Supreme Court: 'मैं कानून और संविधान का सेवक', वरिष्ठ अधिवक्ता पदनाम दिए जाने के मामले पर बोले CJI चंद्रचूड़
प्रधान न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली पीठ ने जैसे ही कार्यवाही शुरू की तो अधिवक्ता मैथ्यूज ने अदालत के समक्ष एक मामले का उल्लेख किया। उन्होंने पीठ से कहा कि कॉलेजियम प्रणाली में सुधार के साथ-साथ वरिष्ठ अधिवक्ता का दर्जा समाप्त करने की आवश्यकता है।
विस्तार
प्रधान न्यायाधीश डी वाई चंद्रचूड़ ने शुक्रवार को कहा कि एक न्यायाधीश के तौर पर वह कानून और संविधान के सेवक हैं और उन्हें निर्धारित स्थिति का पालन करना होता है।
वरिष्ठ अधिवक्ता का दर्जा समाप्त करने की आवश्यकता
प्रधान न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली पीठ ने जैसे ही कार्यवाही शुरू की तो अधिवक्ता मैथ्यूज जे. नेदुम्पाडा ने अदालत के समक्ष एक मामले का उल्लेख किया। उन्होंने पीठ से कहा कि कॉलेजियम प्रणाली में सुधार के साथ-साथ वरिष्ठ अधिवक्ता का दर्जा समाप्त करने की आवश्यकता है।
बता दें, न्यायमूर्ति जे बी पारदीवाला और न्यायमूर्ति मनोज मिश्रा भी पीठ में शामिल थे।
आपको अपने मन की बात...
चंद्रचूड़ ने कहा, 'आपको अपने मन की बात रखनी की स्वतंत्रता है। भारत के मुख्य न्यायाधीश के रूप में खासकर एक न्यायाधीश के रूप में, मैं कानून और संविधान का सेवक हूं। मुझे एक रुख का पालन करना होगा, जो निर्धारित किया गया है।'
उन्होंने आगे कहा, 'मैं यह नहीं कह सकता कि मुझे यही पसंद है और मैं ऐसा करूंगा।'
अक्तूबर में की थी याचिका खारिज
इस साल अक्तूबर में सुप्रीम कोर्ट ने वकीलों को वरिष्ठ अधिवक्ता पदनाम दिए जाने को चुनौती देने वाली एक याचिका खारिज कर दी थी। कोर्ट ने कहा था कि पदनाम देने की प्रणाली मनमानी नहीं है। न्यायमूर्ति संजय किशन कौल की अगुवाई वाली पीठ ने अधिवक्ता मैथ्यूज जे. नेदुम्पाडा और सात अन्य की ओर से दाखिल एक याचिका पर यह फैसला सुनाया था।
न्यायमूर्ति कौल ने कहा था, हमें इस निष्कर्ष पर पहुंचने में जरा भी हिचकिचाहट नहीं है कि रिट याचिका दुस्साहसी है, खासतौर पर याचिकाकर्ता संख्या एक (नेदुम्पाडा) की, और यह पूर्व के उनके ऐसे ही कार्य की निरंतरता है। शीर्ष अदालत ने कहा था कि ऐसा प्रतीत होता है कि अदालत द्वारा पहले पारित निर्णयों और आदेशों का याचिकाकर्ता नंबर एक पर आत्मनिरीक्षण को लकर कोई प्रभाव नहीं पड़ा।
जजों की नियुक्ति पर नियंत्रण के लिए लगातार खींचतान बनी रहती है : सीजेआई
वहीं, केंद्रीय प्रशासनिक न्यायाधिकरण (सीएटी) की मुंबई पीठ के नए परिसर के उद्घाटन समारोह में बोलते हुए मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) डीवाई चंद्रचूड़ ने कहा कि इस बात को लेकर लगातार खींचतान बनी रहती है कि न्यायाधीशों की नियुक्ति पर अंतिम नियंत्रण किसका होगा। यहां तक कि रिक्तियां आने पर भी और नियुक्तियों को लंबे समय तक लंबित रखा जाता है।
सीजेआई चंद्रचूड़ ने आगे कहा कि देश में न्यायाधिकरण अदालतों में लंबित मामलों को कम करने और न्याय के समग्र वितरण में सहायता करने में बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। उन्होंने कहा, न्यायाधिकरणों का एक उद्देश्य हमारी अदालतों में सुनवाई में होने वाली देरी को रोकना और उन्हें कम करना था। यह उम्मीद की गई थी कि ये न्यायाधिकरण, जो साक्ष्य और प्रक्रिया के सख्त नियमों में बंधे नहीं हैं, अदालतों को मामलों को सुलझाने और न्याय प्रदान करने में मदद करेंगे। हालांकि, हमारे न्यायाधिकरण आम तौर पर समस्याओं से ग्रस्त हैं और फिर हम खुद से पूछते हैं कि क्या इतने सारे न्यायाधिकरणों का गठन करना वास्तव में आवश्यक था।
महाराष्ट्र में जजों के काम में छेड़छाड़ नहीं
सीजेआई ने कहा कि महाराष्ट्र में वकीलों और न्यायाधीशों को यह नहीं भूलना चाहिए कि वे देश के बाकी हिस्सों के विपरीत एक अनुकूल परिस्थितियों में काम करते हैं क्योंकि यहां शासन की संस्कृति है। यहां सरकार ने न्यायपालिका को अकेला छोड़ा है। जज जो काम करते हैं, उसमें वे छेड़छाड़ नहीं करते।