फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   India News ›   Supreme Court important observation One should bow down in favour of someone's liberty rather than curtail it

Supreme Court: 'किसी की स्वतंत्रता में कटौती के बजाय उसके पक्ष में झुकना चाहिए', सुप्रीम कोर्ट की अहम टिप्पणी

Tue, 23 Sep 2025 06:05 AM IST
शुभम कुमार न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: शुभम कुमार Updated Tue, 23 Sep 2025 06:05 AM IST
सार

सुप्रीम कोर्ट ने एसडीपीआई नेता केएस शान हत्या मामले में आरएसएस के पांच आरोपियों की रद्द की गई जमानत को बहाल कर दिया। अदालत ने कहा कि स्वतंत्रता में कटौती के बजाय उसका समर्थन करना बेहतर है। दो साल से जमानत पर रहे आरोपियों ने कोई शर्त नहीं तोड़ी, इसलिए जमानत रद्द करना उचित नहीं।

विज्ञापन
Supreme Court important observation One should bow down in favour of someone's liberty rather than curtail it
सुप्रीम कोर्ट। - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को कहा कि वह स्वतंत्रता में कटौती के बजाय उसके पक्ष में झुकना पसंद करता है। यह कहते हुए शीर्ष अदालत ने केरल हाईकोर्ट के उस आदेश को रद्द कर दिया जिसमें एसडीपीआई के राज्य सचिव केएस शान की हत्या से संबंधित एक मामले में आरएसएस के पांच सदस्यों को दी गई जमानत रद्द कर दी गई थी। जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की पीठ ने नोट किया कि आरोपी अपीलकर्ता दो साल से जमानत पर थे और राहत मिलने के बाद वे किसी भी समान या अन्य अपराध में शामिल नहीं रहे हैं। अदालत ने कहा कि इस मामले में 141 गवाह हैं और मुकदमे को पूरा होने में समय लगेगा।

विज्ञापन


पीठ ने कहा, हम स्वतंत्रता में कटौती की बजाय उसके पक्ष में झुकना पसंद करते हैं। उन्होंने जस्टिस वीआर कृष्ण अय्यर की ओर से प्रतिपादित जमानत न्यायशास्त्र के स्वर्णिम नियम, जमानत नियम है और जेल अपवाद, पर जोर दिया। पीठ ने कहा, इस सिद्धांत को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। शीर्ष अदालत ने बताया कि जमानत रद्द करना, जमानत देने वाले आदेश को रद्द करने से अलग है।
विज्ञापन


पीठ ने कहा है, जमानत तब रद्द की जा सकती है जब अभियुक्त लगाई गई किसी भी शर्त का उल्लंघन करता है। दूसरी ओर, जमानत देने का आदेश तब रद्द किया जा सकता है जब ऐसा आदेश विकृत या अवैध पाया जाता है। इस मामले में दिसंबर, 2022 में विभिन्न आदेशों के तहत निचली अदालत से जमानत पाए 10 आरोपियों में से हाईकोर्ट ने 18 दिसंबर, 2021 को राजनीतिक दुश्मनी के कारण हत्या में कथित रूप से शामिल होने के आरोप में पांच आरोपियों अभिमन्यु, अतुल, सानंद, विष्णु और धनीश की जमानत रद्द कर दी।
विज्ञापन
विज्ञापन


ये भी पढ़ें:- Rain: बंगाल से लेकर ओडिशा और आंध्र प्रदेश तक इस हफ्ते भरपूर बारिश के आसार; दिल्ली-NCR से होगी मानसून की वापसी

हाईकोर्ट में केरल सरकार ने तर्क दिया था कि जमानत मिलने के बाद एक अपीलकर्ता और एक अन्य सह-आरोपी, एक व्यक्ति पर हमले में शामिल थे। सरकार ने अपनी स्थिति रिपोर्ट में अपीलकर्ताओं के आपराधिक इतिहास का भी हवाला दिया। हालांकि शीर्ष अदालत ने कहा, रिकॉर्ड से पता चलता है कि शिकायतकर्ता (राज्य सरकार) ने हाईकोर्ट के समक्ष एक हलफनामा दायर कर अपीलकर्ता विष्णु की संलिप्तता से इन्कार किया था।

आरोपी का इतिहास जमानत से इन्कार का आधार नहीं हो सकता
पीठ ने कहा है, बयान पर गौर करने से यह दर्ज करना पर्याप्त है कि जो दिख रहा है उससे कहीं अधिक है। पीठ ने कहा, हम इस तर्क को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं हैं कि प्राथमिकी विष्णु को दी गई जमानत रद्द करने का आधार बनती है। स्थिति रिपोर्ट के संबंध में पीठ ने एक पूर्व फैसले का हवाला देते हुए कहा कि ऐसे पूर्व इतिहास अपने आप में जमानत से इन्कार करने का आधार नहीं बन सकते।


ये भी पढ़ें:- Assam: जुबीन गर्ग का आज राजकीय सम्मान के साथ होगा अंतिम संस्कार, श्रद्धांजलि न देने पर तेजपुर विवि में बवाल

सत्र न्यायालय को नए सिरे से विचार करने के लिए कहना उचित होता

इस मामले में शीर्ष अदालत ने हाईकोर्ट से जमानत आदेश रद्द होने का उल्लेख करते हुए कहा कि सत्र न्यायालय ने केवल दो बातों को ध्यान में रखा। पहला, हिरासत की अवधि और दूसरा, अभियोजन पक्ष की ओर से कोई विरोध नहीं। ऐसी परिस्थितियों में हाईकोर्ट के लिए सत्र न्यायालय को सभी प्रासंगिक कारकों पर विचार करने और अपीलकर्ताओं की जमानत याचिका पर नए सिरे से निर्णय लेने का निर्देश देना उचित और न्यायसंगत होता।

जमानत की शर्तों को कठोर बनाना चाहिए था
पीठ ने यह भी कहा कि अभियुक्तों के गवाहों को प्रभावित करने या साक्ष्यों से छेड़छाड़ करने की आशंका और मुकदमे की सुचारू प्रगति सुनिश्चित करने के लिए, उन शर्तों के अलावा और भी कठोर शर्तें लगाया जा सकता था। अपने फैसले में अदालत ने अपीलकर्ताओं को निर्देश दिया कि वे साक्ष्यों से छेड़छाड़ न करें और गवाहों को डराने-धमकाने का प्रयास न करें।

विज्ञापन
विज्ञापन

रहें हर खबर से अपडेट, डाउनलोड करें Android Hindi News apps, iOS Hindi News apps और Amarujala Hindi News apps अपने मोबाइल पे|
Get all India News in Hindi related to live update of politics, sports, entertainment, technology and education etc. Stay updated with us for all breaking news from India News and more news in Hindi.

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed