फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   India News ›   supreme court doctors attack elected representatives rule of law

'कानून से ऊपर कोई नहीं': डॉक्टरों पर हमला करने वाले नेताओं को 'सुप्रीम' फटकार, क्या है पूरा मामला?

Thu, 01 Oct 2026 08:07 PM IST
राकेश कुमार पीटीआई, नई दिल्ली।
पीटीआई, नई दिल्ली। Published by: राकेश कुमार Updated Thu, 01 Oct 2026 08:07 PM IST
सार

सुप्रीम कोर्ट ने ठाणे के एक नगर निकाय अस्पताल में डॉक्टरों से मारपीट और गाली-गलौज के आरोप से जुड़े मामले में शिवसेना पार्षद रमेश म्हात्रे और तीन अन्य आरोपियों को पांच अक्तूबर तक आत्मसमर्पण करने का निर्देश दिया। शीर्ष अदालत ने जनप्रतिनिधियों की ओर से डॉक्टरों और सार्वजनिक सेवाओं से जुड़े कर्मचारियों पर हमलों की घटनाओं पर चिंता जताई। पीठ ने कहा कि निर्वाचित पद किसी को कानून से ऊपर होने का अधिकार नहीं देता। अस्पतालों में भयमुक्त माहौल बनाए रखना जरूरी है, जिससे डॉक्टर बिना दबाव के मरीजों का इलाज कर सकें।
 

विज्ञापन
supreme court doctors attack elected representatives rule of law
सुप्रीम कोर्ट - फोटो : @अमर उजाला ग्राफिक्स

विस्तार

सुप्रीम कोर्ट ने डॉक्टरों और अन्य सार्वजनिक सेवाओं से जुड़े कर्मचारियों पर जनप्रतिनिधियों के हमलों की बढ़ती घटनाओं पर चिंता जताई है। शीर्ष अदालत ने कहा कि निर्वाचित पद पर बैठने वाले व्यक्ति की जिम्मेदारी आम नागरिकों से अधिक होती है। उससे अपेक्षा की जाती है कि वह कानून का सम्मान करे और सार्वजनिक संस्थाओं में लोगों का भरोसा मजबूत करे। जनता के वोट से मिली ताकत कानून से ऊपर होने का अधिकार नहीं देती।
विज्ञापन


पूरा मामला क्या है?
यह मामला महाराष्ट्र के ठाणे जिले के एक नगर निकाय अस्पताल में डॉक्टरों के साथ मारपीट और गाली-गलौच के आरोप से जुड़ा है। इस मामले में शिवसेना के पार्षद रमेश म्हात्रे और तीन अन्य लोगों की जमानत रद्द करने का मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा था। न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की पीठ ने 28 सितंबर को अपने विस्तृत आदेश में जनप्रतिनिधियों के आचरण और कानून के शासन को लेकर अहम टिप्पणियां कीं।
विज्ञापन


आरोपियों को लेकर अदालत ने क्या निर्देश दिया?
सुप्रीम कोर्ट ने शिवसेना पार्षद रमेश म्हात्रे और तीन अन्य आरोपियों को पांच अक्तूबर तक आत्मसमर्पण करने का निर्देश दिया है। शीर्ष अदालत ने कहा कि डॉक्टरों को डराने या उन पर हमला करने की किसी भी कोशिश को बर्दाश्त नहीं किया जा सकता। पीठ के मुताबिक, यह बात खास तौर पर तब गंभीर हो जाती है, जब ऐसी घटना में निर्वाचित पद पर बैठा व्यक्ति शामिल हो। हालांकि, हर घटना की जांच उसके तथ्यों और कानून के अनुसार की जानी चाहिए।
विज्ञापन
विज्ञापन


यह भी पढ़ें: एक्सप्लेनर: मौत के इंजेक्शन दो बार लगने के बावजूद मृत्युदंड पाई महिला जिंदा बची, यह कैसे मुमकिन; अब आगे क्या?


शीर्ष अदालत ने पालघर की घटना का जिक्र क्यों किया?
शीर्ष अदालत की पीठ ने कहा कि ठाणे की घटना को अलग-थलग करके नहीं देखा जा सकता। देश के अलग-अलग हिस्सों में निर्वाचित प्रतिनिधियों पर बल प्रयोग करने, धमकाने या कानून से बाहर जाकर अपना प्रभाव दिखाने के आरोप सामने आए हैं। अदालत ने ठाणे के मामले के बाद महाराष्ट्र के पालघर में शिवसेना नेताओं से जुड़ी एक अन्य घटना का भी उल्लेख किया। पीठ ने कहा कि ऐसे आरोपों की बार-बार सामने आने वाली घटनाओं को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

डॉक्टरों और सरकारी संस्थाओं की सुरक्षा क्यों जरूरी?
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि कोई भी जनप्रतिनिधि खुद पुलिस, प्रशासन या अदालत की भूमिका नहीं निभा सकता। लोगों की शिकायतों के समाधान के लिए कानूनी संस्थाएं मौजूद हैं और उनका सम्मान करना जरूरी है। अदालत ने यह भी समझाया कि डॉक्टर गंभीर मरीजों और आपात स्थितियों में काम करते हैं। अगर अस्पताल में डर या असुरक्षा का माहौल होगा, तो इसका असर मरीजों को मिलने वाली चिकित्सा सेवाओं पर भी पड़ सकता है।
विज्ञापन
विज्ञापन

रहें हर खबर से अपडेट, डाउनलोड करें Android Hindi News apps, iOS Hindi News apps और Amarujala Hindi News apps अपने मोबाइल पे|
Get all India News in Hindi related to live update of politics, sports, entertainment, technology and education etc. Stay updated with us for all breaking news from India News and more news in Hindi.

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed