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सुप्रीम कोर्ट : बिना सुबूत नहीं दे सकते नमाज की जगह का दर्जा, हाईकोर्ट के आदेश को चुनौती वाली याचिका खारिज

Sat, 30 Apr 2022 05:27 AM IST
योगेश साहू राजीव सिन्हा, अमर उजाला, नई दिल्ली।
राजीव सिन्हा, अमर उजाला, नई दिल्ली। Published by: योगेश साहू Updated Sat, 30 Apr 2022 05:27 AM IST
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Supreme Court: Cannot give the status of place of Namaz without evidence, Rajasthan Waqf Board s petition challenging the High Court order dismissed
सर्वोच्च न्यायालय - फोटो : PTI

सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को कहा, समर्पण (डेडिकेशन) या उपयोगकर्ता के सुबूत के अभाव में एक जर्जर दीवार या चबूतरे को नमाज अदा करने के उद्देश्य से धार्मिक स्थान का दर्जा नहीं दिया जा सकता है। जस्टिस हेमंत गुप्ता व जस्टिस वी रामसुब्रमण्यम की पीठ ने राजस्थान के वक्फ बोर्ड की हाईकोर्ट के आदेश को चुनौती देने वाली याचिका खारिज कर दी।

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हाईकोर्ट ने जिंदल सॉ लि. को खनन के लिए भीलवाड़ा में एक संरचना को हटाने की अनुमति दी थी। वक्फ बोर्ड ने दावा किया कि दीवार व चबूतरा मस्जिद के हिस्से हैं, जहां पुराने समय में मजदूर नमाज अदा करते थे। बोर्ड ने याचिका में इसे बचाने की मांग की थी। पीठ ने कहा, कोई सुबूत नहीं कि जंगलों से घिरे इस संरचना का उपयोग कभी भी नमाज के लिए किया गया था। यहां वजू की भी सुविधा नहीं, जिसे नमाज अदा करने वाले स्थल के लिए जरूरी माना जाता है।
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कोर्ट ने यह भी कहा...

  • कोर्ट ने कहा-पुरातत्व विभाग के विशेषज्ञों ने बताया है कि संरचना का कोई ऐतिहासिक या पुरातात्विक महत्व नहीं है।
  • भले ही राज्य सरकार ने इसे एक धार्मिक संरचना के रूप में पहचान दी है लेकिन अदालत ने कहा, इस पक्ष को रिकॉर्ड में पेश नहीं किया गया है।
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उम्रकैदियों को फरलो से पूरी तरह इनकार नहीं कर सकते : सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को कहा कि कैदियों को फरलो से इनकार नहीं किया जा सकता है, भले ही उन्हें आजीवन कारावास की सजा मिली हो। शीर्ष अदालत ने दिल्ली हाईकोर्ट के साथ-साथ जेल महानिदेशक द्वारा फरलो न देने के आदेशों को खारिज कर दिया और संबंधित अथॉरिटी को कानून के अनुसार मामले का परीक्षण करने की छूट दी।

जस्टिस दिनेश माहेश्वरी और जस्टिस अनिरुद्ध बोस की पीठ ने कहा कि जब फरलो अच्छे जेल आचरण के लिए एक प्रोत्साहन है तो भले ही दोषी को सजा में कोई छूट नहीं मिली हो और उसे जीवन भर के लिए जेल में रहना हो लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि फरलो मांगने के उसके अधिकार को खत्म कर दिया जाए।

शीर्ष अदालत दोषी अतबीर की एक याचिका पर विचार कर रही थी जिसे इस आधार पर फरलो (कुछ दिनों की छुट्टी) देने से इनकार कर दिया गया था कि राष्ट्रपति ने 2012 में उसकी मौत की सजा को इस शर्त के साथ आजीवन कारावास में बदल दिया था कि वह बिना पैरोल के और कारावास में बिना किसी छूट के जीवन भर जेल में रहेगा।

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