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तमिलनाडु: वन्नियार समुदाय का 10.5 फीसदी आरक्षण को सुप्रीम कोर्ट ने किया रद्द, जानें पूरा मामला
Thu, 31 Mar 2022 10:49 PM IST
अभिषेक दीक्षित
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
Published by: अभिषेक दीक्षित
Updated Thu, 31 Mar 2022 10:49 PM IST
सार
जस्टिस एल नागेश्वर राव और जस्टिस बीआर गवई की पीठ ने कहा, राज्य सरकार डाटा प्रदान करने में विफल रही है कि वन्नियारों को एमबीसी के भीतर एक अलग समूह के रूप में क्यों माना जाना चाहिए। हमारी राय है कि अन्य पिछड़े वर्गों की तुलना में वन्नियार को एक अलग समूह के रूप में मानने का कोई आधार नहीं है। इस प्रकार 2021 अधिनियम अनुच्छेद-14 और 16 के विपरीत हैं।
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सुप्रीम कोर्ट
- फोटो : amar ujala
विस्तार
सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को तमिलनाडु में वन्नियार समुदाय को शिक्षण संस्थानों और सरकारी नौकरियों में मिलने वाले 10.5 फीसदी आरक्षण को रद्द कर दिया। शीर्ष अदालत ने सबसे पिछड़े वर्गों (एमबीसी) के लिए उपलब्ध 20 फीसदी आरक्षण में से वन्नियार समुदाय को 10.5 फीसदी आरक्षण देने वाले तमिलनाडु अधिनियम 2021 को असांविधानिक करार दिया और इस कानून को रद्द करने के मद्रास हाईकोर्ट के आदेश को बरकरार रखा।
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जस्टिस एल नागेश्वर राव और जस्टिस बीआर गवई की पीठ ने कहा, राज्य सरकार डाटा प्रदान करने में विफल रही है कि वन्नियारों को एमबीसी के भीतर एक अलग समूह के रूप में क्यों माना जाना चाहिए। हमारी राय है कि अन्य पिछड़े वर्गों की तुलना में वन्नियार को एक अलग समूह के रूप में मानने का कोई आधार नहीं है। इस प्रकार 2021 अधिनियम अनुच्छेद-14 और 16 के विपरीत हैं।
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कोर्ट ने हालांकि माना कि राज्य सरकार के पास अधिनियम को पारित करने की विधायी क्षमता है। 102वें संविधान संशोधन ने पिछड़े वर्गों की पहचान करने के लिए राज्य की शक्तियों पर रोक लगा दी लेकिन उप-वर्गों की पहचान करने की राज्य की शक्ति को प्रभावित नहीं किया।
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सुप्रीम कोर्ट में तमिलनाडु राज्य की ओर से दलील दी गई थी कि 2021 अधिनियम केवल सबसे पिछड़े वर्गों को प्रदान किए गए 20 फीसदी आरक्षण के भीतर उप-वर्गीकृत है। वहीं प्रतिवादियों का तर्क था कि राज्य ने 102वें सांविधानिक संशोधन अधिनियम का अपमान करते हुए किसी भी मात्रात्मक डाटा पर भरोसा किए बिना समुदायों की पहचान करने का प्रयास किया।