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Supreme Court: हरियाणा के वकील की गिरफ्तारी मामला, सुनवाई कल; धर्मांतरण रोधी कानून के खिलाफ अपील पर विचार नहीं

Tue, 11 Nov 2025 01:13 PM IST
नितिन गौतम न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: नितिन गौतम Updated Tue, 11 Nov 2025 01:13 PM IST
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Supreme court declines urgent hearing on pleas against anti conversion law news updates
सुप्रीम कोर्ट (फाइल तस्वीर) - फोटो : ANI

हरियाणा पुलिस की स्पेशल टास्क फोर्स (STF) ने वकील विक्रम सिंह को गिरफ्तार किया है। यह मामला अब सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच गया है। चीफ जस्टिस बीआर गवई की अध्यक्षता वाली तीन जजों की पीठ इस मामले में बुधवार को सुनवाई करेगी। उन्होंने हत्या के मामले में अपनी गिरफ्तारी को चुनौती दी है। उन्होंने अपनी दलील में कहा कि वह इस मामले में केवल एक सह-अभियुक्त का प्रतिनिधित्व कर रहे थे। विक्रम की पैरवी कर रहे वरिष्ठ वकील विकास सिंह ने कहा, इस मामले में तत्काल सुनवाई इसलिए जरूरी है क्योंकि एक वकील को महज पेशेवर काम करने के कारण फंसाकर गिरफ्तार किया गया है। दलीलों को सुनने के बाद चीफ जस्टिस ने कहा, हम इस पर बुधवार को सुनवाई करेंगे। बता दें कि वकील के खिलाफ कार्रवाई से भड़के वकीलों के संघ ने विगत छह नवंबर को दिल्ली की जिला अदालतों में काम का बहिष्कार किया था। सुप्रीम कोर्ट में दायर याचिका में वकील विक्रम सिंह ने अपनी तत्काल रिहाई और गुरुग्राम की एसटीएफ की कथित अवैध कार्रवाइयों की न्यायिक जांच कराए जाने की मांग भी की है। जुलाई 2019 में दिल्ली बार काउंसिल में वकील के रू में पंजीकृत कराने वाले विक्रम वर्तमान में हरियाणा की फरीदाबाद जेल में बंद हैं। उन्होंने हरियाणा और दिल्ली सरकारों के अलावा बार काउंसिल ऑफ इंडिया को भी इस मुकदमे में पक्षकार बनाया है।

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धर्मांतरण रोधी कानूनों के खिलाफ तत्काल सुनवाई नहीं करेगा सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने विभिन्न राज्यों के धर्मांतरण रोधी कानूनों के खिलाफ दायर याचिकाओं पर तत्काल सुनवाई से इनकार कर दिया है। ये याचिकाएं उत्तर प्रदेश, गुजरात और मध्य प्रदेश समेत कई राज्यों के धर्मांतरण रोधी कानूनों के खिलाफ दायर की गई हैं। एक याचिकाकर्ता के वकील ने तुरंत सुनवाई करने और धर्मांतरण रोधी कानूनों पर रोक लगाने की मांग की है। इस पर मुख्य न्यायाधीश जस्टिस बीआर गवई और जस्टिस विनोद चंद्रन और जस्टिस एनवी अंजारिया की पीठ ने तत्काल सुनवाई से इनकार कर दिया। पीठ ने कहा कि याचिकाएं दिसंबर में सुनवाई के लिए सूचीबद्ध की जाएंगी। इससे पहले धर्मांतरण रोधी कानून पर रोक की मांग वाली याचिकाओं पर सुप्रीम कोर्ट ने 16 सितंबर को विभिन्न राज्यों को नोटिस जारी कर उनका जवाब मांगा था। पीठ ने तब राज्यों को उनके जवाब दाखिल करने के लिए चार सप्ताह का समय दिया था और इसके बाद याचिकाकर्ताओं को दो सप्ताह में अपना उत्तर दाखिल करने की अनुमति दी थी। इस मामले को छह सप्ताह के बाद सूचीबद्ध किया गया था। पीठ उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, छत्तीसगढ़, गुजरात, हरियाणा, झारखंड और कर्नाटक द्वारा बनाए गए धर्मांतरण रोधी कानूनों की सांविधानिक वैधता को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई करेगी।

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कथित तौर पर ISIS से जुड़े व्यक्ति को जमानत नहीं, सुप्रीम कोर्ट ने कहा- संदेश भेजने के लिए सबसे अच्छी सुबह
सुप्रीम कोर्ट ने आज एक अन्य अहम मामले में प्रतिबंधित संगठन- इस्लामिक स्टेट ऑफ इराक एंड सीरिया (ISIS) से जुड़े शख्स को जमानत देने से इनकार कर दिया। अदालत ने कहा कि उस पर देश में आतंक फैलाने की साजिश में संलिप्त होने का आरोप है। न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और संदीप मेहता की पीठ ने जमानत याचिका खारिज करते हुए कहा, 'संदेश भेजने के लिए यह सबसे अच्छी सुबह' है।पीठ ने यह टिप्पणी तब की जब याचिकाकर्ता के वकील ने कहा कि सोमवार को जो हुआ उसके बाद इस मामले पर बहस करने के लिए शायद यह सबसे अच्छी सुबह नहीं है। बता दें कि ये मुकदमा ऐसे समय अदालत के समक्ष आया जब कुछ ही घंटे पहले लाल किले के नजदीक कार में हुए धमाके में 12 लोगों की मौत हो गई। याचिकाकर्ता ने मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय के जनवरी में पारित आदेश को चुनौती दी थी। हाईकोर्ट ने उसे जमानत देने से इनकार कर दिया गया था। मामला गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम (UAPA) की धाराओं के तहत संगीन अपराधों का है। याचिकाकर्ता को मई 2023 में गिरफ्तार किया गया था। मामले की जांच का जिम्मा राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) के पास है।

रिज क्षेत्र की सुरक्षा को मजबूत करने का निर्देश: सीजेआई बीआर गवई
सुप्रीम कोर्ट ने एक अहम फैसले में दिल्ली की 'ग्रीन लंग्स' कही जाने वाली रिज क्षेत्र की सुरक्षा को मजबूत करने के लिए केंद्र सरकार को निर्देश दिया कि वह दिल्ली रिज मैनेजमेंट बोर्ड (DRMB) को वैधानिक दर्जा दे और उसे रिज तथा मॉर्फोलॉजिकल रिज से जुड़े सभी मामलों का एकमात्र नोडल प्राधिकरण बनाए। मुख्य न्यायाधीश बीआर गवई और न्यायमूर्ति के विनोद चंद्रन की पीठ ने यह निर्णय टीएन गोडावरमन थिरुमुलपाड़ बनाम संघ सरकार मामले में सुनाया। पीठ ने तीन मुद्दों पर विचार किया, जिनमें पहला था दिल्ली रिज को वन अधिनियम के तहत अंतिम अधिसूचना जारी करना, दूसरा रिज और मॉर्फोलॉजिकल रिज से 9 मई 1996 से जारी अतिक्रमण हटाना और तीसरा मॉर्फोलॉजिकल रिज की पहचान करना। अदालत ने कहा कि रिज की सही पहचान और संरक्षण बेहद जरूरी है, क्योंकि यह दिल्ली के लिए हरित फेफड़ों का काम करता है और प्रदूषण की वर्तमान स्थिति में इसका महत्व और बढ़ जाता है। अदालत ने टिप्पणी की कि रिज को आरक्षित वन घोषित न करने से इसे जरूरी कानूनी संरक्षण नहीं मिल पाता। इसलिए DRMB को सशक्त कानूनी दर्जा देने और रिज के संरक्षण की जिम्मेदारी सुनिश्चित करने की आवश्यकता है, ताकि इसकी पारिस्थितिक अखंडता बनी रहे।

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क्या न्यायाधिकरण सुधारों पर 2021 का कानून वैध? सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुरक्षित रखा
सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को ट्रिब्यूनल्स रिफॉर्म्स (रैशनलाइजेशन एंड कंडीशंस ऑफ सर्विस) एक्ट, 2021 की सांविधानिक वैधता को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर अपना फैसला सुरक्षित रख लिया। यह कानून कई अपीलीय ट्रिब्यूनलों, जैसे फिल्म सर्टिफिकेशन अपीलीय ट्रिब्यूनल, को समाप्त करता है और अलग-अलग ट्रिब्यूनलों में सदस्यों की नियुक्ति, कार्यकाल और सेवा शर्तों में बदलाव करता है। मुख्य न्यायाधीश बीआर गवई और न्यायमूर्ति के. विनोद चंद्रन की पीठ ने अटॉर्नी जनरल आर. वेंकटरमणि की दलीलें सुनने के बाद फैसला सुरक्षित रखा। एजी ने कहा कि यह कानून लंबे विचार-विमर्श के बाद संसद ने बनाया है, इसलिए इसे प्रभावी रहने दिया जाना चाहिए। अदालत ने अंतिम सुनवाई 16 अक्तूबर से शुरू की थी। सोमवार को पीठ ने पूछा कि केंद्र सरकार कैसे वही कानून दोबारा लेकर आ सकती है, जिसके कई प्रावधानों को सुप्रीम कोर्ट पहले ही रद्द कर चुका है, और वह भी बिना उस फैसले के मूल आधार को हटाए। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि यह कानून न्यायिक स्वतंत्रता और शक्तियों को अलग-अलग करने के सिद्धांत का उल्लंघन करता है। यह कानून 2021 के अध्यादेश की जगह लाया गया, जिसकी सांविधानिक वैधता को चुनौती मिली थी। बता दें कि सर्वोच्च अदालत पहले ही उस प्रावधान को रद्द कर चुकी है, जिसमें ट्रिब्यूनल सदस्यों और अध्यक्षों का कार्यकाल घटाकर चार वर्ष किया गया था। अदालत ने माना कार्यपालिका का अनुचित दखल बढ़ सकता है।

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