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सुप्रीम कोर्ट: कठोर जुर्माने के फैसले पर राहत देने से शीर्ष अदालत का इनकार, कहा- लोगों के बीच स्पष्ट संदेश जाना चाहिए

Mon, 31 Jan 2022 08:37 PM IST
कीर्तिवर्धन मिश्र न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: कीर्तिवर्धन मिश्र Updated Mon, 31 Jan 2022 08:37 PM IST
सार

कोर्ट ने जिस व्यक्ति की याचिका पर यह फैसला सुनाया, उस पर उत्तराखंड हाईकोर्ट और राज्य के कुछ अधिकारियों के खिलाफ निराधार आरोप लगाने का दोषी पाया गया था। सुप्रीम कोर्ट ने उस पर 25 लाख रुपये का कठोर आर्थिक दंड भी लगाया था। 

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Supreme Court Imposition of Exemplary cost Message has to go loud and clear says SC refusing to show indulgence news and updates
मामले पर सुप्रीम कोर्ट ने सख्त टिप्पणी करते हुए कहा कि कोर्ट यहां सभी चीजों को ठीक करने के लिए नहीं है। - फोटो : Social Media

विस्तार

सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को एक व्यक्ति पर लगाए गए 25 लाख रुपये के जुर्माने पर पुनर्विचार से इनकार कर दिया। न्यायालय ने कहा कि निराधार आरोप लगाने की प्रवृत्ति पर रोक लगाना काफी जरूरी है और यह स्पष्ट संदेश लोगों के बीच पहुंचना ही चाहिए।
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दरअसल कोर्ट ने जिस व्यक्ति की याचिका पर यह फैसला सुनाया, उस पर उत्तराखंड हाईकोर्ट और राज्य के कुछ अधिकारियों के खिलाफ निराधार आरोप लगाने का दोषी पाया गया था। सुप्रीम कोर्ट ने उस पर 25 लाख रुपये का कठोर आर्थिक दंड भी लगाया था। इस सजा पर व्यक्ति ने सर्वोच्च न्यायालय से अपील की थी कि उस पर लगाए गए जुर्माने पर फिर से विचार हो।
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हालांकि, जस्टिस एएम खानविलकर और जस्टिस सीटी रविकुमार की बेंच ने याचिकाकर्ता की ओर से पेश वकील से कहा, ‘‘हमें इसमें कोई दिलचस्पी नहीं है। हम इस मामले में बहुत ही स्पष्ट हैं। इसे रोकना होगा। हम चाहते हैं कि बहुत ही सख्त संदेश जाए।’’
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वकील ने पीठ से उदारता दिखाने की अपील की और कहा कि याचिकाकर्ता को अपनी गलती का अहसास हो चुका है और वह भविष्य में अत्यंत सावधान रहेंगे। वकील ने कहा, ‘‘मैं (याचिकाकर्ता) सेवानिवृत्त पेंशनधारी हूं। मैं इस अदालत में अपनी एक महीने की पेंशन की राशि जमा कर दूंगा।’’ उन्होंने आगे कहा, ‘‘कृपया उदारता दिखाएं। मैंने अपनी अपनी गलती महसूस कर ली है। पच्चीस लाख रुपये का जुर्माना गैर-अनुपातिक और कठोर है।’’ 

लेकिन पीठ ने कहा कि वह इस याचिका पर विचार करने के पक्ष में नहीं है। शीर्ष अदालत ने कहा, ‘‘इसे रोकना होगा और संदेश स्पष्ट जाना चाहिए। हमें याचिकाकर्ता के खिलाफ अवमानना कार्रवाई करनी चाहिए, लेकिन हमने ऐसा नहीं किया?’’ सुनवाई के दौरान सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि अदालत का इरादा एक उदाहरण प्रस्तुत करना है कि इस तरह की प्रवृत्ति बर्दाश्त नहीं की जाएगी।


क्या है पूरा मामला?
शीर्ष अदालत ने चार जनवरी को याचिकाकर्ता पर जुर्माना लगाने का आदेश दिया था। तब कोर्ट ने पाया था कि उत्तराखंड हाईकोर्ट और राज्य सरकार के कुछ अधिकारियों के खिलाफ उसके आवेदन में की गई टिप्पणियां अस्वीकार्य और आरोप निराधार हैं। सुप्रीम कोर्ट की ओर से कहा गया था कि अगर चार हफ्ते के अंदर जुर्माने की राशि कोर्ट की रजिस्ट्री में जमा नहीं कराई गई तो हरिद्वार के कलेक्टर जुर्माने की यह राशि आवेदनकर्ता से वसूल करेंगे।
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