SC: 'केरल के राज्यपाल और मुख्यमंत्री साथ बैठकर निकालें हल', लंबित विधेयकों पर सुप्रीम कोर्ट
सुनवाई के दौरान शीर्ष अदालत ने इस बात पर गौर किया कि कार्यवाहियों के बाद राज्यपाल खान ने एक विधेयक पर सहमति दे दी है। जबकि अन्य सात विधेयकों को राष्ट्रपति की मंजूरी के लिए सुरक्षित रखा है।
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सुप्रीम कोर्ट केरल सरकार की उस याचिका पर विचार कर रहा है, जिसमें राजभवन पर विधेयकों को मंजूरी देने में अत्यधिक देरी का आरोप लगाया गया है। सर्वोच्च न्यायालय ने बुधवार को केरल के राज्यपाल आरिफ मोहम्मद खान को फटकार लगाई और कहा कि पंजाब के मामले में पहले ही बताया जा चुका है कि राज्यपाल की शक्ति का इस्तेमाल विधायिका के कानून बनाने की प्रक्रिया को रोकने के लिए नहीं किया जा सकता।
सुनवाई के दौरान शीर्ष अदालत ने इस बात पर गौर किया कि कार्यवाहियों के बाद राज्यपाल खान ने आठ विधेयकों पर निर्णय लिया है। साथ ही अदालत ने उन्हें विधेयकों पर चर्चा करने के लिए संबंधित मंत्री के साथ मुख्यमंत्री पिनाराई विजयन से मिलने के लिए कहा है।
प्रधान न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़ की अध्यक्षता वाली पीठ ने राज्यपाल के कार्यालय की ओर से पेश अटॉर्नी जनरल आर वेंकटरमणी की इस दलील पर गौर किया कि आठ विधेयकों में से सात को राष्ट्रपति के विचार के लिए सुरक्षित'' रखा गया है जबकि एक को खान ने मंजूरी दे दी है।
इस बीच, शीर्ष अदालत ने राज्य सरकार को अपनी याचिका में संशोधन करने की अनुमति दे दी ताकि समयबद्ध तरीके से विधानसभा द्वारा पारित विधेयकों को मंजूरी देने या अस्वीकार करने पर राज्यपालों के लिए दिशानिर्देश जारी करने की मांग की जा सके। साथ ही पीठ ने कहा कि हम इस बात को रिकॉर्ड पर रखेंगे कि राज्यपाल मुख्यमंत्री और प्रभारी मंत्री दोनों के साथ विधेयक से संबंधित मामले पर चर्चा करेंगे।'
मुख्य सचिव का कार्यकाल बढ़ाने का सरकार के पास अधिकार: केंद्र
केंद्र सरकार दिल्ली के वर्तमान मुख्य सचिव नरेश कुमार का कार्यकाल बढ़ाना चाहती है। इसके लिए उसने सुप्रीम कोर्ट के सामने अपनी बात रखी। सरकार ने कोर्ट को बताया कि उसके पास मुख्य सचिव का कार्यकाल छह महीने के लिए बढ़ाने का अधिकार है। सरकार ने कहा कि पहले भी कई मुख्य सचिवों का कार्यकाल बढ़ाया जा चुका है। इसके 57 उदाहरण हैं।
केंद्र का प्रतिनिधित्व कर रहे सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि दिल्ली देश की राजधानी है और केंद्र सरकार का विचार है कि नरेश कुमार, जो 30 नवंबर को सेवानिवृत्त होने वाले हैं, को छह महीने तक पद पर बने रहना चाहिए।
महाराष्ट्र सरकार को गाडलिंग की जमानत अर्जी पर जवाब देने के लिए समय दिया
उच्चतम न्यायालय ने महाराष्ट्र सरकार को 2016 के सुरजागढ़ लौह अयस्क खदान आगजनी मामले में वकील सुरेंद्र गाडलिंग की जमानत अर्जी पर जवाब दाखिल करने के लिए बुधवार को एक और सप्ताह का समय दिया।
न्यायमूर्ति अनिरुद्ध बोस और न्यायमूर्ति ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की पीठ ने राज्य सरकार को समय दिया। सरकार के वकील ने समय देने का अनुरोध करते हुए कहा था कि मामले में भारी-भरकम रिकॉर्ड हैं। मामले में सुनवाई दो सप्ताह बाद के लिए तय की गई है।
खालिद की जमानत याचिका पर सुनवाई 10 जनवरी तक स्थगित
उच्चतम न्यायालय ने आतंकवाद रोधी कानून यूएपीए के तहत दर्ज एक मामले में बुधवार को जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) के पूर्व छात्र उमर खालिद की जमानत याचिका पर सुनवाई 10 जनवरी तक स्थगित कर दी। फरवरी 2020 में उत्तर पूर्व दिल्ली में हुए दंगे की साजिश में संलिप्तता के आरोप में खालिद के खिलाफ यह मामला दर्ज किया गया है।
खालिद की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल और अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल एस. वी. राजू के उपस्थिति नहीं रहने के कारण न्यायमूर्ति बेला एम. त्रिवेदी और न्यायमूर्ति सतीश चंद्र शर्मा ने मामला स्थगित कर दिया। पीठ ने कहा कि मामले में दलील देने वाले वरिष्ठ वकीलों की अनुपस्थिति के कारण याचिकाकर्ता और भारत संघ की ओर से संयुक्त अनुरोध किया गया है। मामले को 10 जनवरी को सुनवाई के लिए सूचीबद्ध करें। इस बीच मामले में पैरवी पूरी की जाए।
इस मामले को यूएपीए के विभिन्न प्रावधानों को चुनौती देने वाली याचिकाओं के साथ सूचीबद्ध किया गया था। उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश प्रशांत कुमार मिश्रा ने नौ अगस्त को खालिद की याचिका पर सुनवाई से खुद को अलग कर लिया था।
मामले में खालिद की जमानत याचिका खारिज करने वाले दिल्ली उच्च न्यायालय के 18 अक्टूबर, 2022 के आदेश को चुनौती देने वाली खालिद की याचिका न्यायमूर्ति ए. एस. बोपन्ना और मिश्रा की पीठ के समक्ष सुनवाई के लिए आई थी। उच्च न्यायालय ने खालिद की जमानत याचिका यह कहते हुए खारिज कर दी थी कि वह अन्य सह-अभियुक्तों के साथ लगातार संपर्क में थे और उनके खिलाफ आरोप प्रथम दृष्टया सही थे।
फरवरी 2020 के दंगों का मुख्य साजिशकर्ता होने के आरोप में खालिद, शरजिल इमाम और कई अन्य के खिलाफ आतंकवादी रोधी यूएपीए और भारतीय दंड संहिता के कई प्रावधानों के तहत मामला दर्ज किया गया था। इस दंगे में 53 लोगों की मौत हो गई थी और 700 से अधिक लोग घायल हुए थे।
नफरती भाषण के मामले में सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि वह देशभर में नफरती भाषणों के एक एक व्यक्तिगत मामलों से नहीं निपट सकता। ऐसा करने से इन मामलों की बाढ़ आ जाएगी। शीर्ष अदालत ने कहा कि वह देशभर में नफरती भाषणों के मामलों से निपटने के लिए एक प्रशासनिक तंत्र स्थापित करने पर विचार कर रहा है।
जस्टिस संजीव खन्ना और जस्टिस एसवीएन भट्टी की पीठ ने कहा, नफरत फैलाने वाले भाषण को अदालत ने परिभाषित किया है और सवाल कार्यान्वयन और समझने का है कि इसे कैसे लागू किया जाए। हम व्यक्तिगत पहलुओं से नहीं निपट सकते। यदि हम व्यक्तिगत मामलों से निपटना शुरू करते हैं, तो इससे मामलों की बाढ़ आ जाएगी। हम बुनियादी ढांचा या प्रशासनिक मशीनरी स्थापित करना चाहते हैं। यदि इसमें कोई उल्लंघन होता है तो आप संबंधित हाईकोर्ट से संपर्क कर सकते हैं। पीठ ने कहा, हम देश भर के मामलों को नहीं ले सकते क्योंकि हमारे लिए इसे संभालना असंभव होगा। भारत जैसे बड़े देश में, समस्याएं तो होंगी लेकिन सवाल यह है कि क्या हमारे पास जरूरत पड़ने पर कार्रवाई करने के लिए पर्याप्त प्रशासनिक तंत्र है। समाज को पता होना चाहिए कि यदि आप इसमें शामिल होंगे तो कुछ राज्य कार्रवाई होगी।
सीजेआई की अदालत में पहुंचे नेपाल के चीफ जस्टिस ने देखी सुप्रीम कोर्ट की कार्यवाही
नेपाल के चीफ जस्टिस बिशोम्भर प्रसाद श्रेष्ठ और नेपाल के जज जस्टिस हरि प्रसाद फुयाल बुधवार को सीजेआई जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ की अदालत में बैठे और कार्यवाही देखी। सीजेआई ने नेपाल के जजों का स्वागत किया।
सीजेआई ने कहा, मैं हमारी पीठ में दो बहुत प्रतिष्ठित जजों का स्वागत करता हूं। बार में हमारे सभी सहयोगियों के लिए दिलचस्पी की एक बात यह होगी कि जस्टिस हरि प्रसाद नेपाल के सुप्रीम कोर्ट की पीठ में नियुक्ति से पहले अटॉर्नी जनरल थे। सीजेआई ने कहा, मैं अभी जस्टिस पीएस नरसिम्हा और जस्टिस केवी विश्वनाथन से कह रहा था कि वे उनके साथ एक विशेष तालमेल स्थापित करेंगे। हम जल्द ही एक इंडो नेपाल एक्सचेंज कार्यक्रम भी शुरू करेंगे और जल्द ही नेपाल के बार से प्रतिनिधिमंडलों को आमंत्रित करेंगे।
जयप्रदा को ईएसआईसी मामले में तय समय के अंदर आत्मसमर्पण करने से छूट
सुप्रीम कोर्ट ने अभिनेत्री और पूर्व लोकसभा सांसद जयाप्रदा को कर्मचारी राज्य बीमा निगम (ईएसआईसी) मामले में समय के भीतर आत्मसमर्पण करने से छूट दे दी है। जयप्रदा को उनके स्वामित्व वाले एक सिनेमा थिएटर के लिए कर्मचारी राज्य बीमा निगम (ईएसआईसी) का 18 साल से अधिक समय तक बकाया भुगतान नहीं करने पर छह महीने की साधारण कैद की सजा सुनाई गई थी। जस्टिस एसवीएन भट्टी की एकल पीठ ने चैंबर कार्यवाही में अभिनेत्री और मामले के अन्य सह-अभियुक्तों को उनके खिलाफ जारी गैर-जमानती वारंट को रद्द करने के लिए ट्रायल कोर्ट से संपर्क करने को भी कहा। पीठ ने फैसला सुनाते हुए कहा, समय के भीतर आत्मसमर्पण करने से छूट की मांग करने वाले आवेदन की अनुमति है।
जयाप्रदा सिनेमा थिएटर की पार्टनर जयाप्रदा को एग्मोर में मेट्रोपॉलिटन मजिस्ट्रेट की अदालत ने छह महीने की कैद की सजा सुनाई थी। यह फैसला थिएटर के कर्मचारियों की शिकायत पर सुनाया गया था कि अभिनेत्री ने उनके ईएसआई योगदान का भुगतान नहीं किया है। पिछले 10 वर्षों से बंद पड़े थिएटर के कर्मचारियों ने कहा कि प्रबंधन उनका ईएसआई योगदान काट रहा है, लेकिन राज्य बीमा निगम को पैसा जमा नहीं कर रहा है।