{"_id":"5d519e748ebc3e6d142604c7","slug":"supreme-court-dismisses-review-petition-related-to-lgbtq-community","type":"story","status":"publish","title_hn":"सुप्रीम कोर्ट ने एलजीबीटीक्यू समुदाय से जुड़ी पुनर्विचार याचिका खारिज की","category":{"title":"India News","title_hn":"देश","slug":"india-news"}}
सुप्रीम कोर्ट ने एलजीबीटीक्यू समुदाय से जुड़ी पुनर्विचार याचिका खारिज की
Mon, 12 Aug 2019 10:44 PM IST
अमर शर्मा
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
Published by: अमर शर्मा
Updated Mon, 12 Aug 2019 10:44 PM IST
विज्ञापन
सुप्रीम कोर्ट
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
सुप्रीम कोर्ट ने एलजबीटीक्यू समुदाय के लिए समलैंगिक विवाह, गोद लेना और सरोगेसी जैसे नागरिक अधिकारों की मांग वाली पुनर्विचार याचिका खारिज कर दी है। जस्टिस एनवी रमण की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय पीठ ने 11 जुलाई को चैंबर में तुषार नैयर की ओर से पुनर्विचार याचिका को विचार के बाद खारिज कर दिया।
पीठ ने अपने आदेश में कहा कि यह याचिका 29 अक्तूबर, 2018 के उस आदेश के खिलाफ दायर की गई है, जिसमें नैयर की याचिका को खारिज कर दिया गया था। हमने पुनर्विचार याचिका पर उसकी मेरिट पर विचार किया। हमारी राय में इनमें पूर्व के आदेश पर पुनर्विचार का कोई मामला नहीं बनता है।
शीर्ष अदालत ने पिछले साल नैयर की उस याचिका को खारिज कर दिया था, जिसमें एलजीबीटीक्यू समुदाय के सदस्यों से संबंधित मुद्दे उठाते हुए कहा गया था कि पांच सदस्यीय संविधान पीठ पहले ही समलैंगिकता के मामले में विचार कर चुकी है। इस पर कोर्ट ने कहा था कि नवतेज सिंह जौहर बनाम भारत सरकार मामले में 6 सितंबर, 2018 को अदालत के फैसले के बाद हम इस पर विचार के इच्छुक नहीं हैं।
विज्ञापन
तत्कालीन चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा की अध्यक्षता वाली पांच सदस्यीय संविधान पीठ ने इस फैसले में सर्वसम्मति से कहा था कि परस्पर सहमति से वयस्कों के बीच एकांत में स्थापित होने वाले अप्राकृतिक यौन संबंध अपराध नहीं है। साथ ही कोर्ट ने परस्पर सहमति से अप्राकृतिक यौन संबंध स्थापित करने को अपराध की श्रेणी में रखने संबंधी भारतीय दंड संहिता की धारा 377 का प्रावधान निरस्त कर दिया था।
विज्ञापन
पीठ ने अपने आदेश में कहा कि यह याचिका 29 अक्तूबर, 2018 के उस आदेश के खिलाफ दायर की गई है, जिसमें नैयर की याचिका को खारिज कर दिया गया था। हमने पुनर्विचार याचिका पर उसकी मेरिट पर विचार किया। हमारी राय में इनमें पूर्व के आदेश पर पुनर्विचार का कोई मामला नहीं बनता है।
विज्ञापन
शीर्ष अदालत ने पिछले साल नैयर की उस याचिका को खारिज कर दिया था, जिसमें एलजीबीटीक्यू समुदाय के सदस्यों से संबंधित मुद्दे उठाते हुए कहा गया था कि पांच सदस्यीय संविधान पीठ पहले ही समलैंगिकता के मामले में विचार कर चुकी है। इस पर कोर्ट ने कहा था कि नवतेज सिंह जौहर बनाम भारत सरकार मामले में 6 सितंबर, 2018 को अदालत के फैसले के बाद हम इस पर विचार के इच्छुक नहीं हैं।
विज्ञापन
तत्कालीन चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा की अध्यक्षता वाली पांच सदस्यीय संविधान पीठ ने इस फैसले में सर्वसम्मति से कहा था कि परस्पर सहमति से वयस्कों के बीच एकांत में स्थापित होने वाले अप्राकृतिक यौन संबंध अपराध नहीं है। साथ ही कोर्ट ने परस्पर सहमति से अप्राकृतिक यौन संबंध स्थापित करने को अपराध की श्रेणी में रखने संबंधी भारतीय दंड संहिता की धारा 377 का प्रावधान निरस्त कर दिया था।