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वकीलों की फीस की सीमा तय करने के पक्ष में है सुप्रीम कोर्ट
राजीव सिन्हा / नई दिल्ली
Updated Wed, 06 Dec 2017 08:25 AM IST
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सुप्रीम कोर्ट ने पाया है कि वकीलों की ऊंची फीस गरीबों के न्याय हासिल करने में बाधक बन रही है। इसके मद्देनजर शीर्ष अदालत ने वकीलों की फीस की अधिकतम सीमा तय करने को कानून बनाने की धारणा का स्वागत किया है।
जस्टिस आदर्श कुमार गोयल और जस्टिस यूयू ललित की पीठ ने विधि आयोग की रिपोर्ट का हवाला देते हुए कहा कि कुछ वरिष्ठ वकीलों की फीस बहुत अधिक है। कॉरपोरेट सेक्टर तो ऐसे वकीलों से पैरवी कराने में सक्षम है, लेकिन गरीब ऐसा कर पाने में असमर्थ हैं। पीठ ने कहा कि वकीलों को संविधान के अनुच्छेद-39ए के तहत अपने कर्तव्य को सदैव याद रखना चाहिए। अनुच्छेद-39ए सभी नागरिकों के लिए न्याय तक समान पहुंच की बात करता है।
सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने कहा कि आयोग ने महसूस किया था कि संसद का दायित्व है कि वह कानूनी पेशे से जुड़े सदस्यों के लिए उनकी सेवाओं की फीस निर्धारित करे। पीठ ने कहा कि पहला कदम न्यूनतम और अधिकतम फीस तय करने को लेकर होना चाहिए। पीड़ित लोगों के अधिकारों का संरक्षण किया जाना चाहिए। उन्हें कम खर्च में न्याय दिलाने की कोशिश होनी चाहिए। पीठ ने इस बात पर दुख व्यक्त किया कि वर्ष 1998 में विधि आयोग ने अपनी रिपोर्ट में फीस निर्धारित करने का सुझाव दिया था, लेकिन अब तक कोई प्रभावी कानून नहीं है। पीठ ने कहा कि सरकार की संबंधित अथॉरिटी को कानून में बदलाव लाकर पेशेवर नैतिकता के उल्लंघन पर रोक लगाने का प्रयास करना चाहिए।
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शीर्ष अदालत ने ये टिप्पणी एक महिला की याचिका पर की। महिला ने दावा किया था कि एक वकील ने उसे 10 लाख रुपये के चेक पर जबरन हस्ताक्षर करने को बाध्य किया था, जबकि वह वकील की फीस पहले ही दे चुकी थी। वकील के इस कृत्य को सुप्रीम कोर्ट ने घोर कदाचार बताया है।
वास्तव में सड़क दुर्घटना के एक मामले में महिला को मिले मुआवजे की राशि में से वकील 16 फीसदी हिस्सा मांग रहा था। चेक बाउंस होने के बाद वकील ने महिला के खिलाफ चेक बाउंस की शिकायत दर्ज करा दी। महिला इसे निरस्त कराने के लिए सुप्रीम कोर्ट पहुंची थी। सुप्रीम कोर्ट ने वकील के इस मांग को पेशेवर कदाचार बताते हुए महिला के खिलाफ की गई शिकायत को निरस्त कर दिया है।
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जस्टिस आदर्श कुमार गोयल और जस्टिस यूयू ललित की पीठ ने विधि आयोग की रिपोर्ट का हवाला देते हुए कहा कि कुछ वरिष्ठ वकीलों की फीस बहुत अधिक है। कॉरपोरेट सेक्टर तो ऐसे वकीलों से पैरवी कराने में सक्षम है, लेकिन गरीब ऐसा कर पाने में असमर्थ हैं। पीठ ने कहा कि वकीलों को संविधान के अनुच्छेद-39ए के तहत अपने कर्तव्य को सदैव याद रखना चाहिए। अनुच्छेद-39ए सभी नागरिकों के लिए न्याय तक समान पहुंच की बात करता है।
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सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने कहा कि आयोग ने महसूस किया था कि संसद का दायित्व है कि वह कानूनी पेशे से जुड़े सदस्यों के लिए उनकी सेवाओं की फीस निर्धारित करे। पीठ ने कहा कि पहला कदम न्यूनतम और अधिकतम फीस तय करने को लेकर होना चाहिए। पीड़ित लोगों के अधिकारों का संरक्षण किया जाना चाहिए। उन्हें कम खर्च में न्याय दिलाने की कोशिश होनी चाहिए। पीठ ने इस बात पर दुख व्यक्त किया कि वर्ष 1998 में विधि आयोग ने अपनी रिपोर्ट में फीस निर्धारित करने का सुझाव दिया था, लेकिन अब तक कोई प्रभावी कानून नहीं है। पीठ ने कहा कि सरकार की संबंधित अथॉरिटी को कानून में बदलाव लाकर पेशेवर नैतिकता के उल्लंघन पर रोक लगाने का प्रयास करना चाहिए।
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शीर्ष अदालत ने ये टिप्पणी एक महिला की याचिका पर की। महिला ने दावा किया था कि एक वकील ने उसे 10 लाख रुपये के चेक पर जबरन हस्ताक्षर करने को बाध्य किया था, जबकि वह वकील की फीस पहले ही दे चुकी थी। वकील के इस कृत्य को सुप्रीम कोर्ट ने घोर कदाचार बताया है।
वास्तव में सड़क दुर्घटना के एक मामले में महिला को मिले मुआवजे की राशि में से वकील 16 फीसदी हिस्सा मांग रहा था। चेक बाउंस होने के बाद वकील ने महिला के खिलाफ चेक बाउंस की शिकायत दर्ज करा दी। महिला इसे निरस्त कराने के लिए सुप्रीम कोर्ट पहुंची थी। सुप्रीम कोर्ट ने वकील के इस मांग को पेशेवर कदाचार बताते हुए महिला के खिलाफ की गई शिकायत को निरस्त कर दिया है।