सुप्रीम कोर्ट ने दिए संकेत, व्यभिचार जल्द हो सकता है अपराधमुक्त
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जल्द ही सहमति से किसी विवाहित महिला के साथ शारीरिक संबंध बनाना व्यभिचार (एडल्टरी) नहीं माना जाएगा। सुप्रीम कोर्ट ने गुरूवार को व्यभिचार को अपराध की श्रेणी से हटाने के स्पष्ट संकेत दिए। व्यभिचार महज तलाक का एक आधार रहेगा।
चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा की अध्यक्षता वाली पांच सदस्यीय संविधान पीठ ने कहा कि शादी की पवित्रता के लिए पति और पत्नी दोनों एक समान रूप से जिम्मेदार हैं। सिर्फ पति को व्यभिचार के लिए दोषी नहीं ठहराया जा सकता। पीठ ने आश्चर्य जताया कि अगर शादीशुदा महिला अपने पति के अलावा किसी अन्य शादीशुदा पुरुष के साथ शारीरिक संबंध बनाती है तो ऐसे में सिर्फ पुरुष पर ही अपराध क्यों बनता है जबकि महिला भी अपराध के लिए उतनी ही जिम्मेदार है।
संविधान पीठ यह पहले ही साफ कर चुकी है कि वह इस पर गौर नहीं करेगी कि व्यभिचार को जेंडर न्यूट्रल कानून बनाना जाए या नहीं? पीठ ने कहा है कि वह इस बात का परीक्षण करेगी कि व्यभिचार को अपराध की श्रेणी में रखा जाना चाहिए या नहीं।
सरकार की दलील उचित नहीं
सुनवाई के दौरान पीठ ने कहा कि सरकार की यह दलील कि विवाह की पवित्रता बनाए रखने के लिए व्यभिचार को अपराध की श्रेणी में होना ही चाहिए, यह उचित नहीं लगता। पीठ ने कहा कि यह कैसा कानून है कि अगर शादीशुदा पुरुष अविवाहित महिला के साथ संबंध बनाता है तो कोई अपराध नहीं बनता। शादी की पवित्रता जरूर एक मसला है लेकिन व्यभिचार में दंडात्मक प्रावधान होना समानता के अधिकार का उल्लंघन प्रतीत होता है क्योंकि यह शादीशुदा मर्द और शादीशुदा महिला को अलग-अलग नजरिए से देखता है।
महिला वैवाहिक बंधन से बाहर नहीं जा सकती, कहना सही नहीं होगा
पीठ के सदस्य जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ ने कहा कि हमारे समाज में तलाक की प्रक्रिया 30-40 वर्ष तक खिंच जाती है। ऐसी स्थिति में यह कहना सही नहीं होगा कि महिला वैवाहिक बंधन से बाहर नहीं जा सकती। क्या ऐसा करना महिला के सम्मान के अधिकार के खिलाफ नहीं है और आखिर ऐसी स्थिति में महिला कब तक वैवाहिक बंधन में जकड़ी रहे। अगर हम इसे स्वीकार नहीं भी करते है तो भी समाज इसे पार पा लेगा।
पति की सहमति से संबंध बनाना अपराध क्यों नहीं ?
पीठ ने इस प्रावधान पर भी आश्चर्य जताया कि यदि पति की सहमति से महिला किसी गैर मर्द के साथ संबंध बनाती है तो वह अपराध नहीं है। पीठ ने इस प्रावधान को मनमाना और भेदभावपूर्ण बताया। यह प्रावधान शादीशुदा महिला को पति की जागीर मानता है क्योंकि पत्नी का गैर मर्द के साथ संबंध उसके पति की इच्छा पर निर्भर है।
पुरुष को ही अभी माना जाता है अपराधी
मौजूदा कानून के तहत व्यभिचार (आईपीसी की धारा-497) के लिए सिर्फ पुरुष को ही अपराधी माना जाता है और इसके लिए पांच साल तक की सजा का प्रावधान है। इसके तहत महिलाओं को अपराधी नहीं माना जाता। महिलाओं को इस मामले में हमेशा पीड़ित ही समझा जाता है।
आईपीसी की धारा-497 को रद्द करने की अपील की गई है
मालूम हो कि संविधान पीठ केरल निवासी जोसेफ शिन द्वारा दायर उस जनहित याचिका सुनवाई कर रही है जिसमें धारा-497 को निरस्त करने की अपील की गई है। याचिका में इस प्रावधान को भेदभावपूर्ण और लिंग विभेद वाला बताया गया है। याचिका में कहा गया है कि धारा-497 के तहत व्यभिचार को अपराध की श्रेणी में रखा गया है लेकिन यह अपराध पुरुषों तक ही सीमित है अगर उसका किसी दूसरे की पत्नी के साथ संबंध हो।