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सुप्रीम कोर्ट के जज ने उठाए सवाल, पूछा- लॉ एंट्रेंस की परीक्षा अंग्रेजी माध्यम में ही क्यों
Fri, 16 Apr 2021 09:18 AM IST
देव कश्यप
अमर उजाला ब्यूरो, नई दिल्ली
अमर उजाला ब्यूरो, नई दिल्ली
Published by: देव कश्यप
Updated Fri, 16 Apr 2021 09:18 AM IST
सार
- जस्टिस चंद्रचूड़ ने कहा है कि लॉ स्कूलों में दाखिले की प्रक्रिया से ही भेदभाव शुरू हो जाता है
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प्रतीकात्मक तस्वीर
- फोटो : अमर उजाला
विस्तार
सुप्रीम कोर्ट के जज जस्टिस डी वाई चंद्रचूड़ ने यह सवाल उठाया है कि आखिर लॉ एंट्रेंस की परीक्षा अंग्रेजी माध्यम में ही क्यों आयोजित होती है। उन्होंने कहा है कि क्यों नहीं यह परीक्षा क्षेत्रीय भाषाओं में होनी चाहिए?
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जस्टिस चंद्रचूड़ ने कहा है कि लॉ स्कूलों में दाखिले की प्रक्रिया से ही भेदभाव शुरू हो जाता है। अधिकतर टॉप लॉ स्कूल, जो पांच वर्षीय डिग्री कोर्स कराते हैं, उनकी प्रवेश परीक्षा सिर्फ अंग्रेजी में होती है, जबकि अंग्रेजी परीक्षा का एक अलग हिस्सा भी होता है।
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जस्टिस चंद्रचूड़ ने कहा है कि यह कहा जाता है कि विशिष्ट छात्रों को ही उच्च स्तरीय अंग्रेजी माध्यम की शिक्षा नसीब होती है। वहीं वंचित समुदाय के छात्र जिनकी शिक्षा राष्ट्रीय या क्षेत्रीय भाषाओं में हुई हो और जो न्यायिक सेवा में जाना चाहते हो, वे इन संस्थानों में पढ़ने से महरूम रह जाते हैं।
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जस्टिस चंद्रचूड़ ने यह बातें वर्चुअल माध्यम से आयोजित एक कार्यक्रम के दौरान कही। जस्टिस चंद्रचूड़ ने यह भी कहा कि अगर छात्र इस परीक्षा में सफल भी हो जाते हैं तो उन्हें लॉ स्कूल चुनने में भी परेशानी होती है। उन्हें लॉ कॉलेज चुनने में समझौता करना होता है। उन्होंने यह भी कहा कि इस वजह से दलित, आदिवासी और हासिए पर रह रहे समुदाय के छात्र अक्सर खुद को शिक्षा के स्तर में पिछड़ा महसूस करते हैं।
इतना ही नहीं, वाद विवाद प्रतियोगिता, इंटर्नशिप आदि गतिविधियों में भी वे पिछड़ जाते हैं। जस्टिस चंद्रचूड़ ने यह भी कहा कि टॉप लॉ स्कूल खर्चीले होते हैं। इन संस्थानों में ऋण आधारित छात्रवृत्ति भी पर्याप्त नहीं होती है। उन्होंने कहा कि 18 वर्ष की उम्र में परीक्षा देने से ही भेदभाव शुरू हो जाता है।