्वोत्तर दिल्ली दंगों के पीछे की साजिश में कथित संलिप्तता को लेकर आतंकवाद विरोधी कानून यूएपीए के तहत दर्ज मामले में जमानत की मांग करने वाली पूर्व जेएनयू छात्र उमर खालिद की याचिका पर सुनवाई शुक्रवार को दो सप्ताह के लिए स्थगित कर दी। न्यायमूर्ति अनिरुद्ध बोस और न्यायमूर्ति बेला एम त्रिवेदी की पीठ ने कहा कि मामले की सुनवाई गैर-विविध दिन पर करने की जरूरत है। शीर्ष अदालत में मंगलवार, बुधवार और गुरुवार गैर-विविध दिन हैं जब विस्तृत सुनवाई की आवश्यकता वाले मामलों पर सुनवाई की जाती है।
खालिद की ओर से पेश वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल ने सुझाव पर सहमति जताई। सुप्रीम कोर्ट के जज जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा ने 9 अगस्त को खालिद की याचिका पर सुनवाई से खुद को अलग कर लिया था।
सुप्रीम कोर्ट ने हवाईअड्डों से जुड़ा आदेश लिया वापस
सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को अपने 10 अप्रैल के फैसले को वापस ले लिया, जिसमें उसने कहा था कि अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डों पर आगमन और प्रस्थान टर्मिनलों पर शुल्क मुक्त दुकानें सीमा शुल्क कानून के दायरे से बाहर हैं और उन पर सेवा कर जैसे अप्रत्यक्ष कर नहीं लगाए जा सकते।
मुख्य न्यायाधीश डी वाई चंद्रचूड़ और न्यायमूर्ति जे बी पारदीवाला और न्यायमूर्ति मनोज मिश्रा की एक विशेष पीठ ने केंद्र और केंद्रीय माल एवं सेवा कर (सीजीएसटी) और मुंबई पूर्व के केंद्रीय उत्पाद शुल्क आयुक्त की ओर से पेश अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल एन वेंकटरमण की बात सुनी और इस मुद्दे पर शीर्ष अदालत की दो-न्यायाधीशों की पीठ के 10 अप्रैल के फैसले के खिलाफ उनकी समीक्षा याचिका को स्वीकार कर लिया।
आदेश को वापस लेते हुए, पीठ ने कानून अधिकारी के इस तर्क पर सहमति व्यक्त की कि यह न्याय के सिद्धांत का उल्लंघन था क्योंकि सरकारी विभाग को सुनवाई की अनुमति नहीं दी गई थी।
लालू यादव से जुड़ी याचिका पर सुप्रीम कोर्ट 25 अगस्त को सुनवाई करेगा
राष्ट्रीय जनता जल (राजद) सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव के लिए एक नई मुसीबत में आ खड़ी हुई है। सुप्रीम कोर्ट शुक्रवार को डोरंडा कोषागार मामले (चारा घोटाला) में उन्हें दी गई जमानत को रद्द करने की मांग करने वाली सीबीआई की याचिका पर सुनवाई करने के लिए सहमत हो गया, जिसमें उन्हें पांच की सजा सुनाई गई है।
मुख्य न्यायाधीश डी वाई चंद्रचूड़ और न्यायमूर्ति जे बी पारदीवाला और न्यायमूर्ति मनोज मिश्रा की पीठ ने अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल एस वी राजू की दलीलों पर ध्यान दिया, जिन्होंने तत्काल सुनवाई की मांग करते हुए मामले का उल्लेख किया था। शीर्ष अदालत ने मामले की सुनवाई 25 अगस्त को तय की है। उच्च न्यायालय ने 22 अप्रैल, 2022 को डोरंडा कोषागार गबन मामले में 75 वर्षीय यादव को जमानत दे दी थी।
सुप्रीम कोर्ट ने सीबीआई से छह महीने जेल की सजा पाए भारतीय-अमेरिकी शख्स का पता ढूंढने को कहा
सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को सीबीआई से एक शख्स का पता ढूंढने को कहा, जो 2004 से संयुक्त राज्य अमेरिका का निवासी है और शीर्ष अदालत ने उसे उसके "अपमानजनक आचरण" के लिए छह महीने जेल की सजा सुनाई थी। सुप्रीम कोर्ट ने इस साल 16 मई को उस व्यक्ति को छह महीने जेल की सजा सुनाई थी और केंद्र सरकार एवं केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) को निर्देश दिया था कि वह भारत में उसकी उपस्थिति सुनिश्चित करने के लिए सभी संभव कदम उठाए ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि वह सजा भुगते और उस पर लगाया गया 25 लाख रुपये का जुर्माना अदा करे।
शीर्ष अदालत ने जनवरी में उस व्यक्ति को अदालत के आदेश के अनुसार अपने बेटे को भारत वापस लाने में विफलता के लिए अवमानना का दोषी ठहराया था। न्यायमूर्ति संजय किशन कौल और न्यायमूर्ति अभय एस ओका की पीठ के समक्ष शुक्रवार को सुनवाई के दौरान सीबीआई का प्रतिनिधित्व करने वाले वकील ने कहा कि उस व्यक्ति द्वारा दिया गया पता गलत पाया गया। सीबीआई के वकील ने कहा कि वह व्यक्ति एक अमेरिकी नागरिक है और जांच एजेंसी को उसे वापस लाने के लिए वहां के संबंधित अधिकारियों से सहायता लेनी होगी।
पीठ ने कहा, सीबीआई के वकील का कहना है कि प्रतिवादी (अमेरिकी नागरिक) द्वारा दिया गया पता भी गलत है। हालांकि वे भारतीय अदालत में कदम उठा रहे हैं, लेकिन अंततः उन्हें पता ढूंढना ही होगा। आदेश में कहा गया है कि अगर सीबीआई अमेरिका में अपने समकक्षों के साथ बातचीत करेगी और यह देखते हुए कि उसने पहले ही अमेरिकी अदालत में कुछ कार्यवाही दायर कर दी है, तो उसका पता प्राप्त करना इतना कठिन काम नहीं होना चाहिए। पीठ ने कहा, सीबीआई उसका पता हासिल करने के लिए अमेरिका में उसके जो भी संपर्क हैं, उनका भी सहारा ले सकती है। शीर्ष अदालत ने कहा कि न तो व्यक्ति खुद उसके समक्ष उपस्थित हुआ और न ही उसका वकील सुनवाई के लिए उपस्थित हुआ।
जब सीबीआई के वकील ने कहा कि उस व्यक्ति द्वारा दिया गया पता गलत है, तो पीठ ने कहा कि उसका पता लगाना होगा। पीठ ने कहा, आखिरकार आपको प्रत्यर्पण शुरू करना होगा। साथ ही, आपको कुछ पूछताछ करनी होगी... कम से कम उसका पता ढूंढने का प्रयास करना होगा। पीठ ने मामले की अगली सुनवाई नौ अक्टूबर तय की।
16-18 की उम्र में सहमति से यौन संबंध बनाने को अपराधमुक्त करने की मांग पर केंद्र को नोटिस
सुप्रीम कोर्ट ने सहमति से यौन संबंध बनाने पर 16 से 18 वर्ष के किशोरों के खिलाफ अक्सर लागू किए जाने वाले वैधानिक दुष्कर्म संबंधी कानून को अपराध की श्रेणी से बाहर करने की मांग वाली जनहित याचिका पर केंद्र को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है।
सीजेआई जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़, जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस मनोज मिश्रा की पीठ ने वकील हर्ष विभोर सिंघल की ओर से दाखिल जनहित याचिका पर गौर किया। पीठ ने केंद्रीय कानून एवं न्याय मंत्रालय, गृह मंत्रालय और राष्ट्रीय महिला आयोग समेत कुछ अन्य वैधानिक निकायों को नोटिस जारी किया है।
जनहित याचिका में वैधानिक दुष्कर्म कानूनों की वैधता को चुनौती दी गई है, जो 16 वर्ष से अधिक और 18 वर्ष से कम उम्र के किशोरों के बीच सहमति से यौन संबंध को इस आधार पर अपराध घोषित करते हैं कि ऐसे कृत्यों के लिए उनकी सहमति वैधानिक रूप से अमान्य है।
सिस्टम में ढांचागत समस्याओं के कारण लंबित हैं मामले: पूर्व जस्टिस चेलमेश्वर
सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज जे चेलमेश्वर ने शुक्रवार को कहा कि अदालत की छुट्टियों का मामलों के लंबित होने से कोई लेना-देना नहीं है और सिस्टम में अधिक संरचनात्मक समस्याएं हैं जो इसका कारण बन रही हैं। वह दक्षिण गोवा में इंडिया इंटरनेशनल यूनिवर्सिटी ऑफ लीगल एजुकेशन एंड रिसर्च (आईआईयूएलईआर) में विद्यार्थियों से बातचीत कर रहे थे।
जस्टिस चेलमेश्वर ने कहा, शीर्ष अदालत औसतन हर सप्ताह लगभग 50 से 60 जमानत याचिकाओं पर सुनवाई करती है। क्या यह सचमुच जरूरी है कि देश की सर्वोच्च अदालत ही जमानत अर्जियों पर सुनवाई करें? हाईकोर्ट अंतिम अदालत क्यों नहीं हो सकते? उन्होंने कहा, 1950 से पहले, हाईकोर्ट अंतिम अदालतें थीं, बहुत कम मामले तत्कालीन प्रिवी काउंसिल में जाते थे। जमानत आवेदन जैसे अंतरिम विविध आवेदन कभी भी प्रिवी काउंसिल में नहीं जाते थे। उन्होंने पूछा, अब सुप्रीम कोर्ट सबसे पहले यह कवायद क्यों करता है। पूर्व जज ने कहा, यदि हाईकोर्ट के फैसले में कुछ गलत है, तो गलत आदेश पारित करने वाले जज से निपटने के लिए एक बेहतर तरीका खोजा जाना चाहिए।