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SC: कोर्ट का सवाल- तीन साल से क्या कर रहे हैं राज्यपाल, तमिलनाडु में विधेयकाें की मंजूरी में देरी का मामला
Tue, 21 Nov 2023 06:07 AM IST
जलज मिश्रा
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
Published by: जलज मिश्रा
Updated Tue, 21 Nov 2023 06:07 AM IST
सार
मुख्य न्यायाधीश जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ की तीन सदस्यीय पीठ ने अटॉर्नी जनरल (एजी) आर वेंकटरमणी से कहा, राज्यपाल को सरकारों के सुप्रीम कोर्ट जाने का इंतजार क्यों करना चाहिए?
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सुप्रीम कोर्ट
- फोटो : ANI
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विस्तार
सुप्रीम कोर्ट ने तमिलनाडु के राज्यपाल की सहमति के लिए जनवरी, 2020 में भेजे विधेयकों पर निर्णय लेने में देरी पर सवाल उठाया कि वह तीन साल से क्या कर रहे हैं? मुख्य न्यायाधीश जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ की तीन सदस्यीय पीठ ने अटॉर्नी जनरल (एजी) आर वेंकटरमणी से कहा, राज्यपाल को सरकारों के सुप्रीम कोर्ट जाने का इंतजार क्यों करना चाहिए? पीठ ने कहा कि दस नवंबर को आदेश पारित किया था और ये बिल जनवरी, 2020 से लंबित थे। इसका मतलब है कि राज्यपाल ने कोर्ट के नोटिस जारी करने के बाद फैसला किया।
वेंकटरमणी ने कहा, विवाद सिर्फ उन विधेयकों से जुड़ा है, जो राज्य विश्वविद्यालयों में कुलपतियों की नियुक्ति से जुड़ी राज्यपाल की शक्तियों को छीनने का प्रयास करते हैं। यह महत्वपूर्ण मुद्दा है, इसलिए पुनर्विचार की जरूरत है। उन्होंने यह भी कहा, मौजूदा मामले को उन बिलों की वैधता पर मंजूरी के रूप में नहीं लिया जाना चाहिए। राज्यपाल सिर्फ तकनीकी पर्यवेक्षक नहीं हैं। वहीं, तमिलनाडु सरकार की ओर से वरिष्ठ वकील अभिषेक मनु सिंघवी, पी विल्सन व मुकुल रोहतगी ने तर्क दिया कि संविधान के अनुच्छेद 200 के मायने यह नहीं है कि राज्यपाल बिल रोकेंगे। राज्यपाल महज यह नहीं कह सकते कि मैं अनुमति रोकता हूं।
सीजेआई बोले, राज्यपाल ये तीन कार्रवाई कर सकते हैं
सीजेआई ने कहा, अनुच्छेद 200 के मूल भाग के तहत राज्यपाल के पास कार्रवाई के तीन तरीके हैं। वह विधेयकों को मंजूरी दे सकते हैं, रोक सकते हैं या राष्ट्रपति के लिए आरक्षित कर सकते हैं। पीठ ने कहा, जब वह सहमति रोकते हैं, तो क्या उसे पुनर्विचार के लिए भेजने की आवश्यकता है? प्रावधान कहता है-हो सकता है। तब सिंघवी ने कहा, जितनी जल्दी हो सके। यह बहुत स्पष्ट है। जब राज्यपाल सहमति रोकते हैं, तो इसे सदन को वापस भेजना होता है या यह कहना होता है कि मैं इसे राष्ट्रपति के पास भेज रहा हूं। पीठ ने पूछा, विधेयक को दोबारा पारित करने के बाद क्या राज्यपाल राष्ट्रपति के पास वापस भेज सकते हैं? सिंघवी ने कहा, नहीं, क्योंकि आपने एक रास्ता चुना है और इसका मसकद कभी नहीं था कि राज्यपाल बिल पर बैठें।
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वेंकटरमणी ने कहा, विवाद सिर्फ उन विधेयकों से जुड़ा है, जो राज्य विश्वविद्यालयों में कुलपतियों की नियुक्ति से जुड़ी राज्यपाल की शक्तियों को छीनने का प्रयास करते हैं। यह महत्वपूर्ण मुद्दा है, इसलिए पुनर्विचार की जरूरत है। उन्होंने यह भी कहा, मौजूदा मामले को उन बिलों की वैधता पर मंजूरी के रूप में नहीं लिया जाना चाहिए। राज्यपाल सिर्फ तकनीकी पर्यवेक्षक नहीं हैं। वहीं, तमिलनाडु सरकार की ओर से वरिष्ठ वकील अभिषेक मनु सिंघवी, पी विल्सन व मुकुल रोहतगी ने तर्क दिया कि संविधान के अनुच्छेद 200 के मायने यह नहीं है कि राज्यपाल बिल रोकेंगे। राज्यपाल महज यह नहीं कह सकते कि मैं अनुमति रोकता हूं।
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सीजेआई बोले, राज्यपाल ये तीन कार्रवाई कर सकते हैं
सीजेआई ने कहा, अनुच्छेद 200 के मूल भाग के तहत राज्यपाल के पास कार्रवाई के तीन तरीके हैं। वह विधेयकों को मंजूरी दे सकते हैं, रोक सकते हैं या राष्ट्रपति के लिए आरक्षित कर सकते हैं। पीठ ने कहा, जब वह सहमति रोकते हैं, तो क्या उसे पुनर्विचार के लिए भेजने की आवश्यकता है? प्रावधान कहता है-हो सकता है। तब सिंघवी ने कहा, जितनी जल्दी हो सके। यह बहुत स्पष्ट है। जब राज्यपाल सहमति रोकते हैं, तो इसे सदन को वापस भेजना होता है या यह कहना होता है कि मैं इसे राष्ट्रपति के पास भेज रहा हूं। पीठ ने पूछा, विधेयक को दोबारा पारित करने के बाद क्या राज्यपाल राष्ट्रपति के पास वापस भेज सकते हैं? सिंघवी ने कहा, नहीं, क्योंकि आपने एक रास्ता चुना है और इसका मसकद कभी नहीं था कि राज्यपाल बिल पर बैठें।
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