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Supreme Court: 'जमानत की शर्त में राजनीतिक गतिविधि पर रोक शामिल नहीं'; सुप्रीम कोर्ट ने पलटा हाईकोर्ट का आदेश
Tue, 26 Mar 2024 03:21 PM IST
ज्योति भास्कर
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
Published by: ज्योति भास्कर
Updated Tue, 26 Mar 2024 03:21 PM IST
सार
सुप्रीम कोर्ट ने जमानत की शर्तों पर अहम आदेश पारित किया है। देश की शीर्ष अदालत ने उड़ीसा उच्च न्यायालय के आदेश को पलटते हुए कहा, जमानत की शर्तों में राजनीतिक गतिविधि पर रोक लगाने को नहीं गिना जा सकता। कोर्ट ने साफ किया कि ऐसे आधार पर जमानत देने से इनकार करने से शख्स के मौलिक अधिकारों का हनन होता है।
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सुप्रीम कोर्ट (फाइल)
- फोटो : सोशल मीडिया
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विस्तार
सुप्रीम कोर्ट ने मौलिक अधिकारों और जमानत की शर्तों पर बड़ा आदेश दिया है। जस्टिस बीआर गवई और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की पीठ ने कहा कि निचली अदालतों में जमानत देने की शर्तों में 'राजनीतिक गतिविधि में शामिल नहीं होने' को नहीं गिना जा सकता। अदालत ने साफ किया कि किसी शख्स पर ऐसी रोक लगाए जाने से उसके मौलिक अधिकारों का हनन होता है। सुप्रीम कोर्ट ने यह आदेश उड़ीसा हाईकोर्ट के आदेश को चुनौती देने वाली याचिका पर पारित किया। ओडिशा के बहरामपुर नगर निगम के पूर्व मेयर सिबा शंकर दास ने उड़ीसा हाईकोर्ट के 18 जनवरी को पारित आदेश को चुनौती दी थी।
उड़ीसा उच्च न्यायालय ने अपने आदेश में क्या कहा?
हाईकोर्ट ने जमानत की शर्त को वापस लेने की मांग करने वाली याचिका खारिज कर दी थी। अदालत ने साफ किया था कि सिबा शंकर दास सार्वजनिक रूप से कोई अप्रिय स्थिति पैदा नहीं करेंगे। हाईकोर्ट ने कहा था कि दास प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से किसी भी राजनीतिक गतिविधि में भी शामिल नहीं होंगे। दास ने 11 अगस्त, 2022 को पारित आदेश में लगाई गई जमानत की शर्तों में सुधार की अपील करते हुए हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। इस पर 18 जनवरी को पारित आदेश में हाईकोर्ट ने उनकी अपील अस्वीकार कर दी थी।
सुप्रीम कोर्ट ने मौलिक अधिकारों पर क्या कहा?
अगस्त, 2022 में जमानत पर रिहाई का आदेश देते समय उड़ीसा हाईकोर्ट ने दास पर शर्त लगाई थी। इस आदेश को दोषपूर्ण बताते हुए सुप्रीम कोर्ट की खंडपीठ ने कहा, 'ऐसी शर्त लगाने से अपीलकर्ता के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन होगा। जमानत देते हुए ऐसी कोई शर्त नहीं लगाई जा सकती।' बता दें कि सुप्रीम कोर्ट ने 22 मार्च को यह आदेश पारित किया। कोर्ट ने कहा कि जमानत की शर्तों की सीमा तक हाईकोर्ट के आदेश को खारिज किया जाता है।
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दास पर जानलेवा हमले की दलील; जमानत की शर्तों का विरोध
इससे पहले उड़ीसा हाईकोर्ट में दास के वकील ने कहा था कि अपीलकर्ता एक राजनीतिक व्यक्ति है। इस नाते आगामी आम चुनाव के मद्देनजर उन्हें राजनीतिक गतिविधियों में भाग लेने की अनुमति दी जा सकती है। सरकारी वकील ने अपील पर आपत्ति जताते हुए कहा था कि जमानत पर रिहा होने के बाद उन पर (दास) जानलेवा हमला किया गया था।
जमानत की शर्तों पर उड़ीसा हाईकोर्ट के फैसले का अंश
दोनों पक्षों की दलीलों को सुनने के बाद उच्च न्यायालय ने कहा था, तमाम तथ्यों पर विचार करने के बाद, अपीलकर्ता को राजनीतिक गतिविधि में भाग लेने की अनुमति देने के लिए जमानत की शर्तों को संशोधित करना अनुचित होगा। हाईकोर्ट ने रेखांकित किया था कि राजनीतिक गतिविधियों के कारण अपीलकर्ता से जुड़े इलाके में कानून-व्यवस्था की स्थिति और खराब हो सकती है। अदालत के मुताबिक, यह तथ्य है कि दास पर न केवल अन्य मामलों में शामिल होने के आरोप हैं, बल्कि उन पर जानलेवा हमला करने का प्रयास भी किया जा चुका है।
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उड़ीसा उच्च न्यायालय ने अपने आदेश में क्या कहा?
हाईकोर्ट ने जमानत की शर्त को वापस लेने की मांग करने वाली याचिका खारिज कर दी थी। अदालत ने साफ किया था कि सिबा शंकर दास सार्वजनिक रूप से कोई अप्रिय स्थिति पैदा नहीं करेंगे। हाईकोर्ट ने कहा था कि दास प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से किसी भी राजनीतिक गतिविधि में भी शामिल नहीं होंगे। दास ने 11 अगस्त, 2022 को पारित आदेश में लगाई गई जमानत की शर्तों में सुधार की अपील करते हुए हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। इस पर 18 जनवरी को पारित आदेश में हाईकोर्ट ने उनकी अपील अस्वीकार कर दी थी।
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सुप्रीम कोर्ट ने मौलिक अधिकारों पर क्या कहा?
अगस्त, 2022 में जमानत पर रिहाई का आदेश देते समय उड़ीसा हाईकोर्ट ने दास पर शर्त लगाई थी। इस आदेश को दोषपूर्ण बताते हुए सुप्रीम कोर्ट की खंडपीठ ने कहा, 'ऐसी शर्त लगाने से अपीलकर्ता के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन होगा। जमानत देते हुए ऐसी कोई शर्त नहीं लगाई जा सकती।' बता दें कि सुप्रीम कोर्ट ने 22 मार्च को यह आदेश पारित किया। कोर्ट ने कहा कि जमानत की शर्तों की सीमा तक हाईकोर्ट के आदेश को खारिज किया जाता है।
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दास पर जानलेवा हमले की दलील; जमानत की शर्तों का विरोध
इससे पहले उड़ीसा हाईकोर्ट में दास के वकील ने कहा था कि अपीलकर्ता एक राजनीतिक व्यक्ति है। इस नाते आगामी आम चुनाव के मद्देनजर उन्हें राजनीतिक गतिविधियों में भाग लेने की अनुमति दी जा सकती है। सरकारी वकील ने अपील पर आपत्ति जताते हुए कहा था कि जमानत पर रिहा होने के बाद उन पर (दास) जानलेवा हमला किया गया था।
जमानत की शर्तों पर उड़ीसा हाईकोर्ट के फैसले का अंश
दोनों पक्षों की दलीलों को सुनने के बाद उच्च न्यायालय ने कहा था, तमाम तथ्यों पर विचार करने के बाद, अपीलकर्ता को राजनीतिक गतिविधि में भाग लेने की अनुमति देने के लिए जमानत की शर्तों को संशोधित करना अनुचित होगा। हाईकोर्ट ने रेखांकित किया था कि राजनीतिक गतिविधियों के कारण अपीलकर्ता से जुड़े इलाके में कानून-व्यवस्था की स्थिति और खराब हो सकती है। अदालत के मुताबिक, यह तथ्य है कि दास पर न केवल अन्य मामलों में शामिल होने के आरोप हैं, बल्कि उन पर जानलेवा हमला करने का प्रयास भी किया जा चुका है।