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मराठा आरक्षण : सुप्रीम कोर्ट ने रोक लगाने से किया इंकार, अंतिम सुनवाई 17 मार्च से होगी शुरू

Wed, 05 Feb 2020 11:52 AM IST
देव कश्यप न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: देव कश्यप Updated Wed, 05 Feb 2020 11:52 AM IST
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Supreme Court  final hearing 17 March petitions reservation Maratha community in education and jobs
सुप्रीम कोर्ट - फोटो : social media

मराठा समुदाय को आरक्षण देने के मामले में उद्धव सरकार को राहत मिली है। महाराष्ट्र में शिक्षा और नौकरियों में मराठा समुदाय को आरक्षण पर रोक लगाने से सुप्रीम कोर्ट ने इनकार कर दिया है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इस मामले में अंतिम सुनवाई 17 मार्च से शुरू होगी। 

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सुप्रीम कोर्ट ने शिक्षा एवं नौकरियों में मराठों को आरक्षण देने से संबंधित महाराष्ट्र के कानून को बरकरार रखने के बॉम्बे हाईकोर्ट के आदेश पर रोक लगाने से बुधवार को इनकार कर दिया। न्यायमूर्ति एल नागेश्वर राव और न्यायमूर्ति दीपक गुप्ता की एक पीठ ने कहा कि यह मामला लंबे समय से लंबित रहा है और इसमें विस्तृत सुनवाई जरूरी है।

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पीठ ने मराठा आरक्षण के समर्थन एवं विरोध में दायर कई याचिकाओं पर विस्तृत सुनवाई के लिए 17 मार्च की तारीख तय की। पीठ ने कहा कि हम 17 मार्च की तारीख तय कर रहे हैं ताकि इस मुद्दे पर विस्तृत चर्चा हो सके। हम यह भी स्पष्ट कर रहे हैं कि किसी स्थगन की अनुमति नहीं होगी। इसके समर्थन और विरोध में सभी जवाब अगली सुनवाई की तारीख से पहले दायर कर दिए जाएं।
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मराठाओं के लिए कोटा को चुनौती देने वाले कुछ याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश हुए वरिष्ठ अधिवक्ता गोपाल शंकरनारायणन ने सुनवाई शुरू होते ही कहा कि राज्य निर्धारित सीमा से हटकर ऐसे आरक्षण नहीं दे सकता है। उन्होंने बॉम्बे हाईकोर्ट के उस आदेश पर रोक लगाने का अनुरोध किया जिसमें कुछ संशोधनों के साथ मराठाओं को आरक्षण देने वाले राज्य के कानून को बरकरार रखा गया था।

याचिका में कहा गया है कि इंदिरा साहनी मामले में संविधान पीठ द्वारा तय आरक्षण पर 50 फीसदी कैप का उल्लंघन हुआ है। महाराष्ट्र सरकार ने शिक्षा और सरकारी नौकरियों में मराठा समुदाय को 16 फीसदी आरक्षण देने का फैसला किया था।

इस फैसले को बॉम्बे हाईकोर्ट में चुनौती दी गई थी, लेकिन हाई कोर्ट ने याचिका खारिज कर दी थी। इसके बाद हाईकोर्ट के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल की गई। बॉम्बे हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा था कि मराठा समुदाय के लिये 16 प्रतिशत आरक्षण न्यायोचित नहीं है। मराठा आरक्षण को रोजगार के मामले में 12 फीसदी तथा शिक्षण संस्थाओं में प्रवेश के मामले में 13 फीसदी से अधिक नहीं होना चाहिए। 



सुप्रीम कोर्ट ने अपने 27 जून के फैसले में कहा था कि कुल आरक्षणों पर उच्चतम न्यायालय की ओर से लगाई गई 50 फीसदी की सीमा को अपवाद की परिस्थितियों में पार किया जा सकता है। 'यूथ फॉर इक्वेलिटी' के प्रतिनिधि शुक्ला ने अपनी याचिका में कहा कि सामाजिक एवं आर्थिक रूप से पिछड़ा वर्ग (एसईबीसी) कानून, 2018 शीर्ष अदालत द्वारा इंदिरा साहनी मामले में दिए गए ऐतिहासिक फैसले में आरक्षण पर लगाई गई 50 फीसदी सीमा का उल्लंघन है। इस फैसले को मंडल आदेश भी कहा जाता है।  इस कानून का मकसद सरकारी नौकरियों एवं शिक्षा में मराठा समुदाय को आरक्षण देना था। 

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