'एआई कानून नहीं बना सकता': सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस विक्रम नाथ बोले- इसे उपकरण की तरह इस्तेमाल किया जाना चाहिए
सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस विक्रम नाथ ने कहा कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) कानूनी काम को आसान बना सकता है, लेकिन यह वकील की समझ और जज के निर्णय की जगह नहीं ले सकता। उन्होंने चेतावनी दी कि एआई केवल एक उपकरण है, इसे कानून गढ़ने की अनुमति नहीं दी जा सकती।
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शनिवार को एक सम्मेलन को संबोधित करते हुए सुप्रीम कोर्ट के जज जस्टिस विक्रम नाथ ने आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) के बढ़ते इस्तेमाल पर महत्वपूर्ण टिप्पणी की। उन्होंने कहा कि अगर एआई का समझदारी से उपयोग किया जाए तो यह कानूनी कामकाज को आसान बना सकता है और समय बचा सकता है, लेकिन यह किसी भी हालत में वकील की समझ, अदालत के अधिकारी की नैतिक जिम्मेदारी या जज के संतुलित निर्णय की जगह नहीं ले सकता।
जस्टिस नाथ ने कहा कि तकनीक केवल एक उपकरण है और इसे उपकरण की तरह ही इस्तेमाल किया जाना चाहिए। उन्होंने चेतावनी देते हुए कहा कि एआई नोट या ड्राफ्ट तैयार करने में मदद कर सकता है, लेकिन उसे कानून बनाने या गढ़ने की अनुमति नहीं दी जा सकती।
न्यायाधीश ने हाल के घटनाओं का दिया उदाहरण
उन्होंने यह भी कहा कि हाल के समय में ऐसी घटनाएं सामने आई हैं जब एआई से तैयार सामग्री को बिना जांचे-परखे अदालत में पेश कर दिया गया। यहां तक कि सुप्रीम कोर्ट में भी ऐसे उदाहरण मिले हैं, जहां ऐसी कानूनी मिसालों और फैसलों का हवाला दिया गया जो वास्तव में मौजूद ही नहीं हैं। जस्टिस नाथ के अनुसार, गलत या झूठे संदर्भ देना केवल तकनीकी गलती नहीं है, बल्कि इससे कानूनी प्रक्रिया की विश्वसनीयता और न्यायिक व्यवस्था की गरिमा पर असर पड़ता है।
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एआई का गलत इस्तेमाल चिंता का विषय
उन्होंने कहा कि एआई का गलत इस्तेमाल एक गंभीर चिंता का विषय है। लेकिन इसका यह मतलब भी नहीं है कि न्यायिक व्यवस्था पूरी तरह से तकनीक से दूरी बना ले। सही रास्ता यह है कि एआई का इस्तेमाल समझदारी, नैतिक जिम्मेदारी और पेशेवर मानकों के साथ किया जाए। लोगों को यह सीखना होगा कि इन तकनीकी उपकरणों का उपयोग सावधानी से करें और उनकी सीमाओं को भी समझें।
जस्टिस नाथ ने कहा कि नई तकनीकें कई तरह की सुविधाएं लेकर आती हैं। इससे न्याय तक लोगों की पहुंच बढ़ सकती है और कामकाज में पारदर्शिता भी आ सकती है। लेकिन इसके साथ यह खतरा भी रहता है कि इससे असमानता बढ़ सकती है या तथ्यों को तोड़-मरोड़कर पेश किया जा सकता है।
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न्यायाधीश ने फायदे और नुकसान, दोनों पर दिया जोर
इस दौरान जस्टिस नाथ ने इस बात पर भी जोर दिया कि आधुनिक तकनीकें एक तरफ कानूनी कामकाज में मदद कर सकती हैं और अपराध से निपटने में सहायक हो सकती हैं, वहीं दूसरी तरफ इन्हीं तकनीकों का इस्तेमाल करके नए तरह के अपराध भी किए जा सकते हैं। यही आज के समय की सबसे बड़ी विडंबना है। जस्टिस नाथ के अनुसार, इस चुनौती का सामना करने के लिए संस्थाओं को समझदारी से काम लेना होगा। उन्होंने कहा कि तकनीक को केवल इसलिए नहीं ठुकराना चाहिए क्योंकि वह नई है, और न ही उसे केवल इसलिए आंख बंद करके स्वीकार करना चाहिए क्योंकि वह तेज और सुविधाजनक है।
जस्टिस नाथ ने कहा कि अंततः कानून का शासन इस बात पर निर्भर नहीं करता कि हम कितनी उन्नत तकनीक का इस्तेमाल कर रहे हैं, बल्कि इस बात पर निर्भर करता है कि हमारी संस्थाएं कितनी मजबूत हैं और उनमें काम करने वाले लोग कितनी ईमानदारी और जिम्मेदारी से अपने कर्तव्यों का पालन करते हैं। बता दें कि इस कार्यक्रम में सुप्रीम कोर्ट के जज जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा और तेलंगाना हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस अपरेश कुमार सिंह ने भी अपने विचार रखे।
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