फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   India News ›   Supreme Court bench by unanimous decision decriminalises Section377

सुप्रीम कोर्ट ने लगाई मुहर, कहा- समलैंगिकता अपराध नहीं

Thu, 06 Sep 2018 12:16 PM IST
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Updated Thu, 06 Sep 2018 12:16 PM IST
विज्ञापन
Supreme Court bench by unanimous decision decriminalises Section377
lgbt no crime

समलैंगिकता को अपराध मानने वाली आईपीसी की धारा 377 की वैधानिकता पर सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुना दिया है। कोर्ट ने समलैंगिकता को अपराध की श्रेणी से बाहर कर दिया है। मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा की अध्यक्षता वाली पांच न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने अपने फैसले में गुरुवार को कहा कि देश में सबको समानता का अधिकार है। समाज की सोच बदलने की जरूरत है। अपना फैसला सुनाते हुए मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा ने कहा, कोई भी अपने व्यक्तित्व से बच नहीं सकता है। समाज में हर किसी को जीने का अधिकार है। 

विज्ञापन


कोर्ट ने कहा कि हमें पुरानी धारणाओं को बदलना होगा। एलजीबीटी समुदाय को हर वो अधिकार प्राप्त है जो देश के किसी आम नागरिक को मिले हैं। हमें एक दूसरे के अधिकारों का आदर करना चाहिए। इस फैसले के साथ ही उच्चतम न्यायालय की संविधान पीठ ने सहमति से दो वयस्कों के बीच बने समलैंगिक यौन संबंध को एक मत से अपराध के दायरे से बाहर कर दिया। साथ ही भारतीय दंड संहिता की धारा 377 के एक हिस्से को, जो सहमति से अप्राकृतिक यौन संबंध को अपराध बताता है, तर्कहीन, बचाव नहीं करने वाला और मनमाना भी करार दिया।
विज्ञापन


यह भी पढ़ें: जानिए धारा 377 में अब तक क्या-क्या हुआ
विज्ञापन
विज्ञापन


उच्चतम न्यायालय की पांच सदस्यीय संविधान पीठ ने गुरूवार को एकमत से 158 साल पुरानी भारतीय दंड संहिता की धारा 377 के उस हिस्से को निरस्त कर दिया जिसके तहत परस्पर सहमति से अप्राकृतिक यौन संबंध अपराध था। संविधान पीठ के अन्य सदस्यों में न्यायमूर्ति आर एफ नरिमन, न्यायमूर्ति ए एम खानविलकर, न्यायमूर्ति धनन्जय वाई चन्द्रचूड़ और न्यायमूर्ति इन्दु मल्होत्रा शामिल हैं। 

यह भी पढ़ें: समलैंगिकता पर 'सुप्रीम' फैसला, मिलिए उन छह लोगों से जिन्होंने खटखटाया था कोर्ट का दरवाजा

Supreme Court bench by unanimous decision decriminalises Section377
article 377
पशुओं के साथ संबंध दंडनीय अपराध

उच्चतम न्यायालय धारा 377 को आंशिक रूप से निरस्त किया है, क्योंकि इससे समानता के अधिकार का उल्लंघन होता है। उच्चतम न्यायालय ने कहा कि पशुओं और बच्चों के साथ अप्राकृतिक यौन क्रिया से संबंधित धारा 377 का हिस्सा पहले की तरह अपराध की श्रेणी में ही रखा गया है।  यही नहीं पशुओं के साथ किसी तरह की यौन क्रिया भारतीय दंड संहिता की धारा 377 के तहत दंडनीय अपराध बनी रहेगी। 

धारा 377 एलजीबीटी के सदस्यों को परेशान करने का हथियार

उच्चतम न्यायालय ने कहा कि भारतीय दंड संहिता की धारा 377 एलजीबीटी के सदस्यों को परेशान करने का हथियार था, जिसके कारण इससे भेदभाव होता है। उच्चतम न्यायालय ने कहा कि एलजीबीटी समुदाय को अन्य नागरिकों की तरह समान मानवीय और मौलिक अधिकार हैं। प्रधान न्यायाधीश दीपक मिश्रा ने अपनी और न्यायाधीश ए एम खानविलकर ओर से कहा कि खुद को अभिव्यक्त नहीं कर पाना मरने के समान है।

यह भी पढ़ें: धर्मगुरुओं को रास नहीं आया समलैंगिकता पर सुप्रीम फैसला

मीडिया और सरकार फैसले का करे प्रचार

उच्चतम न्यायालय ने यौन रुझान को जैविक स्थिति बताते हुए कहा कि इस आधार पर किसी भी तरह का भेदभाव मौलिक अधिकारों का उल्लंघन है और जहां तक किसी निजी स्थान पर आपसी सहमति से अप्राकृतिक यौन संबंध बनाने का सवाल है तो ना यह हानिकारक है और ना ही समाज के लिए संक्रामक है।
यही नहीं फैसला पढ़ते हुए न्यायाधीश नरीमन ने कहा सरकार, मीडिया को उच्चतम न्यायलय के फैसले का व्यापक प्रचार करना चाहिए ताकि एलजीबीटीक्यू समुदाय को भेदभाव का सामना न करना पड़े।

यह भी पढ़ें: तस्वीरें : सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद समलैंगिकों में जश्न का माहौल

एलजीबीटी समुदाय में खुशी की लहर 
कोर्ट का फैसला आते ही एलजीबीटी समुदाय में खुशी की लहर दौड़ गई है। चेन्नई, मुंबई और देश के कोने- कोने से एलजीबीटी समुदाय के लोगों में खुशी के मारे रोने लगे वहीं कुछ जगह पर लोग अपनी भावनाओं को काबू में नहीं रख पाए है।  

इससे पहले सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुनाते हुए होमोसेक्सुएलिटी यानि समलैंगिकता को क्रिमिनल एक्ट बता चुका था जिसको दोबारा चुनौती देते हुए क्युरिटिव पिटिशन दाखिल की गई थी। बता दें कि कई वर्षों से समुदाय इसे अपराध की श्रेणी में रखे जाने का विरोध करता आ रहा था।  जिसपर आज सुप्रीम कोर्ट ने यह कहते हुए मुहर लगा दी है कि समलैंगिकता अपराध नहीं है। 

इन लोगों ने लड़ी लंबी लड़ाई

संविधान पीठ ने नृत्यांगना नवतेज जौहर, पत्रकार सुनील मेहरा, शेफ ऋतु डालमिया, होटल कारोबारी अमन नाथ और केशव सूरी, व्यावसायी आयशा कपूर और आईआईटी के 20 पूर्व तथा मौजूदा छात्रों की याचिकाओं पर यह फैसला सुनाया। इन सभी ने दो वयस्कों द्वारा परस्पर सहमति से समलैंगिक यौन संबंध स्थापित करने को अपराध के दायरे से बाहर रखने का अनुरोध करते हुये धारा 377 की संवैधानिक वैधता को चुनौती दी थी।

यह भी पढ़ें:  संयुक्त राष्ट्र ने समलैंगिकता पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले का किया स्वागत

समलैंगिक यौन संबंधों का मुद्दा पहली बार गैर सरकारी संगठन नाज फाउण्डेशन ने 2001 में दिल्ली उच्च न्यायालय में उठाया था। उच्च न्यायालय ने 2009 में अपने फैसले में धारा 377 के प्रावधान को गैरकानूनी करार देते हुये ऐसे रिश्तों को अपराध के दायरे से बाहर कर दिया था।

उच्च न्यायालय के इस फैसले को 2013 में उच्चतम न्यायालय ने पलट दिया था। इसके बाद शीर्ष अदालत ने अपने फैसले पर पुनर्विचार के लिये दायर याचिका भी खारिज कर दी थी। हालांकि, शीर्ष अदालत में इस फैसले को लेकर दायर सुधारात्मक याचिकायें अभी भी लंबित हैं।

यह भी पढ़ें: समलैंगिकता पर सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले के बाद जानिए कांग्रेस ने क्या कहा

भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) में समलैंगिकता को अपराध बताया गया है। आईपीसी की धारा 377 के मुताबिक जो कोई भी किसी पुरुष, महिला या पशु के साथ प्रकृति की व्यवस्था के खिलाफ सेक्स करता है तो इस अपराध के लिए उसे 10 वर्ष की सजा या आजीवन कारावास से दंडित किया जाएगा। उस पर जुर्माना भी लगाया जाएगा। यह अपराध संज्ञेय अपराध की श्रेणी में आता है और यह गैर जमानती है।

यह भी पढ़ें: ये हैं वो सात वजह जो साबित करती हैं कि समलैंगिकता अपराध नहीं
 
भारत में कैसे संज्ञान में आई धारा-377  
सबसे पहले साल 1290 में इंग्लैंड के फ्लेटा में अप्राकृतिक संबंध बनाने का मामला सामने आया, जिसके बाद पहली बार कानून बनाकर इसे अपराध की श्रेणी में रखा गया। बाद में ब्रिटेन और इंग्लैंड में 1533 में बगरी (अप्राकृतिक संबंध) एक्ट बनाया गया और इसके तहत फांसी का प्रावधान किया गया। 1563 में क्वीन एलिजाबेथ-1 ने इसे फिर से लागू कराया। 1817 में बगरी एक्ट से ओरल सेक्स को हटा दिया गया और 1861 में डेथ पेनाल्टी का प्रावधान भी हटा दिया गया। 1861 में ही लॉर्ड मेकाले ने इंडियन पीनल कोड (आईपीसी) ड्राफ्ट किया और उसी के तहत धारा-377 का प्रावधान किया गया।
विज्ञापन
विज्ञापन

रहें हर खबर से अपडेट, डाउनलोड करें Android Hindi News apps, iOS Hindi News apps और Amarujala Hindi News apps अपने मोबाइल पे|
Get all India News in Hindi related to live update of politics, sports, entertainment, technology and education etc. Stay updated with us for all breaking news from India News and more news in Hindi.

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed